एक डॉक्टर की पीड़ा : यह कितना जायज है ?

प्रस्तुत है एक बड़े ही संवेदनशील चिकित्सक डॉo शंकुल द्विवेदी (उज्जैन) की पीड़ा। आपको याद होगा कि अभी इसी अप्रैल में जब डॉक्टरों, नर्सों और अन्य सेवाकर्मियों का दल उज्जैन शहर के किसी मोहल्ले में वहाँ के निवासियों को कोरोना के प्रति जागरूक करने और सर्वे के उद्देश्य से गया  था तो उन्होंने उनके साथ कैसा दुर्व्यवहार किया था।   

और डॉo  द्विवेदी की पीड़ा पर एक अत्यन्त महत्त्वपूर्ण टिप्पणी की है प्रख्यात कम्प्यूटर वैज्ञानिक अभिषेक चौधरी ने जिन्होंने कम्प्यूटर की दुनिया में सॉफ्टवेयर बनाने की एक ऐसी प्रणाली - हिन्दवी - विकसित करके तहलका मचा दिया है जिससे अंग्रेजी नहीं जानने वाले लोग भी अपनी खुद की मातृभाषा में सॉफ्टवेयर बना सकते हैं।  

मैं बतौर ब्लॉग-लेखक न तो इन दोनों महानुभावों से शत-प्रतिशत सहमत हूँ और न ही असहमत।  मैं सिर्फ यह कहना चाहता हूँ कि इनके द्वारा उठाया गया मुद्दा हमारे देश की एक अत्यन्त गंभीर समस्या को न सिर्फ पूरी संवेदनशीलता से छूता-भर है बल्कि इनके अपने-अपने नजरिये जाग्रत समाज को न्योतते भी हैं कि हम सब भी जागें और अनछुए पहलुओं को उजागर करके किसी ठोस समाधान तक पहुंचें।  

मैं आप सभी पाठकों को आमंत्रित करता हूँ कि इस विमर्श में हिस्सा लें और समाज के प्रति अपने उत्तरदायित्व का निर्वाहन करें 

डॉo शंकुल द्विवेदी (उज्जैन) का आलेख (जैसा कि उन्होंने अपने फेसबुक पर पोस्ट किया है) : 

मैंने कुछ दिन पहले उज्जैन में डाक्टरों पर हुए हमले के बारे में एक पोस्ट साझा करी। मेरे एक मेरे एक मित्र ने टिप्पणी करते हुए कहा डॉक्टर सीधे मुंह जवाब नहीं देते, क्या हालत और क्या ट्रीटमेंट चल रहा इसकी भी जानकारी नहीं देते (मरीज़ से मिलना पहले ही मना है) इसलिए इनका पिटना जरूरी है। उन्होंने आगे कहा लातों के भूत बातों से नहीं मानते।

मन बहुत व्यथित हुआ कि आम जनता हमारे कर्तव्य परायण होने पर शक करती है। अपना सर्वस्व न्योछावर करके, दिन रात बिना सैलरी के ओवरटाइम ड्यूटी करते हैं, मरीज़ को बचाने और उचित इलाज हो इसका हरसंभव प्रयास करते हैं। अपने घर से दूर रहते हैं कि हॉस्पिटल से इंफेक्शन न ले जाएं। इतनी समस्याओं हैं कि शायद लिख भी नहीं सकता। फिर भी ऐसा सुनने को मिलता है।

हर तालाब की कुछ मछलियां गंदी होती हैं (पूरे तालाब की नहीं)। लूट मचा कर जनता को त्रस्त करते हैं। पर इन चंद लोगों के परे पूरी एक ऐसी फौज भी है जो अपने कर्तव्य का निर्वहन पूरी ईमानदारी और निष्ठा से करती है। कमसकम उनके बारे में विचार करें।

कुछ असुविधाएं हैं लेकिन समय भी कुछ ऐसा है कि क्या करें- जैसे परिजन मरीज़ को देख- मिल नहीं पाते, ऐसे में हमेशा में एक शंका बनी रहती की इलाज सही चल रहा या नहीं, दवाई ठीक से दे रहे या नहीं। इसके लिए सरकार और अस्पातल प्रबंधन कुछ इंतजाम कर सकते हैं ताकि भरोसा मिलता रहे की सब सही चल रहा। मर्चुरी में शवों के साथ जो हो रहा बहुत है अमानवीय है एवं तुरंत सुधार होना चाहिए। इसमें भी अस्पताल प्रबंधन को प्रयास करना चाहिए।

मैंने समझा कि अस्पताल में आने से लेकर वहां से जाने तक की हर चीज़ में यदि कोई व्यक्ति जिम्मेदार है तो वह है डॉक्टर, कोई भी किसी भी कदम पर गलत हुआ तो दोषी है डॉक्टर, दवाई नहीं मिली पा रही तो दोषी है डॉक्टर। जबकि हर कदम में सबके अपने अपने भिन्न दायित्व हैं। कुछ चीजें डॉक्टर के कंट्रोल के परे हैं। दोनों ओर से सुधार की गुंजाइश है। लेकिन इसका हल हिंसा तो बिल्कुल भी नहीं है।

जय हिंद

डॉ शंकुल द्विवेदी🙏

कo वैo अभिषेक चौधरी की टिप्पणी 

बहुत ही मार्मिक और सटीक वर्णन किया है आपने परिस्थिति का।

लोकाचार की यह समस्याएँ तभी मिट पाएँगी जब सही तरह से पेशेंट पार्टी को संबोधित किया जा सके। उन्हें हेल्थकेयर की पूरी रूपरेखा समझाई जा सके। या कहें तो पेशेंट पार्टी को, या आम जनमानस को, स्वास्थ्य सेवाओं के विषय में, हेल्थकेयर की संरचना के विषय में जागरूक किया जा सके।

यह काम हम आप नहीं कर सकते। इसलिए नहीं कि हम अक्षम है। बल्कि इसलिए क्योंकि जो रेशियो हैं वो बड़े ही विकृत हैं। इतने पेशेंट पार्टी तक या इतने आम जनता तक हम पहुँचेंगे कैसे?

1200 से 1500 पेशेंट के लिए एक डॉक्टर। व्यक्ति तभी जुड़ता है हेल्थकेयर के साथ या चिकित्सा संस्थानों के साथ जब उसे लगता है कि उसे चिकित्सा की आवश्यकता है। व्यंगात्मक दृष्टि से ऐसे बोले कि व्यक्ति तभी जुड़ता है जब उसके जान पे बन आती है। अगर सही समय पर चिकित्सा संस्थान के साथ जुड़ जाये तो चिकित्सा के परिणाम बहुत बेहतर हो सकते हैं।

तो शारीरिक समस्या जटिल होने से पहले पेशेंट क्या करते हैं? जो नुस्खे वाले टीवी सीरियल और टीवी एड आते हैं उन्हें देखते रहते हैं।

इससे और क्या आशा रख सकते हैं। भ्रांतियाँ ही उत्पन्न होंगी।

इन सब का फायदा वे लोग उठाते हैं जिनके लिए हेल्थकेयर केवल मात्र एक फायदा कमाने का जरिया है। वे लोग कौन है, आप स्वयं समझ सकते हैं। डॉक्टर नर्स अथवा कोई भी दूसरा हेल्थकेयर प्रोफेशनल कभी भी पेशेंट को फायदे के नजरिए से नहीं देखेगा।

डाॅक्टर या नर्स या अन्य हेल्थ प्रोफेशनल अपने कर्तव्य के प्रति सजग और निष्ठावान रहते हैं। परन्तु ये बात उन लोगों पर लागू नहीं होती जो हेल्थकेयर से केवल मात्र कमाना चाहते हैं।

यहां एक बात उल्लेखित कर दूँ कि हेल्थकेयर से लोग कमायें इसमें कोई आपत्ति नहीं होनी चाहिए। आपत्ति इस बात से है कि वे लोग कमाने के उपरांत अपने कर्तव्य का निर्वहन नहीं करते हैं।

हेल्थकेयर से फायदा कमाने वाली संस्थाएँ अथवा जो बिजनेस हैं वे अगर अपनी आमदनी का एक हिस्सा डाॅक्टर से पेशेंट का कनेक्शन बनाने में दें तो सोचिए यह परिस्थिति कितनी सुधर सकती है।

ऐसा नहीं है कि कोई भी संस्थाएँ इस क्षेत्र में काम नहीं कर रहे। मेरे नजरिये में अधिक से अधिक कुल संस्थाओं में से पांच या 10 प्रतिशत ही ऐसे मंचों के विकास की ओर ध्यान दे रहे हैं जहाँ डॉक्टर और पेशेंट आपस मे वार्ता कर सकें। वे लोग जो स्वस्थ हैं उन्हें डाॅक्टर समझा सके कि हेल्थकेयर की रूपरेखा क्या है।

इस कार्य मे आप जैसा युवा ऊर्जावान और जागरूक डॉक्टरों की बहुत ही अहम भूमिका है।

सोशल मीडिया के माध्यम से लोगों तक हेल्थकेयर संबंधी सही जागरूकता फैलाने के प्रति क्या किया जा सकता है इस पर विचार करना चाहिए।

हर हेल्थकेयर प्रोफेशनल या कहें तो मेडिकल स्टूडेंट के लेवल से सप्ताह में कम से कम दो या तीन बार सोशल मीडिया पर हेल्थकेयर संबंधी भ्रांतियों को दूर करने के उद्देश्य से एक दो पोस्ट लिखें।

डेढ़ सौ करोड़ लोगों तक पहुंच पाना आसान काम नहीं है। परन्तु ये असम्भव भी नहीं है।

एक बार पुनः आपके विचारों के प्रति साधुवाद।


इक प्यार का नग़मा है......

