प्रस्तुत है एक बड़े ही संवेदनशील चिकित्सक डॉo शंकुल द्विवेदी (उज्जैन) की पीड़ा। आपको याद होगा कि अभी इसी अप्रैल में जब डॉक्टरों, नर्सों और अन्य सेवाकर्मियों का दल उज्जैन शहर के किसी मोहल्ले में वहाँ के निवासियों को कोरोना के प्रति जागरूक करने और सर्वे के उद्देश्य से गया था तो उन्होंने उनके साथ कैसा दुर्व्यवहार किया था।
और डॉo द्विवेदी की पीड़ा पर एक अत्यन्त महत्त्वपूर्ण टिप्पणी की है प्रख्यात कम्प्यूटर वैज्ञानिक अभिषेक चौधरी ने जिन्होंने कम्प्यूटर की दुनिया में सॉफ्टवेयर बनाने की एक ऐसी प्रणाली - हिन्दवी - विकसित करके तहलका मचा दिया है जिससे अंग्रेजी नहीं जानने वाले लोग भी अपनी खुद की मातृभाषा में सॉफ्टवेयर बना सकते हैं।
मैं बतौर ब्लॉग-लेखक न तो इन दोनों महानुभावों से शत-प्रतिशत सहमत हूँ और न ही असहमत। मैं सिर्फ यह कहना चाहता हूँ कि इनके द्वारा उठाया गया मुद्दा हमारे देश की एक अत्यन्त गंभीर समस्या को न सिर्फ पूरी संवेदनशीलता से छूता-भर है बल्कि इनके अपने-अपने नजरिये जाग्रत समाज को न्योतते भी हैं कि हम सब भी जागें और अनछुए पहलुओं को उजागर करके किसी ठोस समाधान तक पहुंचें।
मैं आप सभी पाठकों को आमंत्रित करता हूँ कि इस विमर्श में हिस्सा लें और समाज के प्रति अपने उत्तरदायित्व का निर्वाहन करें
डॉo शंकुल द्विवेदी (उज्जैन) का आलेख (जैसा कि उन्होंने अपने फेसबुक पर पोस्ट किया है) :
मैंने कुछ दिन पहले उज्जैन में डाक्टरों पर हुए हमले के बारे में एक पोस्ट साझा करी। मेरे एक मेरे एक मित्र ने टिप्पणी करते हुए कहा डॉक्टर सीधे मुंह जवाब नहीं देते, क्या हालत और क्या ट्रीटमेंट चल रहा इसकी भी जानकारी नहीं देते (मरीज़ से मिलना पहले ही मना है) इसलिए इनका पिटना जरूरी है। उन्होंने आगे कहा लातों के भूत बातों से नहीं मानते।
मन बहुत व्यथित हुआ कि आम जनता हमारे कर्तव्य परायण होने पर शक करती है। अपना सर्वस्व न्योछावर करके, दिन रात बिना सैलरी के ओवरटाइम ड्यूटी करते हैं, मरीज़ को बचाने और उचित इलाज हो इसका हरसंभव प्रयास करते हैं। अपने घर से दूर रहते हैं कि हॉस्पिटल से इंफेक्शन न ले जाएं। इतनी समस्याओं हैं कि शायद लिख भी नहीं सकता। फिर भी ऐसा सुनने को मिलता है।
हर तालाब की कुछ मछलियां गंदी होती हैं (पूरे तालाब की नहीं)। लूट मचा कर जनता को त्रस्त करते हैं। पर इन चंद लोगों के परे पूरी एक ऐसी फौज भी है जो अपने कर्तव्य का निर्वहन पूरी ईमानदारी और निष्ठा से करती है। कमसकम उनके बारे में विचार करें।
कुछ असुविधाएं हैं लेकिन समय भी कुछ ऐसा है कि क्या करें- जैसे परिजन मरीज़ को देख- मिल नहीं पाते, ऐसे में हमेशा में एक शंका बनी रहती की इलाज सही चल रहा या नहीं, दवाई ठीक से दे रहे या नहीं। इसके लिए सरकार और अस्पातल प्रबंधन कुछ इंतजाम कर सकते हैं ताकि भरोसा मिलता रहे की सब सही चल रहा। मर्चुरी में शवों के साथ जो हो रहा बहुत है अमानवीय है एवं तुरंत सुधार होना चाहिए। इसमें भी अस्पताल प्रबंधन को प्रयास करना चाहिए।
मैंने समझा कि अस्पताल में आने से लेकर वहां से जाने तक की हर चीज़ में यदि कोई व्यक्ति जिम्मेदार है तो वह है डॉक्टर, कोई भी किसी भी कदम पर गलत हुआ तो दोषी है डॉक्टर, दवाई नहीं मिली पा रही तो दोषी है डॉक्टर। जबकि हर कदम में सबके अपने अपने भिन्न दायित्व हैं। कुछ चीजें डॉक्टर के कंट्रोल के परे हैं। दोनों ओर से सुधार की गुंजाइश है। लेकिन इसका हल हिंसा तो बिल्कुल भी नहीं है।
जय हिंद
डॉ शंकुल द्विवेदी🙏
कo वैo अभिषेक चौधरी की टिप्पणी
बहुत ही मार्मिक और सटीक वर्णन किया है आपने परिस्थिति का।
लोकाचार की यह समस्याएँ तभी मिट पाएँगी जब सही तरह से पेशेंट पार्टी को संबोधित किया जा सके। उन्हें हेल्थकेयर की पूरी रूपरेखा समझाई जा सके। या कहें तो पेशेंट पार्टी को, या आम जनमानस को, स्वास्थ्य सेवाओं के विषय में, हेल्थकेयर की संरचना के विषय में जागरूक किया जा सके।
यह काम हम आप नहीं कर सकते। इसलिए नहीं कि हम अक्षम है। बल्कि इसलिए क्योंकि जो रेशियो हैं वो बड़े ही विकृत हैं। इतने पेशेंट पार्टी तक या इतने आम जनता तक हम पहुँचेंगे कैसे?
