आपने कभी प्यार किया है ?

"आपने कभी प्यार किया है ?"

मेरे इस सवाल पर आपके जवाब क्या हो सकते हैं, क्या-क्या हो सकते हैं, मैं जानता हूँ. इसलिये जवाब देने की उलझनों में आपको नहीं डालूँगा. मैंने कभी प्यार नहीं किया...... हाँ, एक लड़की को मैं बहुत चाहता था, मगर वह मुझे पसंद नहीं करती थी...... मुझे एक लड़का बहुत अच्छा लगता था मगर मैं उसे कभी यह बात बोल नहीं पाई..... मैंने जिससे प्यार किया उसने किसी और लड़की से शादी रचा ली..... हमदोनों एक-दूसरे को हद से ज्यादा प्यार करते थे पर हमारे माता-पिता ने हमारी शादी नहीं होने दी..... मेरी बेरोजगारी ने मेरी महबूबा को मुझसे जुदा कर दिया..... वगैरह, वगैरह वगैरह. लिहाजा, आप परेशान न हों. हजारों तजुर्बे होंगे, लाखों एहसासों से इंसान गुजरा होगा. मगर, एकाध अपवादों को छोड़ दें तो कभी किसी को 'मुकम्मल जहाँ' नहीं मिलता. जिगर मुरादाबादी साहब तो पहले ही फरमा गए थे.... ये इश्क नहीं आसाँ इतना ही समझ लीजे, इक आग का दरिया है और डूब के जाना है. 

कायनात जब से बनी मुहब्बत तब से जिन्दा है. जिन्दा है तभी तक कायनात है. ये बात दीगर है कि शायद ही किसी के हिस्से यह मकबूल एहसास सौ फीसदी पड़ा हो. 

तेरे जहान में ऐसा नहीं कि प्यार न हो,
  जहाँ उम्मीद हो इसकी वहाँ नहीं मिलता ।    
कभी किसी को मुकम्मल जहाँ नहीं मिलता, 
कहीं ज़मीं तो कहीं आसमाँ नहीं मिलता ।  
                                                             - निदा फ़ाज़ली 

राधा हाड़-मांस की बनी एक ऐसी ही शख्शियत है. पेशे से नर्स. ड्यूटी मिलती है देव नाम के एक ऐसे मरीज की तीमारदारी करने की जो मानसिक रूप से विकलांग हो गया है. यह विकलांगता कैसी है ? मुहब्बत में ठुकरा दिए गए सभी आशिक पागल नहीं हो जाते. मगर देव हो गया है - शायद अधिक जज्बाती रहा होगा. राधा को उसकी तीमारदारी करने के नाम पर जो ड्यूटी असल में मिली है वह है देव से मुहब्बत की एक्टिंग करने की. यह कैसी बात हुई ? 

अस्पताल (पागलखाना) के बड़े डॉक्टर साहब एक ख़ास किस्म की मानसिक बीमारी - जिसका नाम "एक्यूट मेनिया" है - पर रिसर्च कर रहे हैं. मुहब्बत में ठुकरा दिए गए लोगों के दिमाग में एक अलग तरह का झंझावात चल रहा होता है और यह बीमारी उन्हीं लोगों में से कुछ को होती है. उनका आसान इलाज कैसे हो उसी की खोज में है यह रिसर्च. वे नहीं चाहते कि उनको परम्परागत दवाओं से या इलेक्ट्रिक शॉक देकर ठीक किया जाये. उनका खयाल है कि आशिकी में दुत्कारे गए ऐसे बीमार लोग अपनी महबूबा में अक्स देखा करते हैं अपनी माँ का. वे दुहरा धक्का बर्दाश्त नहीं कर पाते - एक महबूबा की मुहब्बत का और दूसरा माँ की ममता का. डॉक्टर साहब की सोच है कि नकली तरीके से यानी एक्टिंग के जरिये अगर इस तरह के मरीजों को 'महबूबा' जैसी मुहब्बत और 'माँ' जैसी ममता दी जाए तो धीरे-धीरे वह सामान्य हो जाएगा, स्वस्थ हो जाएगा. और इस काम के लिए उन्होंने चुना है अपने अस्पताल की सबसे योग्य नर्स राधा को.