 इक प्यार का नग़मा है......

बरसों पहले मेरे गुरूजी की मुलाक़ात संतोष आनंद जी से हुई  थी।  एक कवि-सम्मेलन में उनका पदार्पण हमारे पैतृक नगर कटिहार में हुआ था। गुरूजी तब हमलोगों की उम्र के ही होंगे - साहित्यप्रेमी तो पता नहीं किस उम्र से थे। शोर फिल्म बन चुकी थी और इक प्यार का नग़मा है आम लोगों की जुबान पर चढ़ चुका था। बस क्या था, कॉलेज के मित्रों के साथ पहुँच गये आनंद भवन जहाँ तमाम कवियों को ठहराया गया था। चार या आठ आने में 'वैशाली' नोटबुक आती थी उन दिनों - सो उसी का इस्तेमाल होना था ऑटोग्राफ लेने हेतु। 

जब संतोष आनंद जी ने कलम थामी और दस्तखत करने ही वाले थे तो गुरूजी ने उन्हें रोका, "अंकल, सिर्फ दस्तखत नहीं मुझे तो कुछ और भी लिख कर देना होगा, प्लीज !!"

संतोष आनंद जी ने बड़े गौर से गुरूजी को देखा, फिर आँखें बंद कर लीं।  करीब आधा या पौन मिनट के बाद उनकी आँखें खुलीं, कलम को पुनः सम्हाला और नोटबुक के पहले पन्ने पर, बिना रुके, लिखते चले गये :

हाथों की रेखायें

किस्मत के धागे 

करते तो करते क्या 

स्वप्न थे अभागे 

दर्द थे हजारों 

और मैं अकेला था

गीत थे हजारों 

और मैं अकेला था 

           -  संतोष आनंद 


अपने जीवन की यादगार घटनाओं का जिक्र करने के दौरान गुरूजी के मुँह से कई बार इस प्रकरण को सुनने का मुझे मौक़ा मिला है। आज शिक्षक दिवस पर इस प्रकरण को स्मरण करते हुये इसे गुरूजी के चरणों में समर्पित करता हूँ।  

कई बार उनके मुँह से "इक प्यार का नग़मा है" की व्याख्या भी सुनी है। वे कहते हैं इस कविता (इसे वे गीत न कह कर हमेशा कविता कहते हैं) में बहुत ही कम शब्दों में वैरागी कवि ने जीवन की सार्थकता और निरर्थकता का अत्यंत सूक्ष्म विश्लेषण करते हुये कुदरत की नियमित प्रक्रियाओं के सहारे मनुष्य को संघर्ष करते रहने और कभी न हार मानने की प्रेरणा दी है।

आज गुरूजी की एक शिक्षा और भी याद आ रही है और इसने कई बार मुझे हार जाने से रोका है, मजबूत बनाया है। वे कहते हैं नादान लोग जिनके पास बुद्धि की कमी होती है वे अक्सर सही निर्णय नहीं ले पाते क्योंकि वे सही तरीके से किसी भी स्थिति का विश्लेषण ही नहीं कर पाते। उस शीशे के ग्लास को जिसकी आधी ऊँचाई तक पानी भरा हो, दो तरीके से कहा जा सकता है। इसे कहा जा सकता है कि यह ग्लास आधा भरा है और इसे यह भी कहा जा सकता है कि यह ग्लास आधा खाली है। जिस व्यक्ति की निगाह में पानी का आधा "भरा होना" दिखता है वह सकारात्मक सोच का व्यक्ति है। वह हर परिस्थिति में संघर्ष करता है और कभी भी हार नहीं मानता।  अनुकूल परिणाम न आने पर वह ज़रा भी विचलित नहीं होता बल्कि फिर किसी नये तरीके से, नई तैयारी करके फिर से संघर्ष करने में जुट जाता है।

इसके ठीक उलट जिस व्यक्ति को पानी का आधा "खाली होना" दिखता है वह नकारात्मक सोच का व्यक्ति है। वह प्रतिकूल परिणाम आने पर घबरा जाता है और जल्द ही हार मान लेता है। 

इस कविता की एक-एक पंक्ति में जीवन का सन्देश पिरोया गया है।  "तूफ़ान को आना है, आकर चले जाना है, बादल है ये कुछ पल का, छाकर ढल जाना है"।  मानव जीवन में बादल रूपी झमेले, दुर्घटनायें आती जाती रहती हैं।  उनसे चिपक कर बैठे रहना ठीक उसी तरह है जैसे यह कहना, समझना कि ग्लास आधा खाली है।  मनुष्य को चाहिये कि वह बादलों को (यानी कठिनाइयों को) ध्यान में न लाकर उन बेहतरीन पलों को याद करे जिसे उसने (बगैर बादलों के) यानी बेहतरीन ढंग से जीया है।  और वैसे ही अन्य बेहतरीन पलों की सृष्टि करने के संघर्ष में जुटा रहे।  गुरूजी बार-बार कहते हैं "जीतना' या "जीतते रहना" कतई आवश्यक नहीं है।  असल चीज है संघर्ष करते रहने का माद्दा रखना।  जीत और हार तो हमें अपने मुकद्दर से मिलता है।  जो चीज मुकद्दर के हवाले से मिलनी है उस पर क्यों माथा खपाया जाय।  इसकी बजाय जो चीज ईश्वर ने हमें अपने हाथों से करने को दी है वह है कोशिश, संघर्ष। 

उनकी जिन शिक्षाओं से हमारा व्यक्तित्व बना है और हम आगे बढ़ रहे हैं - बगैर निराशा को पास फटकने की इजाजत दिये - आज शिक्षक दिवस के मौके पर उनकी उन्हीं शिक्षाओं को स्मरण करते हुये पुनः उन्हें अपनी श्रद्धा अर्पित करता हूँ । 

आपने कभी प्यार किया है ?

"आपने कभी प्यार किया है ?"

मेरे इस सवाल पर आपके जवाब क्या हो सकते हैं, क्या-क्या हो सकते हैं, मैं जानता हूँ. इसलिये जवाब देने की उलझनों में आपको नहीं डालूँगा. मैंने कभी प्यार नहीं किया...... हाँ, एक लड़की को मैं बहुत चाहता था, मगर वह मुझे पसंद नहीं करती थी...... मुझे एक लड़का बहुत अच्छा लगता था मगर मैं उसे कभी यह बात बोल नहीं पाई..... मैंने जिससे प्यार किया उसने किसी और लड़की से शादी रचा ली..... हमदोनों एक-दूसरे को हद से ज्यादा प्यार करते थे पर हमारे माता-पिता ने हमारी शादी नहीं होने दी..... मेरी बेरोजगारी ने मेरी महबूबा को मुझसे जुदा कर दिया..... वगैरह, वगैरह वगैरह. लिहाजा, आप परेशान न हों. हजारों तजुर्बे होंगे, लाखों एहसासों से इंसान गुजरा होगा. मगर, एकाध अपवादों को छोड़ दें तो कभी किसी को 'मुकम्मल जहाँ' नहीं मिलता. जिगर मुरादाबादी साहब तो पहले ही फरमा गए थे.... ये इश्क नहीं आसाँ इतना ही समझ लीजे, इक आग का दरिया है और डूब के जाना है. 

कायनात जब से बनी मुहब्बत तब से जिन्दा है. जिन्दा है तभी तक कायनात है. ये बात दीगर है कि शायद ही किसी के हिस्से यह मकबूल एहसास सौ फीसदी पड़ा हो. 

तेरे जहान में ऐसा नहीं कि प्यार न हो,
  जहाँ उम्मीद हो इसकी वहाँ नहीं मिलता ।    
कभी किसी को मुकम्मल जहाँ नहीं मिलता, 
कहीं ज़मीं तो कहीं आसमाँ नहीं मिलता ।  
                                                             - निदा फ़ाज़ली 

राधा हाड़-मांस की बनी एक ऐसी ही शख्शियत है. पेशे से नर्स. ड्यूटी मिलती है देव नाम के एक ऐसे मरीज की तीमारदारी करने की जो मानसिक रूप से विकलांग हो गया है. यह विकलांगता कैसी है ? मुहब्बत में ठुकरा दिए गए सभी आशिक पागल नहीं हो जाते. मगर देव हो गया है - शायद अधिक जज्बाती रहा होगा. राधा को उसकी तीमारदारी करने के नाम पर जो ड्यूटी असल में मिली है वह है देव से मुहब्बत की एक्टिंग करने की. यह कैसी बात हुई ? 

