बेशक इसे आप यू-टर्न कह लें मगर.....



आज (यानी 23.05.20 को, जब मैं यह लेख लिखने बैठा हूँ) पूरे एक महीने होने चले. मैंने अपने पिछले लेख में समस्त देशवासियों से जोरदार शब्दों में देश के प्रधानमंत्री के निर्देशों पर आँख बंद करके चलने का आह्वान किया था - कन्धे से कन्धा मिलाकर उनके साथ चलने की, उनका साथ देने की प्रार्थना की थी. उसके भी एक महीना पहले (यानी 22  मार्च 2020) से ही - जब सारे देशवासियों ने "जनता कर्फ्यू" का पालन करते हुये ताली, थाली और घंटियाँ बजाकर, मोमबत्तियाँ और दिये जलाकर अपने सर्वोच्च नायक को अपना समर्थन देने का इरादा जताया था - पूरे देश ने अभीतक एक जुट होकर कोरोना की जंग में मोदी जी का हाथ बँटाया ही है........

मगर तब से अब तक गंगा में पानी बहुत बह चुका है. इतना कि अब यह जाँचने की बारी आ गयी है कि हमारे नायक ने कोरोना की इस लड़ाई में अपने हिस्से की जिम्मेदारी बखूबी निभाई है या नहीं, निभा रहे हैं या नहीं. 

जरा निम्नलिखित तथ्यों को ध्यान में लाइये :

01.  31 दिसंबर 2019 को चीन के वुहान म्यूनिसिपल हेल्थ कमीशन ने WORLD HEALTH ORGANIZATION को सूचित किया कि उनके शहर में एक साथ ढेर सारे न्यूमोनिया जैसे मामले सामने आये हैं और इसकी वजह है एक ऐसा कोरोना वायरस जो बिलकुल नये किस्म का  है. 


02.   01 जनवरी 2020 को WHO हरकत में आ गया और अपनी तयशुदा प्रक्रियाओं में जुट गया. इस नये किस्म के कोरोना वायरस को नाम दिया गया "SARS-CoV-2" और इस रोग को नाम मिला "COVID -19".


03.   13 जनवरी 2020 को चीन से बाहर इस रोग का पहला मामला थाईलैन्ड में सामने आया.

04.   30 जनवरी 2020 तक पूरी दुनिया में 7818 मामले रिकॉर्ड किये गये.

05.   और 30 जनवरी 2020 वही तारीख थी जिस दिन भारत में  COVID -19 का पहला मामला सामने आया.

06.    24 फरवरी 2020 तक पूरी दुनिया का आँकड़ा 79436 तक पहुँच गया.  

07.    13 मार्च 2020 को WHO ने COVID - 19 को वैश्विक महामारी घोषित कर दिया.

08.    21 मार्च 2020 तक पूरी दुनिया में 266073 मामले रिकॉर्ड किये गये. WHO ने दुनिया भर में इस रोग के फैलने की गति को देखते हुये वैश्विक जोखिम (GLOBAL RISK) को "बहुत ज्यादा" ठहराया.

09.    22 मार्च 2020 को भारत सरकार ने "जनता कर्फ्यू" (स्वैच्छिक) का आह्वान किया.

10.    23 मार्च 2020 को भारत सरकार ने सभी अंतर्राष्ट्रीय उड़ानों की लैंडिंग पर प्रतिबन्ध लगाया. तब जब दुनिया के बहुत से देश अपने यहां यह काम बहुत पहले ही कर चुके थे.

11.    25 मार्च 2020 से अभीतक (कुल चार फेज में) भारत सरकार के आदेश से में लॉकडाउन जारी है, जो 31 मई 2020 तक जारी रहेगा - अगर इसे बढ़ाने का नया आदेश नहीं जारी हुआ तो.

अब जरा इन प्रश्नों और उनके उत्तरों पर गौर कीजिये :

(1) क्या भारत सरकार ने Covid-19 से निपटने के लिए अभी तक ठोस कदम उठाये हैं ? उत्तर है, नहीं.

(2) और जो भी कदम उठाए हैं क्या वे उचित समय पर उठाए हैं ? उत्तर है, नहीं.

(3) अपने नागरिकों के कल्याण हेतु जो भी तथाकथित कदम उठाए गए हैं क्या वे पर्याप्त हैं ? हरगिज नहीं.