अब यहाँ कहानी में एक मोड़ आता है. यह कि एक्टिंग करते-करते राधा देव को सचमुच प्यार करने लगती है. भूल जाती है कि उसके एक्टिंग की सीमा सिर्फ एक्टिंग तक ही सीमित थी. मगर आखिर वह हाड़-मांस की एक इंसान ही तो है !! प्यार, मुहब्बत, इश्क चाहे जो नाम दे लें - प्लान बनाकर करने की चीज थोड़े ही है. यह तो किसी से भी, कभी भी बस हो जाता है. कोई प्लान बनाकर इस एहसास को ख़त्म कर देना चाहे तो क्या यह ख़त्म हो सकता है ? नहीं, हर्गिज नहीं. इसीलिये राधा को अगर यह बात याद आई भी हो कि उसे तो एक्टिंग, और सिर्फ एक्टिंग, ही करनी है तब पर भी वह अपने आप को रोक नहीं सकी. सो, वह उसे प्यार करने लगती है. उसे लगता है कि देव भी उसे प्यार करता है. वह भूल जाती है कि उसके प्यार के रिस्पॉन्स में देव नाम का यह मरीज भी 'प्यार करने जैसा' जो कुछ कर रहा है, वह मेडिकल साइंस के लिए सिर्फ एक संकेत-भर है कि मरीज 'ठीक' हो रहा है. और अचानक एक दिन, जब वह पूरी तरह स्वस्थ हो चुके देव को - अपने प्यार का इजहार करने के लिए - महाकवि कालीदास का प्रेम-काव्य 'मेघदूत' भेंट करने जाती है, तब उसे यह जानकर जोर का एक धक्का लगता है कि - देव उसे प्यार नहीं करता. उसका दिल बुरी तरह टूट जाता है. मगर वह कर ही क्या सकती है - वह तो दुनिया वालों की निगाह में सिर्फ एक नर्स-भर है जो अभी तक अपनी ड्यूटी ही कर रही थी. और देव ? अब वह क्या करता है ? क्या करने वाला है ? उसे कहाँ मालूम है कि राधा उसे सच में प्यार करने लगी है ! मालूम भी होता तो वह क्या कर लेता, कौन जाने ! आखिर उसकी निगाह में भी वह एक नर्स के अलावे कहाँ कुछ है ! कैसी अजीब विडम्बना है कि जिस महबूबा की ठोकर खाकर वह पागल हो गया था उसी से अब उसकी शादी होने वाली है !! देव के परिवार वाले अस्पताल से छुट्टी दिला कर उसे घर ले जाते हैं. 

और राधा ? वह अस्पताल की आठवीं मंजिल की बालकोनी में खड़ी होकर पथराई आँखों से देव का जाना देख रही है. देव की कार धीरे-धीरे सरकती जा रही है और आखिर आँखों से ओझल हो जाती है..... राधा धीरे-धीरे पीछे हटते हुए दीवार से टिक जाती है....... खामोशी से.

तो, क्या कहानी यहाँ पर ख़त्म हो गई ? जी नहीं, बल्कि ठीक इसी दृश्य से एक फिल्म शुरू होती है - जिसका नाम है 'खामोशी' और कहानी के जिस हिस्से से आप अभी तक रू-ब-रू हो चुके हैं, वह इसी फिल्म का हिस्सा था. असल में राधा की यादों के सैलाब में से उभर-उभर कर कहानी का उतना हिस्सा फिल्म में रह-रहकर गुजरता है जो आप देख चुके हैं (यानी पढ़ चुके हैं). जाहिर है, इन यादों को फिल्म में 'फ्लैशबैक' के माध्यम से दिखाया गया है.

