आत्मकथा : (2) विचारों का निर्माण

 किसी ने किसी सन्दर्भ में कहा :  

रहिमन धागा प्रेम का, मत तोरो चटकाय !

टूटे पे फिर ना जुरे, जुरे गाँठ परी जाय !!

.... जरा गहराई तक जाते हैं. इन पंक्तियों के रचयिता कौन हैं ? रहीम. पूरा नाम अब्दुर्रहीम खानखाना. अकबर के नौरत्नों में से एक. हुमायूँ के मित्र और अकबर के संरक्षक बैरम खाँ के पुत्र. तुलसीदास के समकालीन.

क्या वे हाड़माँस के बने नहीं थे ? थे. उनके दोहों में, किसी भी रचनाकार की तरह ही, उनके विचार ही तो निहित हैं ! विचारों के निर्माण की अपनी एक प्राकृतिक प्रक्रिया होती है. किसी-न-किसी सन्दर्भ-विशेष में घटित घटना मनुष्य के लिये एक खास किस्म के अनुभव को जन्म देती है. यही अनुभव उसके "विचार" बन जाते हैं. तत्पश्चात, रचनाकार (यहाँ कवि) अपने मस्तिष्क में संचित सैकड़ों-हजारों प्रतीकों के संकलन में से सर्वाधिक सटीक प्रतीक का चुनाव करता है. अब उस प्रतीक को एक उदाहरण की भाँति अपने उस "विचार" के समर्थन में कलात्मक तरीके से हमारे सामने प्रस्तुत कर देता है - कभी कविता के रूप में तो कभी किसी और रूप में. 

विचारों का निर्माण किसी तत्कालीन परिस्थितियों की उपज होती है. अत: सम्भव है कि कोई भिन्न परिस्थिति किसी भिन्न विचार को जन्म दे दे.

कविवर रहीम ने इन पंक्तियों में एक विचार प्रकट किया :

जो रहीम उत्तम प्रकृति, का करि सकत कुसंग !

चन्दन विष व्यापत नहीं, लिपटत रहत भुजंग !!

(अर्थात जो लोग अच्छी प्रकृति के होते हैं उन पर बुरी प्रकृति वाले लोगों की संगति का भी कोई बुरा प्रभाव नहीं पड़ता - ठीक उसी तरह जैसे चन्दन के वृक्ष पर विषैले साँप लिपटे रहते हैं मगर इससे चन्दन की शीतलता पर कोई भी दुष्प्रभाव नहीं पड़ता). 

मगर उन्हीं कविवर ने अपने ही उक्त विचार से भिन्न एक अलग विचार भी दिया है :

कदली, सीप, भुजंग मुख , स्वाति एक गुण तीन !

जैसी संगति बैठिए, तैसोई फल दीन !!

(अर्थात स्वाति नक्षत्र में हुई वर्षा की सभी बूँदें होती तो बिल्कुल एक समान हैं, किंतु धरातल पर भिन्न-भिन्न गुणों-दुर्गुणों वाली जगहों पर गिरने से उन्हीं वर्षा की बूंदों में (जो समान थीं) भिन्न-भिन्न गुणों-दुर्गुणों का प्रतिपादन हो जाता है - मसलन, कदली में पड़ने पर वर्षा की बूंद कपूर में परिवर्तित हो जाती हैं, सीप में गिर जाए तो बहुमूल्य मोती का रूप धारण कर लेती है, और वही बूँद यदि विषैले सर्प के मुंह में गिर जाए तो विष में बदल जाती है). 

विचारों की यह भिन्नता यही दर्शाती है कि व्यक्ति जब जिस परिस्थिति से गुजरता है, जैसे अनुभव उसने प्राप्त किये होते हैं, तद्नुरूप उसके विचार बन जाते हैं.

विवेचना हेतु अगला तथ्य यह है कि दुनिया का कोई भी विचार "निरपेक्ष" (absolute) नहीं है, हर विचार सापेक्ष (relative) है. मैं कहना क्या चाहता हूँ ? 