1200 से 1500 पेशेंट के लिए एक डॉक्टर। व्यक्ति तभी जुड़ता है हेल्थकेयर के साथ या चिकित्सा संस्थानों के साथ जब उसे लगता है कि उसे चिकित्सा की आवश्यकता है। व्यंगात्मक दृष्टि से ऐसे बोले कि व्यक्ति तभी जुड़ता है जब उसके जान पे बन आती है। अगर सही समय पर चिकित्सा संस्थान के साथ जुड़ जाये तो चिकित्सा के परिणाम बहुत बेहतर हो सकते हैं।
तो शारीरिक समस्या जटिल होने से पहले पेशेंट क्या करते हैं? जो नुस्खे वाले टीवी सीरियल और टीवी एड आते हैं उन्हें देखते रहते हैं।
इससे और क्या आशा रख सकते हैं। भ्रांतियाँ ही उत्पन्न होंगी।
इन सब का फायदा वे लोग उठाते हैं जिनके लिए हेल्थकेयर केवल मात्र एक फायदा कमाने का जरिया है। वे लोग कौन है, आप स्वयं समझ सकते हैं। डॉक्टर नर्स अथवा कोई भी दूसरा हेल्थकेयर प्रोफेशनल कभी भी पेशेंट को फायदे के नजरिए से नहीं देखेगा।
डाॅक्टर या नर्स या अन्य हेल्थ प्रोफेशनल अपने कर्तव्य के प्रति सजग और निष्ठावान रहते हैं। परन्तु ये बात उन लोगों पर लागू नहीं होती जो हेल्थकेयर से केवल मात्र कमाना चाहते हैं।
यहां एक बात उल्लेखित कर दूँ कि हेल्थकेयर से लोग कमायें इसमें कोई आपत्ति नहीं होनी चाहिए। आपत्ति इस बात से है कि वे लोग कमाने के उपरांत अपने कर्तव्य का निर्वहन नहीं करते हैं।
हेल्थकेयर से फायदा कमाने वाली संस्थाएँ अथवा जो बिजनेस हैं वे अगर अपनी आमदनी का एक हिस्सा डाॅक्टर से पेशेंट का कनेक्शन बनाने में दें तो सोचिए यह परिस्थिति कितनी सुधर सकती है।
ऐसा नहीं है कि कोई भी संस्थाएँ इस क्षेत्र में काम नहीं कर रहे। मेरे नजरिये में अधिक से अधिक कुल संस्थाओं में से पांच या 10 प्रतिशत ही ऐसे मंचों के विकास की ओर ध्यान दे रहे हैं जहाँ डॉक्टर और पेशेंट आपस मे वार्ता कर सकें। वे लोग जो स्वस्थ हैं उन्हें डाॅक्टर समझा सके कि हेल्थकेयर की रूपरेखा क्या है।
इस कार्य मे आप जैसा युवा ऊर्जावान और जागरूक डॉक्टरों की बहुत ही अहम भूमिका है।
सोशल मीडिया के माध्यम से लोगों तक हेल्थकेयर संबंधी सही जागरूकता फैलाने के प्रति क्या किया जा सकता है इस पर विचार करना चाहिए।
हर हेल्थकेयर प्रोफेशनल या कहें तो मेडिकल स्टूडेंट के लेवल से सप्ताह में कम से कम दो या तीन बार सोशल मीडिया पर हेल्थकेयर संबंधी भ्रांतियों को दूर करने के उद्देश्य से एक दो पोस्ट लिखें।
डेढ़ सौ करोड़ लोगों तक पहुंच पाना आसान काम नहीं है। परन्तु ये असम्भव भी नहीं है।
एक बार पुनः आपके विचारों के प्रति साधुवाद।
