बाकी का हिस्सा ? उसका क्या हुआ ? देव तो चला गया. राधा को उसका प्यार मिलना नसीब न हुआ. वह खामोश रही, अपने आँसू पी लिये. किसी को कुछ नहीं बताया. और आगे की कहानी राधा की खामोशी के लम्बे होते चले जाने की कहानी है. उसकी व्यथा कोई नहीं जान पाता. उसकी खामोशी अपने क्लाइमेक्स पर आकर टूटती जरूर है मगर तब तक सब कुछ उजड़ चुका होता है...... और रिसर्च के अंजाम का क्या हुआ ? सफल या असफल ? इसे आप खुद से तय कीजिये. फिल्म के सार-संक्षेप को जानकर. तो लीजिये, फिल्म 'खामोशी' के सार-संक्षेप का आनन्द लीजिये - ऑडियो-विजुअल इफेक्ट के साथ.

हाँ, एक बात और ! फिल्म में राधा का किरदार निभाया है वहीदा रहमान ने, देव का धर्मेंद्र ने, अरुण का राजेश खन्ना ने और बड़े डॉक्टर साहब का नाजिर हुसैन ने. बाँग्ला-भाषा के चोटी के साहित्यकार आशुतोष मुख़र्जी की कहानी 'नर्स मित्रा' पर आधारित इस फिल्म को निर्देशित किया है - हिन्दी और बाँग्ला फिल्मों के नामी-गिरामी फिल्मकार असित सेन ने. और गुलज़ार के गीतों को धुन दिया है हेमंत कुमार ने.  

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जैसा कि आप पढ़ चुके हैं, देव (धर्मेंद्र) के घर वाले उसे अस्पताल से वापस घर ले जा रहे हैं. कार धीरे-धीरे आँखों से ओझल होती जा रही है. राधा (वहीदा रहमान) आठवीं मंज़िल की बालकॉनी से उसे जाते देख रही है - पथराई आँखों से......
                                                                                                            
             
अस्पताल के 24 नंबर का कमरा रिजर्व रखा गया है उस मरीज के लिए जिस पर रिसर्च किया जाना होता है. और यही वह कमरा है जहाँ देव को रखा गया था.  बड़े डॉक्टर साहब (नाजिर हुसैन) चाहते हैं कि एक बार फिर से उसी मनोरोग से ग्रस्त किसी मरीज के इलाज की कोशिश, उसी तरीके से, की जाये और यदि सफलता इस बार भी मिल जाती है तो यह कन्फर्म हो जायेगा कि रिसर्च वास्तव में सफल रहा है. और तब इसे मेडिकल  साइन्स में एक ऐतिहासिक योगदान ही नहीं बल्कि एक वरदान के रूप में याद रखा जायेगा. उनका मानना है कि इससे उन तमाम मरीजों के आसान इलाज का रास्ता खुल जायेगा जो इस बीमारी से ग्रस्त हैं. इस बार कमरा नंबर 24 के लिये जिस मरीज को चुना जाता है उसका नाम है अरुण चौधरी और उसे वही बीमारी है जिससे देव ग्रस्त था.                                                                                                                                                             
                                    
अब कहानी में इंट्री होती है अरुण की यानी अरुण चौधरी (राजेश खन्ना) की. वह लेखक है, शायर है, गीतकार है. माँ-बाप पैसे वाले थे मगर अब वे जिन्दा नहीं हैं. और जिन्दा भाई-बहनों से उसका नाता टूट चुका है क्योंकि उनलोगों को अरुण की लेखकगिरी पसंद नहीं है. एक 'दादू' (अनवर हुसैन) भी है जो उसका कोई नहीं है मगर बहुत-कुछ है - यानी दोस्त, भाई, बाप सब कुछ. भाई-बहनों को छोड़ आने के बाद अरुण दादू के साथ ही रहता है.