आप कहते हैं कि हाँ, वे पर्याप्त हैं. तो आज की तारीख में देश के कोने-कोने से प्रवासी मजदूर सड़कों पर क्यों हैं - अपने घर जाने को बेताब, भूखे-प्यासे, चिलचिलाती धूप में क्यों बढ़े जा रहे हैं ये लाचार लोग ? उनमें कितने मर गये, जो भूख-प्यास बर्दाश्त नहीं कर पाए ? गर्मी ने जिनको लील लिया ? ट्रेन के नीचे जो कट गये ? क्या उनकी जिंदगियों की कोई कीमत नहीं थी ? आपने कितने घंटे की मोहलत पर लॉकडाउन लगाया ? चार घंटों की मोहलत पर. आपने 21 दिन के लिए लगाया था न ? हालात के अनुसार लॉकडाउन को बढ़ाने की जरूरत भी पड़ सकती है, ऐसी संभावना आपको क्यों नहीं दिखी ? जो मजदूर देश के दूरदराज हिस्सों से अपनी रोजीरोटी कमाने शहरों में आते हैं - अगर लॉकडाउन लम्बा खिंचा तो उनपर जो संकट आएगा वह आपने क्यों नहीं सोचा था ? क्या आप नहीं जानते थे कि कामकाज तो लॉकडाउन की वजह से बंद हो जाएंगे फिर  कामगारों को मजदूरी कैसे मिलेगी ? चलो किसी तरह 21 दिन उनने काट भी लिए तो इस अवधि के बाद उनको कोई काम देने की, मजदूरी देने की, कोई योजना आपने बना रखी थी क्या ? नहीं ना ? तो जैसे शुरुआती कुछ दिन आपने गफलत में बिता दिए (या नादानी में बिता दिए) वैसे ही कुछ दिन और रुक जाते, मजदूरों को उनके घर लौट जाने की सलाह दे देते, कुछ समय दे देते कि भाई इतने समय तक मेें आप अपने घर चले जाँय. आज उनकी दुर्दशा के लिए आप नहीं तो कौन जिम्मेदार है ? खैर, छोड़िये इस वाली जिम्मेदारी की बात, क्या अब उन्हें सम्मान के साथ सही-सलामत उनके घर तक पहुंचाने की भी जिम्मेदारी आपकी नहीं बनती ? क्या आपको शर्म नहीं आनी चाहिए कि तपती धूप में चलते-चलते बीच सड़क पर हमारे देश की कोई महिला बच्चा जनने को मजबूर है - जो या तो किसी मजदूर की बहन-बेटी है या फिर खुद ही मजदूरिन है ? जिस तरह आप उस महिला की व्यथा को नहीं समझ पाए जिसने ताउम्र सुहागिन होते हुए भी विधवा जैसी जिंदगी बिता दी, क्या आप उसी तरह भूख से बिलबिलाते हाड-मांस के उन पुतलों की व्यथा भी नहीं समझने की कसम खा चुके हैं जो कहीं रेलवे प्लेटफॉर्म के अंदर तो कहीं बाहर खाने-पीने की चीजों की छीना-झपटी और मारपीट के लिए अभिशप्त हैं - मानों वे इंसान नहीं कुत्ते-बिल्ली हों ? आगे बढ़ने से पहले बेबसी की कुछ तस्वीरों पर नज़र डालिये और खुद से पूछिए कि क्या भूख-प्यास के आगे इंसान को देश का कानून या अपना आत्म-सम्मान याद रह सकता है ?


                                                                         





















































                                                                                                                                                                






























                                                                           










                                                                                                                        






































































सच कहूँ तो अब आपकी महत्त्वाकांक्षा पर - जो पूरी तरह मनोविकार में तब्दील हो चुकी है - दया आती है. आपके मन के अन्दर की उस ग्रन्थि को  कैसे भुलाया जा सकता है, जो जन्मी थी तब, जब अमेरिका ने आपको सम्भवतः आपके मुख्यमंत्रित्व-काल में किये गये "महान कार्यों" के कारण वीजा देने से इन्कार कर दिया था. आपने ठान तो तभी लिया था न कि इस अमेरिका के बच्चे से मैं वो चीज हासिल करके रहूँगा जो 'वीजा' जैसी  तुच्छ चीज से लाखों गुणा ज्यादा हो ? तो, वो तो अब हासिल हो गया हुजूर, अब जरा जनता-जनार्दन की भी चिन्ता कर लीजिये न !! एक बात और....सबको पता है कि आप राय-मशविरा करने में यकीन नहीं रखते (मैं बात नौटंकियों की नहीं कर रहा) सो बगैर किसी से राय-मशविरा करने का मशविरा दिए, अपनी ओर से एक मशविरा अर्ज करता हूँ. वह ये कि कृपा करके उस संविधान को एक बार खुद से पढ़ जाइये जिसकी कसम खाकर आपने यह कुर्सी संभाली थी. और ध्यान से मन में तय कीजिये कि उन मजदूरों के आत्म-सम्मान की रक्षा करते हुये उनका जीवन बचाने की, उनकी भूख-प्यास मिटाने की संवैधानिक जिम्मेदारी आपकी बनती है या नहीं. ऐसा इसलिए कह रहा हूँ कि आपके आचरण से अभी तक तो सिर्फ यही दिखता रहा है कि इसे आप 'संवैधानिक जिम्मेदारी ' समझने की बजाय एक किस्म का 'खैरात' समझ रहे हैं और इसी सोच की वजह से इसे टाल रहे हैं, टालते जा रहे हैं. जिम्मेदारी से पलायन तो एक तरफ यह है ही, संवेदनहीनता की पराकाष्ठा भी है जो आपके मौन से साफ़ दिखता है. सच है, आप महान जादूगर हैं - आपके जादू के कमाल से आपके भक्तगण नॉन-स्टॉप भजन-कीर्त्तन में वो सब उगलते रहते हैं जो आपके अपने मौन में छुपा होता है, कुछ इस तरह से :
"किसने कहा था इन अशिक्षित, असभ्य और गँवार लोगों से कि अपना घर-बार छोड़ कर शहरों में बस जाओ ?"                    