अस्पताल (पागलखाना) के बड़े डॉक्टर साहब एक ख़ास किस्म की मानसिक बीमारी - जिसका नाम "एक्यूट मेनिया" है - पर रिसर्च कर रहे हैं. मुहब्बत में ठुकरा दिए गए लोगों के दिमाग में एक अलग तरह का झंझावात चल रहा होता है और यह बीमारी उन्हीं लोगों में से कुछ को होती है. उनका आसान इलाज कैसे हो उसी की खोज में है यह रिसर्च. वे नहीं चाहते कि उनको परम्परागत दवाओं से या इलेक्ट्रिक शॉक देकर ठीक किया जाये. उनका खयाल है कि आशिकी में दुत्कारे गए ऐसे बीमार लोग अपनी महबूबा में अक्स देखा करते हैं अपनी माँ का. वे दुहरा धक्का बर्दाश्त नहीं कर पाते - एक महबूबा की मुहब्बत का और दूसरा माँ की ममता का. डॉक्टर साहब की सोच है कि नकली तरीके से यानी एक्टिंग के जरिये अगर इस तरह के मरीजों को 'महबूबा' जैसी मुहब्बत और 'माँ' जैसी ममता दी जाए तो धीरे-धीरे वह सामान्य हो जाएगा, स्वस्थ हो जाएगा. और इस काम के लिए उन्होंने चुना है अपने अस्पताल की सबसे योग्य नर्स राधा को.

अब यहाँ कहानी में एक मोड़ आता है. यह कि एक्टिंग करते-करते राधा देव को सचमुच प्यार करने लगती है. भूल जाती है कि उसके एक्टिंग की सीमा सिर्फ एक्टिंग तक ही सीमित थी. मगर आखिर वह हाड़-मांस की एक इंसान ही तो है !! प्यार, मुहब्बत, इश्क चाहे जो नाम दे लें - प्लान बनाकर करने की चीज थोड़े ही है. यह तो किसी से भी, कभी भी बस हो जाता है. कोई प्लान बनाकर इस एहसास को ख़त्म कर देना चाहे तो क्या यह ख़त्म हो सकता है ? नहीं, हर्गिज नहीं. इसीलिये राधा को अगर यह बात याद आई भी हो कि उसे तो एक्टिंग, और सिर्फ एक्टिंग, ही करनी है तब पर भी वह अपने आप को रोक नहीं सकी. सो, वह उसे प्यार करने लगती है. उसे लगता है कि देव भी उसे प्यार करता है. वह भूल जाती है कि उसके प्यार के रिस्पॉन्स में देव नाम का यह मरीज भी 'प्यार करने जैसा' जो कुछ कर रहा है, वह मेडिकल साइंस के लिए सिर्फ एक संकेत-भर है कि मरीज 'ठीक' हो रहा है. और अचानक एक दिन, जब वह पूरी तरह स्वस्थ हो चुके देव को - अपने प्यार का इजहार करने के लिए - महाकवि कालीदास का प्रेम-काव्य 'मेघदूत' भेंट करने जाती है, तब उसे यह जानकर जोर का एक धक्का लगता है कि - देव उसे प्यार नहीं करता. उसका दिल बुरी तरह टूट जाता है. मगर वह कर ही क्या सकती है - वह तो दुनिया वालों की निगाह में सिर्फ एक नर्स-भर है जो अभी तक अपनी ड्यूटी ही कर रही थी. और देव ? अब वह क्या करता है ? क्या करने वाला है ? उसे कहाँ मालूम है कि राधा उसे सच में प्यार करने लगी है ! मालूम भी होता तो वह क्या कर लेता, कौन जाने ! आखिर उसकी निगाह में भी वह एक नर्स के अलावे कहाँ कुछ है ! कैसी अजीब विडम्बना है कि जिस महबूबा की ठोकर खाकर वह पागल हो गया था उसी से अब उसकी शादी होने वाली है !! देव के परिवार वाले अस्पताल से छुट्टी दिला कर उसे घर ले जाते हैं. 

और राधा ? वह अस्पताल की आठवीं मंजिल की बालकोनी में खड़ी होकर पथराई आँखों से देव का जाना देख रही है. देव की कार धीरे-धीरे सरकती जा रही है और आखिर आँखों से ओझल हो जाती है..... राधा धीरे-धीरे पीछे हटते हुए दीवार से टिक जाती है....... खामोशी से.

तो, क्या कहानी यहाँ पर ख़त्म हो गई ? जी नहीं, बल्कि ठीक इसी दृश्य से एक फिल्म शुरू होती है - जिसका नाम है 'खामोशी' और कहानी के जिस हिस्से से आप अभी तक रू-ब-रू हो चुके हैं, वह इसी फिल्म का हिस्सा था. असल में राधा की यादों के सैलाब में से उभर-उभर कर कहानी का उतना हिस्सा फिल्म में रह-रहकर गुजरता है जो आप देख चुके हैं (यानी पढ़ चुके हैं). जाहिर है, इन यादों को फिल्म में 'फ्लैशबैक' के माध्यम से दिखाया गया है.

बाकी का हिस्सा ? उसका क्या हुआ ? देव तो चला गया. राधा को उसका प्यार मिलना नसीब न हुआ. वह खामोश रही, अपने आँसू पी लिये. किसी को कुछ नहीं बताया. और आगे की कहानी राधा की खामोशी के लम्बे होते चले जाने की कहानी है. उसकी व्यथा कोई नहीं जान पाता. उसकी खामोशी अपने क्लाइमेक्स पर आकर टूटती जरूर है मगर तब तक सब कुछ उजड़ चुका होता है...... और रिसर्च के अंजाम का क्या हुआ ? सफल या असफल ? इसे आप खुद से तय कीजिये. फिल्म के सार-संक्षेप को जानकर. तो लीजिये, फिल्म 'खामोशी' के सार-संक्षेप का आनन्द लीजिये - ऑडियो-विजुअल इफेक्ट के साथ.

हाँ, एक बात और ! फिल्म में राधा का किरदार निभाया है वहीदा रहमान ने, देव का धर्मेंद्र ने, अरुण का राजेश खन्ना ने और बड़े डॉक्टर साहब का नाजिर हुसैन ने. बाँग्ला-भाषा के चोटी के साहित्यकार आशुतोष मुख़र्जी की कहानी 'नर्स मित्रा' पर आधारित इस फिल्म को निर्देशित किया है - हिन्दी और बाँग्ला फिल्मों के नामी-गिरामी फिल्मकार असित सेन ने. और गुलज़ार के गीतों को धुन दिया है हेमंत कुमार ने.  

ooooo


जैसा कि आप पढ़ चुके हैं, देव (धर्मेंद्र) के घर वाले उसे अस्पताल से वापस घर ले जा रहे हैं. कार धीरे-धीरे आँखों से ओझल होती जा रही है. राधा (वहीदा रहमान) आठवीं मंज़िल की बालकॉनी से उसे जाते देख रही है - पथराई आँखों से......
                                                                                                            
             
अस्पताल के 24 नंबर का कमरा रिजर्व रखा गया है उस मरीज के लिए जिस पर रिसर्च किया जाना होता है. और यही वह कमरा है जहाँ देव को रखा गया था.  बड़े डॉक्टर साहब (नाजिर हुसैन) चाहते हैं कि एक बार फिर से उसी मनोरोग से ग्रस्त किसी मरीज के इलाज की कोशिश, उसी तरीके से, की जाये और यदि सफलता इस बार भी मिल जाती है तो यह कन्फर्म हो जायेगा कि रिसर्च वास्तव में सफल रहा है. और तब इसे मेडिकल  साइन्स में एक ऐतिहासिक योगदान ही नहीं बल्कि एक वरदान के रूप में याद रखा जायेगा. उनका मानना है कि इससे उन तमाम मरीजों के आसान इलाज का रास्ता खुल जायेगा जो इस बीमारी से ग्रस्त हैं. इस बार कमरा नंबर 24 के लिये जिस मरीज को चुना जाता है उसका नाम है अरुण चौधरी और उसे वही बीमारी है जिससे देव ग्रस्त था.                                                                                                                                                             
                                    
अब कहानी में इंट्री होती है अरुण की यानी अरुण चौधरी (राजेश खन्ना) की. वह लेखक है, शायर है, गीतकार है. माँ-बाप पैसे वाले थे मगर अब वे जिन्दा नहीं हैं. और जिन्दा भाई-बहनों से उसका नाता टूट चुका है क्योंकि उनलोगों को अरुण की लेखकगिरी पसंद नहीं है. एक 'दादू' (अनवर हुसैन) भी है जो उसका कोई नहीं है मगर बहुत-कुछ है - यानी दोस्त, भाई, बाप सब कुछ. भाई-बहनों को छोड़ आने के बाद अरुण दादू के साथ ही रहता है.