अरुण की प्रेमिका सुलेखा (स्नेहलता) गायिका है और उसने 'फक्कड़' अरुण के साथ अपना रिश्ता बड़ी बेरहमी से तोड़ लिया है - सिर्फ इसलिए कि अपना 'करियर' बनाने के लिए उसे यह करना जरूरी लगा है. अरुण इस ठोकर को बर्दाश्त नहीं कर पाता है और धीरे-धीरे अपना मानसिक संतुलन खोता जा रहा है. दादू उसको मानसिक रूप से थोड़ा रिलैक्स करने के उद्देश्य से एक डांस-प्रोग्राम में ले जाता है. वहाँ अरुण पहले तो उस डांसर को सुलेखा द्वारा भेजी गयी एक ऐसी सहेली समझता है जो उसे जान से मारने के लिए भेजी गयी है. मगर थोड़ी ही देर में वह उसे (डांसर को) खुद सुलेखा ही समझना शुरू कर देता है. इतना ही नहीं, जब दादू वापस घर जाने के लिए टैक्सी लाने बाहर चला जाता है तब मौके का फायदा उठा कर वह ग्रीन-रूम में घुस जाता है और डांसर पर हमला कर देता है. दादू परेशान हो जाता है. वह पहले ही अरुण को अस्पताल (पागलखाना) में भर्ती किये जाने की अर्जी दे चुका है जहाँ से निर्देश मिलने पर उसे भर्ती करने के लिए ले जाया जाएगा. मगर उसके सामने एक अड़चन अरुण की अनिच्छा भी है. उसकी मर्जी के बगैर वह उसे अस्पताल नहीं भेजना चाहता. कहना न होगा कि यह वही अस्पताल है जहाँ कमरा नंबर 24 में रख कर देव का इलाज किया गया था.                                                           
                                      
अरुण को उस अस्पताल के कमरा नंबर 24 में भर्ती कर लिया जाता है. देव से चोट खाई हुई राधा अरुण की तीमारदारी करने से इंकार कर देती है. मजबूरी में बड़े डॉक्टर साहब एक दूसरी नर्स वीणा को उसकी सेवा में लगा देते हैं. पर वीणा से उसका मामला संभल नहीं रहा है. बड़े डॉक्टर साहब एक बार फिर राधा को मानवता की दुहाई देकर इस काम में लगाने की कोशिश करते हैं मगर राधा तैयार नहीं होती. इतना जरूर है कि राधा के मन में उथल-पुथल होने लगी है. तभी एक घटना हो जाती है. अरुण जो हमेशा वीणा को सुलेखा द्वारा उसे मारने के लिए भेजी गयी दूत समझता है उस पर बुरी तरह हमला कर देता है. वीणा किसी तरह उससे पिंड छुड़ाकर भाग रही होती है कि सामने राधा आ पड़ती है और जो थप्पड़ अरुण ने वीणा के लिए चलाया था वह राधा को लग जाता है. यह देख कर अरुण ढीला पड़ जाता है और उसे शर्मिंदगी महसूस होती है. बदले हुए हालात में राधा बड़े डॉक्टर साहब से अरुण की तीमारदारी वाली ड्यूटी माँग लेती है.   

                                        

इसी बीच राधा को देव अपनी शादी का निमंत्रण भेजता है, और मनुहार करता है कि वह जरूर आये. राधा अपने रिस्पॉन्स में मजबूरी बता कर माफी माँग लेती है. पत्र लिख लेने के बाद वह अपनी यादों के सैलाब में डूब जाती है कि किस तरह उस दिन वह देव को 'मेघदूत' भेंट करके अपने प्यार का इजहार करने वाली थी.     