ऊपर दर्शाये गए तारीखों के सिलसिले पर जरा गौर कीजिये :

(क)  चीन से बाहर के मुल्कों में 13 जनवरी 2020 से कोरोना का फैलाव शुरू हो चुका था. मात्र 17 दिनों के अंदर यानी 30 जनवरी 2020 तक - जब पूरी दुनिया में 7818 लोग इससे संक्रमित हो चुके थे - भारत में भी इसके संक्रमण का सिलसिला शुरू हो गया.

(ख)  23 फरवरी 2020 तक पूरी दुनिया में अपने 78800 मामलों के साथ कोरोना ने हड़कंप मचा दिया था. मौतों का सिलसिला अनवरत जारी था. दुनिया भर की सरकारें अपने-अपने सामर्थ्य के अनुसार कोरोना से जंग में जुट गयी थीं. हालाँकि दुनिया के कुछ  देश ऐसे भी थे जहाँ सत्ता और ताकत के घमण्ड में चूर राजनेता इसे बहुत हल्के में ले रहे थे और जिसका खामियाजा आने वाले दिनों में आम जनता ने भुगता और अभी तक भुगत रही है. दुनिया का सबसे ताकतवर देश अमेरिका इसका सबसे बढ़िया उदाहरण है.

(ग)  चलिए अब जरा नजर डालते हैं कि हमारे अपने देश के प्रधानमंत्री ने उस तारीख तक में कोरोना के खिलाफ जंग की क्या-क्या तैयारियाँ कर रखी थी. आप चाहें तो दाँतों तले उँगलियाँ दबा सकते हैं यह जानकर कि उन्होंने कुछ भी तैयारी नहीं की थी. एक सम्पूर्ण जीरो. क्यों ? क्योंकि  दुनिया में नीरो की कभी कमी नहीं रही, जब-जब रोम जलता रहा -  तब-तब वह चैन की बंशी बजाता रहा. लापरवाही का आलम यहीं तक नहीं था,  अगले दो दिन की (यानी 24 और 25 फरवरी 2020 की) उनकी व्यस्तता को इतिहास हमेशा व्यंग्य से याद रखेगा जब डोनाल्ड ट्रंप के स्वागत में वे जरूरत से ज्यादा पलक पाँवड़े बिछा रहे थे.

क्या यह सच नहीं है कि मोदी जी की व्यक्तिगत रूचि इस कार्य में इतनी ज्यादा थी कि उन्होंने एक करोड़ भारतवासियों को भी अपनी इस नौटंकी (नमस्ते ट्रम्प) से जोड़ने का लक्ष्य रखा था ?  क्या यह भी सच नहीं है कि मोदी जी की असंयमित इच्छा का पालन करते हुये गुजरात सरकार ने करीब 100 करोड़ रुपये की भारतीय दौलत खर्च की और करवाई ? किसी राष्ट्राध्यक्ष के स्वागत हेतु हर देश का अपना एक प्रोटोकॉल होता है जिसका पालन किया जाना अनिवार्य होता है, इससे भला किसे और क्यों ऐतराज होगा. मगर आप एक ऐसे संकट के दौर में जब (1) देश की अर्थव्यवस्था दिनोंदिन चरमराती जा रही है और (2) देश में कोरोना तेजी से फैलती जा रही है - आपको मान्य प्रोटोकॉल से कहीं आगे जाकर, बहुत आगे जाकर देश की दौलत को इस तरह बर्बाद करना क्या अनुचित नहीं था ? क्या वाजिब सीमा से ज्यादा खर्च की गयी देश की दौलत देश के उन मजलूम मजदूरों के हित में खर्च नहीं की जा सकती थी ? वर्त्तमान समय में 130 करोड़ आबादी वाले अपने देश में प्रवासी मजदूरों की संख्या का अंदाजा इस जानकारी से लगाया जा लगाया जा सकता है कि 2011 की जनगणना के अनुसार, एक मोटे तौर पर, इनकी संख्या 14 करोड़ थी. 

कैसी विडंबना है कि अतीत में हमेशा हमारे दुश्मन देशों का साथ देने वाले देश के राष्ट्रपति पर हमारा देश सिर्फ दो दिन में जो रकम फूंक डालता है - वह ठहरती है 100 करोड़ रुपये. और प्रवासी मजदूरों की वह संख्या कितनी हो सकती है जो आज भी सड़कों पर रेंग रही है ?