अरुण की प्रेमिका सुलेखा (स्नेहलता) गायिका है और उसने 'फक्कड़' अरुण के साथ अपना रिश्ता बड़ी बेरहमी से तोड़ लिया है - सिर्फ इसलिए कि अपना 'करियर' बनाने के लिए उसे यह करना जरूरी लगा है. अरुण इस ठोकर को बर्दाश्त नहीं कर पाता है और धीरे-धीरे अपना मानसिक संतुलन खोता जा रहा है. दादू उसको मानसिक रूप से थोड़ा रिलैक्स करने के उद्देश्य से एक डांस-प्रोग्राम में ले जाता है. वहाँ अरुण पहले तो उस डांसर को सुलेखा द्वारा भेजी गयी एक ऐसी सहेली समझता है जो उसे जान से मारने के लिए भेजी गयी है. मगर थोड़ी ही देर में वह उसे (डांसर को) खुद सुलेखा ही समझना शुरू कर देता है. इतना ही नहीं, जब दादू वापस घर जाने के लिए टैक्सी लाने बाहर चला जाता है तब मौके का फायदा उठा कर वह ग्रीन-रूम में घुस जाता है और डांसर पर हमला कर देता है. दादू परेशान हो जाता है. वह पहले ही अरुण को अस्पताल (पागलखाना) में भर्ती किये जाने की अर्जी दे चुका है जहाँ से निर्देश मिलने पर उसे भर्ती करने के लिए ले जाया जाएगा. मगर उसके सामने एक अड़चन अरुण की अनिच्छा भी है. उसकी मर्जी के बगैर वह उसे अस्पताल नहीं भेजना चाहता. कहना न होगा कि यह वही अस्पताल है जहाँ कमरा नंबर 24 में रख कर देव का इलाज किया गया था.                                                           
                                      
अरुण को उस अस्पताल के कमरा नंबर 24 में भर्ती कर लिया जाता है. देव से चोट खाई हुई राधा अरुण की तीमारदारी करने से इंकार कर देती है. मजबूरी में बड़े डॉक्टर साहब एक दूसरी नर्स वीणा को उसकी सेवा में लगा देते हैं. पर वीणा से उसका मामला संभल नहीं रहा है. बड़े डॉक्टर साहब एक बार फिर राधा को मानवता की दुहाई देकर इस काम में लगाने की कोशिश करते हैं मगर राधा तैयार नहीं होती. इतना जरूर है कि राधा के मन में उथल-पुथल होने लगी है. तभी एक घटना हो जाती है. अरुण जो हमेशा वीणा को सुलेखा द्वारा उसे मारने के लिए भेजी गयी दूत समझता है उस पर बुरी तरह हमला कर देता है. वीणा किसी तरह उससे पिंड छुड़ाकर भाग रही होती है कि सामने राधा आ पड़ती है और जो थप्पड़ अरुण ने वीणा के लिए चलाया था वह राधा को लग जाता है. यह देख कर अरुण ढीला पड़ जाता है और उसे शर्मिंदगी महसूस होती है. बदले हुए हालात में राधा बड़े डॉक्टर साहब से अरुण की तीमारदारी वाली ड्यूटी माँग लेती है.   

                                        

इसी बीच राधा को देव अपनी शादी का निमंत्रण भेजता है, और मनुहार करता है कि वह जरूर आये. राधा अपने रिस्पॉन्स में मजबूरी बता कर माफी माँग लेती है. पत्र लिख लेने के बाद वह अपनी यादों के सैलाब में डूब जाती है कि किस तरह उस दिन वह देव को 'मेघदूत' भेंट करके अपने प्यार का इजहार करने वाली थी.     

                                         

अरुण की जिम्मेदारी अपने कन्धों पर ले लेने के बाद राधा जी-जान से काम में जुट जाती है. सबसे पहले वह दादू के पास पहुँचती है - अरुण की पृष्ठभूमि की जानकारी हासिल करने. दादू उसे सुलेखा के बारे में बताता है कि किस तरह सुलेखा ने, जो एक सिंगर है और सौभाग्य से सुन्दर भी, अरुण को प्रेम-जाल में फँसाया और उसके लिखे गीतों को अपने नाम से अपनी आवाज़ में गाकर ग्रामोफोन-रिकॉर्ड बनवाया जो बहुत ही प्रसिद्ध हुये. जब अरुण के सारे गीत उसने हासिल कर लिए तब उसे दूध की मक्खी की तरह अपनी जिंदगी से निकाल फेंका. दादू राधा को यह भी बताता है कि अरुण को अपनी माँ से बेहद लगाव था जो प्रायः चौड़े लाल रंग की किनारी वाली  साड़ी पहना करती थी. इसके अलावे दादू राधा को उन प्रेम-पत्रों का एक बंडल भी सौंपता है जो सुलेखा ने अरुण को लिखे थे. राधा इन जानकारियों के आधार पर अरुण को मनोवैज्ञानिक तरीके से हैंडिल करने के लिए एक दिशा पा जाती है. वह जान-बूझकर चौड़े लाल रंग की किनारी वाली साड़ी पहन कर अरुण का ही लिखा हुआ एक गीत गुनगुनाते हुए उसके कमरे में प्रवेश करती है. इस गीत को सुलेखा ने गाया है और इसके ग्रामोफोन रिकॉर्ड बहुत ही लोकप्रिय हुए हैं.
                          
अरुण के मन में सुलेखा से बदला लेने की भावना है जो बहुत ही प्रबल है इसे राधा बहुत अच्छी तरह गौर करती है. उसकी सोच है कि अगर किसी तरह सुलेखा को अरुण के सामने लाया जाय ताकि वह उसे डाँट-डपट सके, बेइज्जती कर सके - तो उसका आहत अहं किसी सीमा तक जरूर तुष्ट होगा जो उसे मानसिक तौर पर सामान्य बनाने की दिशा में शायद एक बड़ा कदम होगा. इसी बिंदु को ध्यान में रखते हुए वह सुलेखा से मिलने जाती है. 
                           
राधा सुलेखा के लिखे प्रेम-पत्रों को जरिया बनाकर एक तरह से उसे ब्लैकमेल करती है कि वो उसके साथ अस्पताल चले और अरुण से मिले. मजबूरी में सुलेखा अस्पताल आकर अरुण के सामने खड़ी होती है. अरुण उसपर जानलेवा हमला कर देता है. मगर राधा सुलेखा को बचा लेती है.           
                                     
धीरे-धीरे अरुण राधा के साथ घनिष्ट होता जा रहा है. एक दिन राधा की अनुपस्थिति में अरुण की तबियत इतनी खराब हो जाती है कि उसे इलेक्ट्रिक-शॉक दिया जाने लगता है. तभी संयोग से राधा को इसकी जानकारी मिल जाती है और वह उसी पल दौड़ते हुए इलेक्ट्रिक-शॉक वाले कमरे में प्रवेश करती है और तुरंत शॉक का दिया जाना रुकवा देती है. अरुण राधा से लिपट जाता है. इसके बाद से अरुण उसके सामीप्य में खुद को सुरक्षित समझने लगता है और खुद को उसके ज्यादा करीब पाने लगता है.     
                           
मैंने बताया था कि आगे की कहानी राधा की खामोशी के लम्बे होते चले जाने की कहानी है. अपनी पीड़ा को, अपने दर्द को अपनी खामोशी के आवरण में वह छुपा लेती है, सहन कर लेती है. लेकिन तकदीर का चक्र देखिये. अब अरुण आ गया है जिसकी तीमारदारी उसने अपनी ही मर्जी से ले ली है - इस बार मानवता के नाम पर. वह आशंकित है कि प्यार करने की एक्टिंग शायद उससे नहीं हो पायेगी, क्योंकि इस बार तो उसके मन-मंदिर में देव पहले से ही बसा है. लेकिन हाँ, उसके अंदर अरुण के प्रति ममत्व जरूर जग चुका है. इस स्थिति का हश्र क्या होने वाला है ? इसी कश्मकश में उसकी जिंदगी कठिन होती जा रही है.
राधा अरुण से प्यार नहीं कर पा रही मगर अपने कर्तव्य को छोड़ भी नहीं पा रही. अरुण ठीक होता जा रहा है और राधा के प्रति उसकी मुहब्बत बढ़ती जा रही है. इस बात को राधा अच्छी तरह समझती है. मगर वह भी हाड़-मांस की ही तो बनी है. इसलिए कभी-कभी जब वह अरुण की निकटता के पलों में होती है उसके दिमाग पर देव हावी हो जाता है और वह अरुण को देव समझने की भूल कर बैठती है. समय के साथ-साथ यह भूल बार-बार होने लगती है और उसका मानसिक संतुलन बिगड़ता चला जाता है.                                                                                      
                                    
ऊपर वाले की अजीब दुनिया है यह. राधा के मुकद्दर में देव नहीं लिखा था तो क्या अरुण के मुकद्दर में राधा लिखी हुई है ? लगता तो नहीं है. राधा माँ की ममता उड़ेल सकती है मगर महबूबा की मुहब्बत नहीं दे सकती. विडंबना है कि मुहब्बत की एक्टिंग करना उसकी मजबूरी है जिसमें वह बार-बार फेल हो जा रही है क्योंकि देव की यादें उसकी एक्टिंग पर हावी होती जाती हैं. रिजल्ट ? कहीं राधा इस कश्मकश में पागल तो नहीं हो जायेगी ? राधा इन्हीं हालात में एक सख्त फैसला लेती है - तब जब अरुण स्वस्थ हो चुका होता है और अब एकाध दिन में अस्पताल से डिस्चार्ज होने वाला है. वह अरुण से नहीं मिलने का संकल्प लेकर खुद को अपने कमरे की चारदीवारी में बंद कर लेती है.  
                                            
वही होता है जो इंसान की तकदीर लिखने वाले विधाता के कलम की भी मजबूरी होती है. आखिर राधा पागल हो जाती है. उसकी डायरी से उसकी जिंदगी का वह राज खुल जाता है जिसे उसने बड़ी खामोशी से अपने सीने में जज्ब कर रखा था. अरुण को भी पता चल जाता है कि आखिर क्यों रह-रह कर राधा की जुबान से 'देव' शब्द निकल जाया करता था. राधा की तकदीर में भी वही 24 नंबर कमरा लिखा होता है. लेकिन अरुण, देव जैसा नहीं है. जीवन लौटाने वाली राधा के साथ गुजरे एक-एक पल की याद भी उसे है और उसकी तकलीफ़ों, उसकी कश्मकश, उसकी कुर्बानी की समझ भी. अपने मजबूत इरादों को वह राधा से चीख-चीख कर बयान करता है "मैं जिंदगी की आख़िरी साँसों तक तुम्हारा इंतज़ार करुँगा राधा......इंतज़ार
करूँगा."
                                          
राधा की कहानी तो यहां ख़त्म हो गई मगर अपने पीछे कई सवाल छोड़ गई. मसलन क्या राधा ने अरुण को प्यार नहीं किया  ?