                                         

अरुण की जिम्मेदारी अपने कन्धों पर ले लेने के बाद राधा जी-जान से काम में जुट जाती है. सबसे पहले वह दादू के पास पहुँचती है - अरुण की पृष्ठभूमि की जानकारी हासिल करने. दादू उसे सुलेखा के बारे में बताता है कि किस तरह सुलेखा ने, जो एक सिंगर है और सौभाग्य से सुन्दर भी, अरुण को प्रेम-जाल में फँसाया और उसके लिखे गीतों को अपने नाम से अपनी आवाज़ में गाकर ग्रामोफोन-रिकॉर्ड बनवाया जो बहुत ही प्रसिद्ध हुये. जब अरुण के सारे गीत उसने हासिल कर लिए तब उसे दूध की मक्खी की तरह अपनी जिंदगी से निकाल फेंका. दादू राधा को यह भी बताता है कि अरुण को अपनी माँ से बेहद लगाव था जो प्रायः चौड़े लाल रंग की किनारी वाली  साड़ी पहना करती थी. इसके अलावे दादू राधा को उन प्रेम-पत्रों का एक बंडल भी सौंपता है जो सुलेखा ने अरुण को लिखे थे. राधा इन जानकारियों के आधार पर अरुण को मनोवैज्ञानिक तरीके से हैंडिल करने के लिए एक दिशा पा जाती है. वह जान-बूझकर चौड़े लाल रंग की किनारी वाली साड़ी पहन कर अरुण का ही लिखा हुआ एक गीत गुनगुनाते हुए उसके कमरे में प्रवेश करती है. इस गीत को सुलेखा ने गाया है और इसके ग्रामोफोन रिकॉर्ड बहुत ही लोकप्रिय हुए हैं.
                          
अरुण के मन में सुलेखा से बदला लेने की भावना है जो बहुत ही प्रबल है इसे राधा बहुत अच्छी तरह गौर करती है. उसकी सोच है कि अगर किसी तरह सुलेखा को अरुण के सामने लाया जाय ताकि वह उसे डाँट-डपट सके, बेइज्जती कर सके - तो उसका आहत अहं किसी सीमा तक जरूर तुष्ट होगा जो उसे मानसिक तौर पर सामान्य बनाने की दिशा में शायद एक बड़ा कदम होगा. इसी बिंदु को ध्यान में रखते हुए वह सुलेखा से मिलने जाती है. 
                           
राधा सुलेखा के लिखे प्रेम-पत्रों को जरिया बनाकर एक तरह से उसे ब्लैकमेल करती है कि वो उसके साथ अस्पताल चले और अरुण से मिले. मजबूरी में सुलेखा अस्पताल आकर अरुण के सामने खड़ी होती है. अरुण उसपर जानलेवा हमला कर देता है. मगर राधा सुलेखा को बचा लेती है.           
                                     
धीरे-धीरे अरुण राधा के साथ घनिष्ट होता जा रहा है. एक दिन राधा की अनुपस्थिति में अरुण की तबियत इतनी खराब हो जाती है कि उसे इलेक्ट्रिक-शॉक दिया जाने लगता है. तभी संयोग से राधा को इसकी जानकारी मिल जाती है और वह उसी पल दौड़ते हुए इलेक्ट्रिक-शॉक वाले कमरे में प्रवेश करती है और तुरंत शॉक का दिया जाना रुकवा देती है. अरुण राधा से लिपट जाता है. इसके बाद से अरुण उसके सामीप्य में खुद को सुरक्षित समझने लगता है और खुद को उसके ज्यादा करीब पाने लगता है.     
                           
