इक प्यार का नग़मा है......
बरसों पहले मेरे गुरूजी की मुलाक़ात संतोष आनंद जी से हुई थी। एक कवि-सम्मेलन में उनका पदार्पण हमारे पैतृक नगर कटिहार में हुआ था। गुरूजी तब हमलोगों की उम्र के ही होंगे - साहित्यप्रेमी तो पता नहीं किस उम्र से थे। शोर फिल्म बन चुकी थी और इक प्यार का नग़मा है आम लोगों की जुबान पर चढ़ चुका था। बस क्या था, कॉलेज के मित्रों के साथ पहुँच गये आनंद भवन जहाँ तमाम कवियों को ठहराया गया था। चार या आठ आने में 'वैशाली' नोटबुक आती थी उन दिनों - सो उसी का इस्तेमाल होना था ऑटोग्राफ लेने हेतु।
जब संतोष आनंद जी ने कलम थामी और दस्तखत करने ही वाले थे तो गुरूजी ने उन्हें रोका, "अंकल, सिर्फ दस्तखत नहीं मुझे तो कुछ और भी लिख कर देना होगा, प्लीज !!"
संतोष आनंद जी ने बड़े गौर से गुरूजी को देखा, फिर आँखें बंद कर लीं। करीब आधा या पौन मिनट के बाद उनकी आँखें खुलीं, कलम को पुनः सम्हाला और नोटबुक के पहले पन्ने पर, बिना रुके, लिखते चले गये :
हाथों की रेखायें
किस्मत के धागे
करते तो करते क्या
स्वप्न थे अभागे
दर्द थे हजारों
और मैं अकेला था
गीत थे हजारों
और मैं अकेला था
- संतोष आनंद
अपने जीवन की यादगार घटनाओं का जिक्र करने के दौरान गुरूजी के मुँह से कई बार इस प्रकरण को सुनने का मुझे मौक़ा मिला है। आज शिक्षक दिवस पर इस प्रकरण को स्मरण करते हुये इसे गुरूजी के चरणों में समर्पित करता हूँ।
कई बार उनके मुँह से "इक प्यार का नग़मा है" की व्याख्या भी सुनी है। वे कहते हैं इस कविता (इसे वे गीत न कह कर हमेशा कविता कहते हैं) में बहुत ही कम शब्दों में वैरागी कवि ने जीवन की सार्थकता और निरर्थकता का अत्यंत सूक्ष्म विश्लेषण करते हुये कुदरत की नियमित प्रक्रियाओं के सहारे मनुष्य को संघर्ष करते रहने और कभी न हार मानने की प्रेरणा दी है।
आज गुरूजी की एक शिक्षा और भी याद आ रही है और इसने कई बार मुझे हार जाने से रोका है, मजबूत बनाया है। वे कहते हैं नादान लोग जिनके पास बुद्धि की कमी होती है वे अक्सर सही निर्णय नहीं ले पाते क्योंकि वे सही तरीके से किसी भी स्थिति का विश्लेषण ही नहीं कर पाते। उस शीशे के ग्लास को जिसकी आधी ऊँचाई तक पानी भरा हो, दो तरीके से कहा जा सकता है। इसे कहा जा सकता है कि यह ग्लास आधा भरा है और इसे यह भी कहा जा सकता है कि यह ग्लास आधा खाली है। जिस व्यक्ति की निगाह में पानी का आधा "भरा होना" दिखता है वह सकारात्मक सोच का व्यक्ति है। वह हर परिस्थिति में संघर्ष करता है और कभी भी हार नहीं मानता। अनुकूल परिणाम न आने पर वह ज़रा भी विचलित नहीं होता बल्कि फिर किसी नये तरीके से, नई तैयारी करके फिर से संघर्ष करने में जुट जाता है।
इसके ठीक उलट जिस व्यक्ति को पानी का आधा "खाली होना" दिखता है वह नकारात्मक सोच का व्यक्ति है। वह प्रतिकूल परिणाम आने पर घबरा जाता है और जल्द ही हार मान लेता है।
इस कविता की एक-एक पंक्ति में जीवन का सन्देश पिरोया गया है। "तूफ़ान को आना है, आकर चले जाना है, बादल है ये कुछ पल का, छाकर ढल जाना है"। मानव जीवन में बादल रूपी झमेले, दुर्घटनायें आती जाती रहती हैं। उनसे चिपक कर बैठे रहना ठीक उसी तरह है जैसे यह कहना, समझना कि ग्लास आधा खाली है। मनुष्य को चाहिये कि वह बादलों को (यानी कठिनाइयों को) ध्यान में न लाकर उन बेहतरीन पलों को याद करे जिसे उसने (बगैर बादलों के) यानी बेहतरीन ढंग से जीया है। और वैसे ही अन्य बेहतरीन पलों की सृष्टि करने के संघर्ष में जुटा रहे। गुरूजी बार-बार कहते हैं "जीतना' या "जीतते रहना" कतई आवश्यक नहीं है। असल चीज है संघर्ष करते रहने का माद्दा रखना। जीत और हार तो हमें अपने मुकद्दर से मिलता है। जो चीज मुकद्दर के हवाले से मिलनी है उस पर क्यों माथा खपाया जाय। इसकी बजाय जो चीज ईश्वर ने हमें अपने हाथों से करने को दी है वह है कोशिश, संघर्ष।
उनकी जिन शिक्षाओं से हमारा व्यक्तित्व बना है और हम आगे बढ़ रहे हैं - बगैर निराशा को पास फटकने की इजाजत दिये - आज शिक्षक दिवस के मौके पर उनकी उन्हीं शिक्षाओं को स्मरण करते हुये पुनः उन्हें अपनी श्रद्धा अर्पित करता हूँ ।
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