मंथन के सवालों में एक मौजूँ सवाल और भी है मगर उससे पहले इन दो लाइनों को गुनगुना भी लीजिये, सुन भी लीजिये  :  
                               तेरे जहान में ऐसा नहीं कि प्यार न हो,  
                             जहाँ उम्मीद हो इसकी वहाँ नहीं मिलता । 
                           कभी किसी को मुकम्मल जहाँ नहीं मिलता, 
                            कहीं ज़मीं तो कहीं आसमाँ नहीं मिलता ।  
                                     
वह मौजूँ सवाल यह है - जो अब आप को तय करना है - कि बड़े डॉक्टर साहब का रिसर्च सफल है या असफल ?

बेशक इसे आप यू-टर्न कह लें मगर.....



आज (यानी 23.05.20 को, जब मैं यह लेख लिखने बैठा हूँ) पूरे एक महीने होने चले. मैंने अपने पिछले लेख में समस्त देशवासियों से जोरदार शब्दों में देश के प्रधानमंत्री के निर्देशों पर आँख बंद करके चलने का आह्वान किया था - कन्धे से कन्धा मिलाकर उनके साथ चलने की, उनका साथ देने की प्रार्थना की थी. उसके भी एक महीना पहले (यानी 22  मार्च 2020) से ही - जब सारे देशवासियों ने "जनता कर्फ्यू" का पालन करते हुये ताली, थाली और घंटियाँ बजाकर, मोमबत्तियाँ और दिये जलाकर अपने सर्वोच्च नायक को अपना समर्थन देने का इरादा जताया था - पूरे देश ने अभीतक एक जुट होकर कोरोना की जंग में मोदी जी का हाथ बँटाया ही है........

मगर तब से अब तक गंगा में पानी बहुत बह चुका है. इतना कि अब यह जाँचने की बारी आ गयी है कि हमारे नायक ने कोरोना की इस लड़ाई में अपने हिस्से की जिम्मेदारी बखूबी निभाई है या नहीं, निभा रहे हैं या नहीं. 

जरा निम्नलिखित तथ्यों को ध्यान में लाइये :

01.  31 दिसंबर 2019 को चीन के वुहान म्यूनिसिपल हेल्थ कमीशन ने WORLD HEALTH ORGANIZATION को सूचित किया कि उनके शहर में एक साथ ढेर सारे न्यूमोनिया जैसे मामले सामने आये हैं और इसकी वजह है एक ऐसा कोरोना वायरस जो बिलकुल नये किस्म का  है. 


02.   01 जनवरी 2020 को WHO हरकत में आ गया और अपनी तयशुदा प्रक्रियाओं में जुट गया. इस नये किस्म के कोरोना वायरस को नाम दिया गया "SARS-CoV-2" और इस रोग को नाम मिला "COVID -19".


03.   13 जनवरी 2020 को चीन से बाहर इस रोग का पहला मामला थाईलैन्ड में सामने आया.

04.   30 जनवरी 2020 तक पूरी दुनिया में 7818 मामले रिकॉर्ड किये गये.

05.   और 30 जनवरी 2020 वही तारीख थी जिस दिन भारत में  COVID -19 का पहला मामला सामने आया.

06.    24 फरवरी 2020 तक पूरी दुनिया का आँकड़ा 79436 तक पहुँच गया.  

07.    13 मार्च 2020 को WHO ने COVID - 19 को वैश्विक महामारी घोषित कर दिया.

08.    21 मार्च 2020 तक पूरी दुनिया में 266073 मामले रिकॉर्ड किये गये. WHO ने दुनिया भर में इस रोग के फैलने की गति को देखते हुये वैश्विक जोखिम (GLOBAL RISK) को "बहुत ज्यादा" ठहराया.

09.    22 मार्च 2020 को भारत सरकार ने "जनता कर्फ्यू" (स्वैच्छिक) का आह्वान किया.

10.    23 मार्च 2020 को भारत सरकार ने सभी अंतर्राष्ट्रीय उड़ानों की लैंडिंग पर प्रतिबन्ध लगाया. तब जब दुनिया के बहुत से देश अपने यहां यह काम बहुत पहले ही कर चुके थे.

11.    25 मार्च 2020 से अभीतक (कुल चार फेज में) भारत सरकार के आदेश से में लॉकडाउन जारी है, जो 31 मई 2020 तक जारी रहेगा - अगर इसे बढ़ाने का नया आदेश नहीं जारी हुआ तो.

अब जरा इन प्रश्नों और उनके उत्तरों पर गौर कीजिये :

(1) क्या भारत सरकार ने Covid-19 से निपटने के लिए अभी तक ठोस कदम उठाये हैं ? उत्तर है, नहीं.

(2) और जो भी कदम उठाए हैं क्या वे उचित समय पर उठाए हैं ? उत्तर है, नहीं.

(3) अपने नागरिकों के कल्याण हेतु जो भी तथाकथित कदम उठाए गए हैं क्या वे पर्याप्त हैं ? हरगिज नहीं.

आप कहते हैं कि हाँ, वे पर्याप्त हैं. तो आज की तारीख में देश के कोने-कोने से प्रवासी मजदूर सड़कों पर क्यों हैं - अपने घर जाने को बेताब, भूखे-प्यासे, चिलचिलाती धूप में क्यों बढ़े जा रहे हैं ये लाचार लोग ? उनमें कितने मर गये, जो भूख-प्यास बर्दाश्त नहीं कर पाए ? गर्मी ने जिनको लील लिया ? ट्रेन के नीचे जो कट गये ? क्या उनकी जिंदगियों की कोई कीमत नहीं थी ? आपने कितने घंटे की मोहलत पर लॉकडाउन लगाया ? चार घंटों की मोहलत पर. आपने 21 दिन के लिए लगाया था न ? हालात के अनुसार लॉकडाउन को बढ़ाने की जरूरत भी पड़ सकती है, ऐसी संभावना आपको क्यों नहीं दिखी ? जो मजदूर देश के दूरदराज हिस्सों से अपनी रोजीरोटी कमाने शहरों में आते हैं - अगर लॉकडाउन लम्बा खिंचा तो उनपर जो संकट आएगा वह आपने क्यों नहीं सोचा था ? क्या आप नहीं जानते थे कि कामकाज तो लॉकडाउन की वजह से बंद हो जाएंगे फिर  कामगारों को मजदूरी कैसे मिलेगी ? चलो किसी तरह 21 दिन उनने काट भी लिए तो इस अवधि के बाद उनको कोई काम देने की, मजदूरी देने की, कोई योजना आपने बना रखी थी क्या ? नहीं ना ? तो जैसे शुरुआती कुछ दिन आपने गफलत में बिता दिए (या नादानी में बिता दिए) वैसे ही कुछ दिन और रुक जाते, मजदूरों को उनके घर लौट जाने की सलाह दे देते, कुछ समय दे देते कि भाई इतने समय तक मेें आप अपने घर चले जाँय. आज उनकी दुर्दशा के लिए आप नहीं तो कौन जिम्मेदार है ? खैर, छोड़िये इस वाली जिम्मेदारी की बात, क्या अब उन्हें सम्मान के साथ सही-सलामत उनके घर तक पहुंचाने की भी जिम्मेदारी आपकी नहीं बनती ? क्या आपको शर्म नहीं आनी चाहिए कि तपती धूप में चलते-चलते बीच सड़क पर हमारे देश की कोई महिला बच्चा जनने को मजबूर है - जो या तो किसी मजदूर की बहन-बेटी है या फिर खुद ही मजदूरिन है ? जिस तरह आप उस महिला की व्यथा को नहीं समझ पाए जिसने ताउम्र सुहागिन होते हुए भी विधवा जैसी जिंदगी बिता दी, क्या आप उसी तरह भूख से बिलबिलाते हाड-मांस के उन पुतलों की व्यथा भी नहीं समझने की कसम खा चुके हैं जो कहीं रेलवे प्लेटफॉर्म के अंदर तो कहीं बाहर खाने-पीने की चीजों की छीना-झपटी और मारपीट के लिए अभिशप्त हैं - मानों वे इंसान नहीं कुत्ते-बिल्ली हों ? आगे बढ़ने से पहले बेबसी की कुछ तस्वीरों पर नज़र डालिये और खुद से पूछिए कि क्या भूख-प्यास के आगे इंसान को देश का कानून या अपना आत्म-सम्मान याद रह सकता है ?