मैंने बताया था कि आगे की कहानी राधा की खामोशी के लम्बे होते चले जाने की कहानी है. अपनी पीड़ा को, अपने दर्द को अपनी खामोशी के आवरण में वह छुपा लेती है, सहन कर लेती है. लेकिन तकदीर का चक्र देखिये. अब अरुण आ गया है जिसकी तीमारदारी उसने अपनी ही मर्जी से ले ली है - इस बार मानवता के नाम पर. वह आशंकित है कि प्यार करने की एक्टिंग शायद उससे नहीं हो पायेगी, क्योंकि इस बार तो उसके मन-मंदिर में देव पहले से ही बसा है. लेकिन हाँ, उसके अंदर अरुण के प्रति ममत्व जरूर जग चुका है. इस स्थिति का हश्र क्या होने वाला है ? इसी कश्मकश में उसकी जिंदगी कठिन होती जा रही है.
राधा अरुण से प्यार नहीं कर पा रही मगर अपने कर्तव्य को छोड़ भी नहीं पा रही. अरुण ठीक होता जा रहा है और राधा के प्रति उसकी मुहब्बत बढ़ती जा रही है. इस बात को राधा अच्छी तरह समझती है. मगर वह भी हाड़-मांस की ही तो बनी है. इसलिए कभी-कभी जब वह अरुण की निकटता के पलों में होती है उसके दिमाग पर देव हावी हो जाता है और वह अरुण को देव समझने की भूल कर बैठती है. समय के साथ-साथ यह भूल बार-बार होने लगती है और उसका मानसिक संतुलन बिगड़ता चला जाता है.                                                                                      
                                    
ऊपर वाले की अजीब दुनिया है यह. राधा के मुकद्दर में देव नहीं लिखा था तो क्या अरुण के मुकद्दर में राधा लिखी हुई है ? लगता तो नहीं है. राधा माँ की ममता उड़ेल सकती है मगर महबूबा की मुहब्बत नहीं दे सकती. विडंबना है कि मुहब्बत की एक्टिंग करना उसकी मजबूरी है जिसमें वह बार-बार फेल हो जा रही है क्योंकि देव की यादें उसकी एक्टिंग पर हावी होती जाती हैं. रिजल्ट ? कहीं राधा इस कश्मकश में पागल तो नहीं हो जायेगी ? राधा इन्हीं हालात में एक सख्त फैसला लेती है - तब जब अरुण स्वस्थ हो चुका होता है और अब एकाध दिन में अस्पताल से डिस्चार्ज होने वाला है. वह अरुण से नहीं मिलने का संकल्प लेकर खुद को अपने कमरे की चारदीवारी में बंद कर लेती है.  
                                            
वही होता है जो इंसान की तकदीर लिखने वाले विधाता के कलम की भी मजबूरी होती है. आखिर राधा पागल हो जाती है. उसकी डायरी से उसकी जिंदगी का वह राज खुल जाता है जिसे उसने बड़ी खामोशी से अपने सीने में जज्ब कर रखा था. अरुण को भी पता चल जाता है कि आखिर क्यों रह-रह कर राधा की जुबान से 'देव' शब्द निकल जाया करता था. राधा की तकदीर में भी वही 24 नंबर कमरा लिखा होता है. लेकिन अरुण, देव जैसा नहीं है. जीवन लौटाने वाली राधा के साथ गुजरे एक-एक पल की याद भी उसे है और उसकी तकलीफ़ों, उसकी कश्मकश, उसकी कुर्बानी की समझ भी. अपने मजबूत इरादों को वह राधा से चीख-चीख कर बयान करता है "मैं जिंदगी की आख़िरी साँसों तक तुम्हारा इंतज़ार करुँगा राधा......इंतज़ार
करूँगा."
                                          
राधा की कहानी तो यहां ख़त्म हो गई मगर अपने पीछे कई सवाल छोड़ गई. मसलन क्या राधा ने अरुण को प्यार नहीं किया  ?

मंथन के सवालों में एक मौजूँ सवाल और भी है मगर उससे पहले इन दो लाइनों को गुनगुना भी लीजिये, सुन भी लीजिये  :  
                               तेरे जहान में ऐसा नहीं कि प्यार न हो,  
                             जहाँ उम्मीद हो इसकी वहाँ नहीं मिलता । 
                           कभी किसी को मुकम्मल जहाँ नहीं मिलता, 
                            कहीं ज़मीं तो कहीं आसमाँ नहीं मिलता ।  
                                     
वह मौजूँ सवाल यह है - जो अब आप को तय करना है - कि बड़े डॉक्टर साहब का रिसर्च सफल है या असफल ?

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