                                                                         





















































                                                                                                                                                                






























                                                                           










                                                                                                                        






































































सच कहूँ तो अब आपकी महत्त्वाकांक्षा पर - जो पूरी तरह मनोविकार में तब्दील हो चुकी है - दया आती है. आपके मन के अन्दर की उस ग्रन्थि को  कैसे भुलाया जा सकता है, जो जन्मी थी तब, जब अमेरिका ने आपको सम्भवतः आपके मुख्यमंत्रित्व-काल में किये गये "महान कार्यों" के कारण वीजा देने से इन्कार कर दिया था. आपने ठान तो तभी लिया था न कि इस अमेरिका के बच्चे से मैं वो चीज हासिल करके रहूँगा जो 'वीजा' जैसी  तुच्छ चीज से लाखों गुणा ज्यादा हो ? तो, वो तो अब हासिल हो गया हुजूर, अब जरा जनता-जनार्दन की भी चिन्ता कर लीजिये न !! एक बात और....सबको पता है कि आप राय-मशविरा करने में यकीन नहीं रखते (मैं बात नौटंकियों की नहीं कर रहा) सो बगैर किसी से राय-मशविरा करने का मशविरा दिए, अपनी ओर से एक मशविरा अर्ज करता हूँ. वह ये कि कृपा करके उस संविधान को एक बार खुद से पढ़ जाइये जिसकी कसम खाकर आपने यह कुर्सी संभाली थी. और ध्यान से मन में तय कीजिये कि उन मजदूरों के आत्म-सम्मान की रक्षा करते हुये उनका जीवन बचाने की, उनकी भूख-प्यास मिटाने की संवैधानिक जिम्मेदारी आपकी बनती है या नहीं. ऐसा इसलिए कह रहा हूँ कि आपके आचरण से अभी तक तो सिर्फ यही दिखता रहा है कि इसे आप 'संवैधानिक जिम्मेदारी ' समझने की बजाय एक किस्म का 'खैरात' समझ रहे हैं और इसी सोच की वजह से इसे टाल रहे हैं, टालते जा रहे हैं. जिम्मेदारी से पलायन तो एक तरफ यह है ही, संवेदनहीनता की पराकाष्ठा भी है जो आपके मौन से साफ़ दिखता है. सच है, आप महान जादूगर हैं - आपके जादू के कमाल से आपके भक्तगण नॉन-स्टॉप भजन-कीर्त्तन में वो सब उगलते रहते हैं जो आपके अपने मौन में छुपा होता है, कुछ इस तरह से :
"किसने कहा था इन अशिक्षित, असभ्य और गँवार लोगों से कि अपना घर-बार छोड़ कर शहरों में बस जाओ ?"                    

ऊपर दर्शाये गए तारीखों के सिलसिले पर जरा गौर कीजिये :

(क)  चीन से बाहर के मुल्कों में 13 जनवरी 2020 से कोरोना का फैलाव शुरू हो चुका था. मात्र 17 दिनों के अंदर यानी 30 जनवरी 2020 तक - जब पूरी दुनिया में 7818 लोग इससे संक्रमित हो चुके थे - भारत में भी इसके संक्रमण का सिलसिला शुरू हो गया.

(ख)  23 फरवरी 2020 तक पूरी दुनिया में अपने 78800 मामलों के साथ कोरोना ने हड़कंप मचा दिया था. मौतों का सिलसिला अनवरत जारी था. दुनिया भर की सरकारें अपने-अपने सामर्थ्य के अनुसार कोरोना से जंग में जुट गयी थीं. हालाँकि दुनिया के कुछ  देश ऐसे भी थे जहाँ सत्ता और ताकत के घमण्ड में चूर राजनेता इसे बहुत हल्के में ले रहे थे और जिसका खामियाजा आने वाले दिनों में आम जनता ने भुगता और अभी तक भुगत रही है. दुनिया का सबसे ताकतवर देश अमेरिका इसका सबसे बढ़िया उदाहरण है.

(ग)  चलिए अब जरा नजर डालते हैं कि हमारे अपने देश के प्रधानमंत्री ने उस तारीख तक में कोरोना के खिलाफ जंग की क्या-क्या तैयारियाँ कर रखी थी. आप चाहें तो दाँतों तले उँगलियाँ दबा सकते हैं यह जानकर कि उन्होंने कुछ भी तैयारी नहीं की थी. एक सम्पूर्ण जीरो. क्यों ? क्योंकि  दुनिया में नीरो की कभी कमी नहीं रही, जब-जब रोम जलता रहा -  तब-तब वह चैन की बंशी बजाता रहा. लापरवाही का आलम यहीं तक नहीं था,  अगले दो दिन की (यानी 24 और 25 फरवरी 2020 की) उनकी व्यस्तता को इतिहास हमेशा व्यंग्य से याद रखेगा जब डोनाल्ड ट्रंप के स्वागत में वे जरूरत से ज्यादा पलक पाँवड़े बिछा रहे थे.

क्या यह सच नहीं है कि मोदी जी की व्यक्तिगत रूचि इस कार्य में इतनी ज्यादा थी कि उन्होंने एक करोड़ भारतवासियों को भी अपनी इस नौटंकी (नमस्ते ट्रम्प) से जोड़ने का लक्ष्य रखा था ?  क्या यह भी सच नहीं है कि मोदी जी की असंयमित इच्छा का पालन करते हुये गुजरात सरकार ने करीब 100 करोड़ रुपये की भारतीय दौलत खर्च की और करवाई ? किसी राष्ट्राध्यक्ष के स्वागत हेतु हर देश का अपना एक प्रोटोकॉल होता है जिसका पालन किया जाना अनिवार्य होता है, इससे भला किसे और क्यों ऐतराज होगा. मगर आप एक ऐसे संकट के दौर में जब (1) देश की अर्थव्यवस्था दिनोंदिन चरमराती जा रही है और (2) देश में कोरोना तेजी से फैलती जा रही है - आपको मान्य प्रोटोकॉल से कहीं आगे जाकर, बहुत आगे जाकर देश की दौलत को इस तरह बर्बाद करना क्या अनुचित नहीं था ? क्या वाजिब सीमा से ज्यादा खर्च की गयी देश की दौलत देश के उन मजलूम मजदूरों के हित में खर्च नहीं की जा सकती थी ? वर्त्तमान समय में 130 करोड़ आबादी वाले अपने देश में प्रवासी मजदूरों की संख्या का अंदाजा इस जानकारी से लगाया जा लगाया जा सकता है कि 2011 की जनगणना के अनुसार, एक मोटे तौर पर, इनकी संख्या 14 करोड़ थी. 

कैसी विडंबना है कि अतीत में हमेशा हमारे दुश्मन देशों का साथ देने वाले देश के राष्ट्रपति पर हमारा देश सिर्फ दो दिन में जो रकम फूंक डालता है - वह ठहरती है 100 करोड़ रुपये. और प्रवासी मजदूरों की वह संख्या कितनी हो सकती है जो आज भी सड़कों पर रेंग रही है ? 



मैं मोदी का धुर-विरोधी हूँ

जब हम बच्चे थे एक गाना लाउडस्पीकर पर बहुत बजता था. फिल्मों की या फिल्मी गानों की कोई समझ तो थी नहीं, पर अच्छा लगता था. गाने के बोल तो अभी भी याद हैं, शायद धुन की वजह से...."तुमको पिया दिल दिया कितने नाज से..." उम्र का पहिया धीरे-धीरे आगे बढा तो रेडियो पर विविध भारती की मेहरबानी से पता चला कि फ़िल्म का नाम "शिकारी" था. इन बातों को बताये जाने का कोई मकसद नहीं है सिवाय इसके कि इस फिल्म के गीतकार थे फारुख कैसर.

फिल्मों में गाने लिखने के अलावे कैसर साहब और क्या-क्या करते थे मुझे नहीं मालूम. मगर उनके लिखे एक फिल्मी गाने के अंदाज़ से पता चलता है कि वे अच्छे शायर भी थे. पेश--खिदमत है उसकी चन्द लाइनें :
    
बाद मुद्दत के हम तुम मिले,
मुड़के देखा तो है फासले,
चलते-चलते ठोकर लगी,
यादें, वादे, आवाज़ देते ना काश...!!  
(जी हाँ, इस ब्लॉग का परिचयनामा)

हाँ, हाँ भाई, मोदी पर बोलूँगा ना अभी.....बस जरा-सा रुक जाइये...पहले मोहब्बत की बातें हो जाने दीजिये.....कोई दिलजला एक मुद्दत के बाद अपनी महबूबा से मिलता है....मिलता क्या है, बस नजर पड़ी तो आवाज़ दे बैठता है, बिना कुछ सोचे-समझे......मगर यह क्या.....यहाँ तो अपने पूरे वजूद के साथ लंबे-लंबे फासले थे......जेहन में कुछ यादें उभरी, कुछ वादे याद आये.....तभी ठोकर लगी.....सब कुछ बिखर गया......काश हम आवाज़ ही ना देते !!
 
मोहब्बत में ऐसा ही होता है......कभी कोई ख्वाब पनपता है.....फिर परवान चढता है.....साथ जीने-मरने की कसमें खाई जाती हैं......और तब एक दिन सब खत्म हो जाता है......ख्वाब चकनाचूर हो जाता है.

मगर गिने-चुने मामलों में मोहब्बत कामयाब भी होती है......वो बड़े नसीब वाले होते हैं.

ऐसा ही सियासत में भी होता है. बहुत से लोग हथियार डाल देते हैं......हुँह, हमसे ये सब नहीं होगा !! अपने  बच्चन साहब भी तो थे कभी राजनेता….....और ठीक इसके उलट भी........मोदी जैसे लोग सत्ता के शीर्ष तक पहुँच जाते हैं....

"मोदी जैसे लोग...." से मेरा अभिप्राय क्या है ? उत्तर में मेरे दिमागी कंप्यूटर पर इतिहास का बटन दब जाता है....  

पन्नों के अंदर पन्ना, पन्नों के बाद पन्ना .....
  • गोधरा.........साबरमती एक्सप्रेस........27 फरवरी 2002.......आग.......कारसेवकों का जलना.......आरोप............मुस्लिम समुदाय......28 फरवरी 2002.......गुजरात.......दंगा.......मुख्यमंत्री.........नरेंद्र मोदी…......पुलिस......ढील.....इशारा…....होने दो......"क्रिया की प्रतिक्रिया होती ही है" (कभी इंदिरा गांधी की हत्या के बाद उभरे सिखों के भयानक नरसंहार के समय राजीव गांधी ने भी उसका ऐसा ही औचित्य प्रस्तुत किया था.........”जब भी कोई बड़ा पेड़ गिरता है तो धरती थोड़ी हिलती ही है”)............इस बार मुसलमान........भयानक नरसंहार..........गुलबर्ग सोसायटी…........एहसान जाफरी......बेस्ट बेकरी.......इसरत जहां.........एलईटी इन्वॉल्वमेंट (?)......गीता जौहरी का हटाया जाना.........सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर जौहरी की वापसी वगैरह वगैरह............केंद्रीय कमीशन........राज्य कमीशन.........सीबीआई रिपोर्ट...........एसआईटी रिपोर्ट........अदालतों के फैसले.........अदालतों की सीमायें..............उनके अंतर्विरोध...........उनके पूर्वाग्रह.........कानूनी  पेचीदगियाँ बनाम नेताओं की महारत.........सबूत मिटाने की कला...........सबूत बनाने की कला.......... मातहत अफसरों से उल्लू सीधा करवाने की कला.........बाद में मुंह फेर लेने की कला......आईपीइस बंजारा.........जेल.........जेल से इस्तीफे का भेजा जाना......इस्तीफे की वजह......छोडो भी यार…....मोदी का हिन्दू ह्रदय-सम्राट बन जाना ....... हिन्दुओं के वोट-बैंक की नई तिजोरी का खुल जाना (कभी गुरू आडवाणी ने सोमनाथ रथ-यात्रा की नौटंकी करके इसी तरह भाजपा के लिये वोट-बैंक की तिजोरी का फीता काटा था.......जीरो  से हीरो बनाने का आरम्भ किया था)........मोदी-शाह के चोली-दामन सम्बन्ध का दीर्घकालीन पुख्तापन............... राजनैतिक इतिहास का एक और बदनुमा दाग...........देश की साम्प्रदायिक एकता लहू-लुहान..... 
  • बतौर तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी बाजपेयी का कहना, "राज-धर्म निभाइये मोदी जी, राज-धर्म..."
  • सपने का बड़ा होना.....प्रधानमंत्री बनने की महत्वाकांक्षा.....इस्तेमाल किया जाना…...लाल किले वाले मॉडल के मंच का
  • अब सपने का पूरा होना.......आडवाणी को किनारे धकेल दिया जाना.......राजनीति जाने कब किसके दिन फेर दे....
  • दूसरी बार भी कुर्सी हासिल.... प्रचंड बहुमत......ईवीएम पर फिर से से मीन-मेख का निकाला जाना......कहा गया मशीन में छेड़छाड़ संभव नहीं.......करने वालों ने कर दिखाया.....मगर यह हिन्दुस्तान है जनाब...... तूती उसी की बोलेगी जो कुर्सी पर है......विपक्ष के भी अपने चरित्र हैं......एकाध सीट कहीं जीत ली तो ईवीएम मसला खटाई में........हार हुई तो कलंक ईवीएम पर.......फिर यहां चुनाव आयोग भी है.....कांग्रेस के जमाने से ही परम्परा रही है........सभीऑटोनोमस बॉडीज” की..........तूती उसी की बोलेगी जो कुर्सी पर है.....और मजे की बात है, यहां न्यायपालिका भी है.....हँसी आती है कि स्वतंत्र भी है......उसका डंडा चलता तो है मगर कब और किस पर यह देखने वाली बात है.....चुप, चुप !! न्यायपालिका पर मुंह मत खोल......नहीं खोलना चाहिए......कईयों को देखा है कुर्सी को खुश करते हुए......बाद में कुर्सी द्वारा पुरस्कृत होते हुए.....ताजा उदाहरण भी है ना.....अभी हाल में "भूतपूर्व" हुए एक  जज साहब   का.....एक से बढ़कर एक फैसले ताबड़तोड़ कर डाले.......राफेल.....राम जन्म-भूमि .... और भी ढेर सारे......मुगाम्बो  खुश  हुआ !!
  • तृप्त हैं पूरी तरह अब........राज्य-सभा की सदस्यता पाकर.....बदनाम भी होंगे तो क्या नाम होगा ? ....इंटरव्यू पढ़ा अभी-अभी....लचर बातें.....कुछ तो सफाई देनी होगी ना, सिर्फ इसलिए.......कोई दमदार कारण होता तब तो बताते.......मगर जनता इंटरव्यू भी कहाँ पढ़ती है......आखिर परम्परा तो कांग्रेस ने ही डाली थी ना........
  • 56 इंच के सीने वाला फिर से कुर्सी पर सवार हुआ .....किसी ने नाप कर तो नहीं देखा ......मगर सबने देखा........पहले कहा था "एक तरफ पाकिस्तानियों के द्वारा हमारे जवानों के सिर काटे जा रहे हैं, और दूसरी तरफ मनमोहन सरकार उनको बिरयानी खिला रही है" ...... 
  • फिर टीम ने इसमें जोड़ा था...."हमारी सरकार बनेगी तो हम एक के बदले दस सिर काट कर लायेंगे" .....सबने देखा आज तक तो एक भी सिर नहीं आया..... उल्टे मोदी पहुँच गए…....ताल ठोंक कर….... बिना किसी प्रोग्राम के…....बिल्कुल अचानक…...नवाज शरीफ  की चौखट पर जन्मदिन की बधाई देने …. क्या पता बिरयानी भी खाया हो..…
  • हाँ ढोल बहुत पीटा गया......सर्जिकल स्ट्राइक का भी.......ताकि फ़ौज के गुणगान के बहाने प्रचार अपना हो…... वोट-बैंक अपना बढ़े....आतंकी अनवर के मारे जाने के बाद शहीद हेमराज की पत्नी धर्मवती ने तो कहा भी था "मुझे भी अब उस आतंकी का सिर चाहिए, जो मेरे पति का सिर काटने वाले आतंकियों में शामिल था"…..मिल गया ?......ढोल बजाने की कला में कांग्रेस पिछड़ गयी.....वरना क्या कांग्रेस के ज़माने में सर्जिकल स्ट्राइक नहीं हुए थे ?.....
  • जनता तो आज तक यह भी नहीं जान सकी कि पुलवामा में सीआरपीएफ के काफिले में आरडीएक्स से लदी हुई कार घुसी तो कैसे घुसी ?.....इतनी जबरदस्त सुरक्षा व्यवस्था में ढील अगर हुई थी तो कौन लोग थे उसके लिए जिम्मेदार ?........सिर तो किसी का नहीं ला पाए, उल्टे अपने चालीस जवानों को खो  दिया....और आखिर इसमें राज क्या है ?...किसकी साजिश थी यह ? ....साजिश नहीं थी तो लापरवाही तो होगी किसी की ? ....क्यों आज तक जनता नहीं जान पाई ? ......कुछ तो राज है परदे के पीछे.......जनता को सवाल पूछना नहीं आता....वोट देना आता है....ढोल की आवाज़ ठीक सुन लेती है....जिसका ढोल जोर से पीटा जा रहा हो..... 
  • कहा था अच्छे दिन लायेंगे....ले  आये ?...कहा था सबों के खाते में 15-15 लाख डालेंगे....डल गये ? .....अच्छे दिन तो नहीं आये नोटबंदी की लम्बी-लम्बी कतारें जरूर गईं....... देशभर में कितने मरे आज तक सही संख्या कोई नहीं जान पाया.........मीडिया तो बस गिने-चुने मामले ही दिखा पाता है....ऊपर से मीडिया का बिक जाना या चमचा हो जाना............ बकौल रवीश कुमार गोदी मीडिया हो जाना...आतंकवाद मिट गया ?...कहा तो था....काला धन वापस गया ? कहा तो था ..........सारा काला धन विदेशों से लायेंगे जो स्विस बैंकों समेत तमाम अन्य देशों (टैक्सहैवन्स) में जमा है...ले आये ?......कहा तो था......तबाही तो जीएसटी भी कम नहीं लाई....जानना है तो छोटे-छोटे दुकानदारों से पूछ कर देखिये……छोटे-छोटे व्यवसायों से जुड़े लोग कम पढ़े-लिखे ही होते हैं...........उनसे जीएसटी की पेचीदगियाँ संभाले नहीं संभलतीं...... वकील-मुंशी को मोटी फीस देनी पड़ती है......ग्राहक से टैक्स मांगो तो ग्राहक ही छूट जाते हैं......कोई एक मुसीबत हो तो बताएं.....
नया पन्ना .....पन्ने के अंदर पन्ना, पन्ने के बाद पन्ना .....
  • आज़ादी के पहले से ही हिन्दुओं का एक तबका मुसलमान विरोधी रहा है......इनकी मानसिकता रही है कि या तो मुसलमान इस देश से चले जाँय या वे यहां दोयम दर्जे के नागरिक बन कर रहें.....लेकिन इस तबके की चली नहीं ........देश की बड़ी आबादी के पास हमेशा से गांधी जैसे नेता रहे और उनके समर्थकों का ही वर्चस्व रहा जो सर्वधर्म समभाव में आस्था रखता था.....और उस ज़माने से आज़ादी के बाद भी लम्बे समय तक बल्कि वास्तविक अर्थों में अभी भी सर्वधर्म-समभाव की मानसिकता वाले लोग ही हिन्दुस्तान की विशाल आबादी का हिस्सा हैं.......मगर मुसलमान विरोधी तबके ने कभी हार नहीं मानी और समाज में जहर घोलते रहे ताकि उनके खिलाफ बड़े पैमाने पर नफ़रत फैले.....इस तबके की कुंठा रही कि इन्हीं के पूर्वजों ने जो बाहर के मुल्कों से हमारी धरती पर आये थे, हम पर हमला करके हमें परास्त किया था और हम पर हमारी ही धरती पर बड़े-बड़े जुल्म किये थे....इसी कुंठा ने आज़ादी के पहले और बाद सांप्रदायिक दंगे करवाये........इसी सोच ने भारत के टुकड़े करवाने में अपनी भूमिका तय की......इस तबके को हमेशा शिकायत रही कि जब पाकिस्तान बन गया था तब सारे मुसलमानों को वहाँ क्यों नहीं भेज दिया गया..... ....बहरहाल भारतीय बहुसंख्यक आबादी ने जब इन्हें तवज्जो नहीं दिया तब इनके सेनानायकों में धीरे-धीरे यह बात घर करती गई कि सीधे रास्ते तो अपनी मंज़िल नहीं मिलने वाली है.....सोचते-सोचते इन्हें एक रास्ता मिला.......धर्मभीरू जनता को धर्म के नाम पर गुमराह करने का.....आडवाणी की रथ-यात्रा इसी सोच का एक महत्त्वपूर्ण पड़ाव थी......यह प्रयोग काम कर गया ....संसद में इन ताकतों की संख्या बढ़ने लगी.....इस सोच को अभी और कारगर होना बाकी था और वह हुआ मोदी-काल में ......मोदी चिंतन ने कमाल का एक काम किया.......अपनी असल मंशा को छुपाते हुए, उन महापुरुषों के नाम को छाती से चिपका कर रखने की नौटंकी का, जिनका चिंतन, जिनकी विचार-धारा इन लोगों से ठीक उल्टी थी और ……जो दूर-दूर तक इनसे मेल ही नहीं खाती थी...महात्मा गांधी, वल्लभ भाई पटेल, बाबासाहब अंबेदकर, सुभाष चंद्र बोस, भगत सिंह, चंद्रशेखर आज़ाद, शिवाजी, स्वामी विवेकानंद इत्यादि.........यह चाल काम कर गयी......उन महानायकों के नाम का बहुत ढोल पीटा गया जो आम जनता के ह्रदय में बसते थे ........ यह एक अनोखी चाल थी......इसने तो मोदी को इतना चमका दिया कि भाजपा दो तिहाई बहुमत हासिल कर गयी.......
  •  बहुत बारीक तरीके से मोदी की कार्य-प्रणाली को परखा जाए तो मोदी की असल मंशा को समझा जा सकता है...… मॉब-लिन्चिंग की देशव्यापी घटनाओं पर मोदी चुप ....दबाव ज्यादा पड़ा तो एक लाइन कह दिया कि हिंसा बर्दाश्त नहीं की जाएगी......ये लिंचिंग के मामले मुसलमानों पर हो रहे थे....मोदी के  भक्तगण ही कर रहे थे.......मगर भक्तों के लिए दिशा-निर्देश कुछ भी नहीं दिया.....अर्थ साफ़ था......देश भर के बड़बोले नेता मुसलमानों को या न्याय-संगत बातें बोलने वाले हिन्दुओं को पाकिस्तान चले जाने को बोलते रहते हैं.........मोदी चुप रहते हैं......चमचे उनकी देशभक्ति पर उंगली उठाते रहते हैं......मोदी चुप रहते हैं......नाथूराम गोडसे को देशभक्त बताने वाली प्रज्ञा ठाकुर को टिकट दे देते हैं........माफीनामे का नाटक करवा कर ऊंची समिति में डलवा देते हैं....
  •  मोदी की चुप्पी बड़े-बड़े विस्फोटक फैसलों का संकेत होती हैं.......एनआरसी, सीएए, एनपीआर क्या हैं .......चुप्पी में जो राज छिपे हैं उन्हीं की अभिव्यक्तियाँ तो हैं......इस मुगालते में मत रहिये कि तीन तलाक के फैसले के पीछे उनकी पीड़ा है, मुस्लिम माताओं, बहनों की......असल मकसद तो मुस्लिम आबादी का आधा वोट-बैंक है.....मोदी को पता है मुसलमान कभी उन्हें वोट देना पसंद नहीं करेंगे तो चलो उनमें से आधे को तो "फोड़" लो....   
पन्ने के अंदर फिर एक पन्ना, जाने कितने पन्ने  हैं .....  अब थक गया हूँ ...आप भी थक गए होंगे ...छोड़ देता हूँ .....शेष मोदीनामा फिर कभी......अभी तो सैकड़ों बाकी हैं.... 
  • पन्ने का सिर्फ शीर्षक बता देता हूँ....आपको याद जाएगा .....राफेल .......क्या कहूँ...... सब तो आप जानते ही हैं........सुप्रीम कोर्ट के जिस फैसले ने मोदी को क्लीन-चिट दे दिया उसमें तो झोल ही झोल था, अब कन्फर्म हो गया ......पहले सिर्फ शंका थी.......मगर अब ?.... राज्य-सभा की सीट ? ...... क्या जानना बाकी रहा ?........सब तो साफ़ हो गया.....और वह महिला कर्मचारी ? ......सुना है उसे सिर्फ बहाल ही नहीं कर दिया गया, पदोन्नति भी दे दी गयी ?........उसके सभी सस्पेंडेड भाई- भतीजों को भी फिर से बहाल कर दिया गया ?......यह क्या साबित करता है ? ......महिला सच बोल रही थी या झूठइससे परे भी एक सवाल उठता है......साहेब जी पाक-साफ़ थे क्या ? ....चलो यार अब बंद भी करो.....ठीक है, ठीक है.....यादों की यह किताब बंद कर देता हूँ.....
   वैसे भूला तो कुछ भी नहीं हूँ....भूल सकता भी नहीं.....वह दिन याद है मुझे....घनघोर रूप से रूढ़िवादी एवं कट्टर ब्राह्मण महिला ने अपने नवजात शिशु की जान बचाने के लिए किस तरह एक मुसलमान रिक्शा वाले की पत्नी की मदद कृतज्ञता से स्वीकार की थी......मुसलमान गरीब महिला ने खुशी-खुशी अपने खुद के नवजात शिशु के हिस्से में कटौती करके ब्राह्मणी के अबोध बालक की प्राणरक्षा की थी, अपना दूध पिलाकर.....ब्राह्मणी का दूध किसी अज्ञात वजह से सूख गया था........मोदी जैसे लोग बाबर और खिलजी जैसे खूंखार अत्याचारियों के कारनामें लाख पढ़ते-पढ़ाते रहें, आम आदमी को इतिहास पढ़-पढ़कर अपना खून जलाने की जरूरत नहीं पड़ती.....उन्हें इतिहास में नहीं वर्त्तमान में जीना ज्यादा पसंद होता है..... 

.....बस "मोदी जैसे लोग" से मेरा जो अभिप्राय था वह बीज-रूप में इतना ही था. मगर फिर भी .....

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मगर फिर भी अपनी आत्मा को और सृष्टि के रचयिता परमात्मा को हाजिर नाजिर मान कर अब जो मैं कहना चाहता हूँ उसे सीधे-सादे शब्दों में बयान करता हूँ.......पानी पी-पीकर दिन-रात इंदिरा गांधी को कोसते रहने वाले अटल बिहारी बाजपेयी ने - जो विपक्ष के, भाजपा के, सबसे बड़े नेता थे -  कभी किसी ख़ास परिस्थिति में, देश के हित में, अपने देशवासियों के हित में, उस समय की प्रधानमंत्री इंदिरा को "दुर्गा" कहा था, अपना बेबाक समर्थन दिया था .....बिना शर्त, बिना मांगे…..

कहा जाता है जंगल में जब आग लगती है तब बाघ और बकरी एक साथ मिल कर एक ही घाट पर पानी पीते हैं.......दोस्तों, आज फिर से हम सभी देशवासी एक ख़ास परिस्थिति - एक बहुत ही ख़ास, अन्जानी और सर्वनाशी किस्म के आग से जूझ रहे हैं.......अभी तो सारे सवालों से ऊपर सिर्फ एक सवाल है.......क्या हम सब बचेंगे ? दुनिया बचेगी इस प्रलय-रूपी कोरोना नामक अदृश्य दुश्मन से ?....ऐसे में हमारे देश का प्रधानमंत्री मोदी - हर मतभेद से ऊपर - हमारा सर्वमान्य नेता है......उसके सारे दिशा-निर्देशों का अक्षरशः पालन करना ही अभी हमारी सच्ची राष्ट्रभक्ति है.....
 
आइये, मानवता बचाने की इस लड़ाई में हम सब मिलकर मोदी जी के नेतृत्व में एक साथ कंधे से कंधा मिला दें…..जी-जान लगा दें….आमीन !!!