वैसे तो सैकड़ों उदाहरण हैं मगर एक की चर्चा करता हूँ. पुरानी फिल्म (बाँगला) "सिस्टर" की नायिका "अपने बच्चों" की और दूसरे सभी "अपनों" की जान बचाने की खातिर खुद को उस क्रूर मिलिट्री ऑफीसर के हवाले कर देती है जिसने उसके अनाथालय को बन्धक बना रखा है और उस नायिका को जरूर यह आशंका है कि उसकी इज्जत भी लूट ली जा सकती है. चूँकि वह अपने अनाथालय की सर्वेसर्वा है इसलिये सभी बच्चे उसके "अपने" ही बच्चे हैं, शेष लोग भी सभी उसके "अपने" ही हैं. उन सभी की जिम्मेदारी उसके ही कन्धों पर है. "शरीर" तो मिट्टी का है और उसे एक दिन उसी में मिल जाना है. ऐसे में तब "शारीरिक" शुचिता या "चारित्रिक" नैतिकता का क्या अर्थ रह जाता है जब सामने पचासों जिन्दगियों को बचाने की चुनौती सामने खड़ी हो ? (मौजूदा हालत यह भी है कि नीचे की पहाड़ी पर मौजूद भारतीय फौज की टुकड़ी को, जो इस वाकये से अन्जान है, अगर उसकी सूझबूझ से खबर मिल भी चुकी हो तो भी उसे यहाँ तक पहुँचने में अभी वक्त लगेगा) !! जैसी आशंका थी, उस क्रूर फौजी अफसर के द्वारा नायिका की इज्जत लूट ली जाती है.

मेरा प्रश्न है : क्या हम उस नायिका को "चरित्रहीन" कह या समझ पायेंगे ? उल्टे, क्या वह किसी "देवी" से कम है ?

हमारे विचार तत्कालीन परिस्थितियों पर निर्भर करते हैं. वे निरपेक्ष नहीं हैं. सामान्य परिस्थितियों में जो महिला  "चरित्रहीन" ठहराई जा सकती थी, वही महिला  (नायिका) तब "देवी" कही जायेगी जब परिस्थितियाँ बिल्कुल अलग हों, वैसी हों, जैसा कि उस फिल्म में दिखाया गया है.

एक भाई-बहन का जिक्र करना चाहूँगा. वे सहोदर हैं और तद्नूसार उनमें कुदरती प्रेम है. मगर इसके अतिरिक्त भी, उनमें जबर्दस्त वैचारिक समानता है. अगर कुछ भिन्नतायें हैं भी तो उनमें जो एक खास किस्म की मनो- वैज्ञानिक 'ट्यूनिंग' है उसकी बदौलत वह (अर्थात भिन्नतायें) उनके रिश्तों पर कभी हावी नहीं होती.

उनके पिता हैं, वैसे ही, जैसे सबों के होते हैं. गुणों से भरपूर और दुर्गुणों से भी उतना ही लैस जितना हाड़-माँस के इन्सान में होना अस्वाभाविक नहीं है.

भाई विद्रोही है. पिता से उसकी पटरी नहीं बैठती. घर छोड़ देना और फिर वापस आ जाना - एक से अधिक बार - कहीं-न-कहीं जहाँ उसकी परिस्थितियों की वजह से है वहीं मूल वजह यह है कि वह चाह कर भी अपनी जड़ों से दूर नहीं जा पाता.

बहन उसकी तरह विद्रोहिनी नहीं है. उसकी 'ट्यूनिंग' अपने पिता से है मगर कई गुणा ज्यादा अपनी माता से है.

बहन का पति अपनी जवानी में रंगीले मिजाज का होने की वजह से अपनी जायज-नाजायज कमाई उन क्षेत्रों पर भी लुटाता रहा था जिन पर लुटाया जाना अनुचित समझा जाता है. (उसके चरित्र पर इस लेखक की कोई गैरवाजिब टिप्पणी नहीं समझी जाय - यह लेखक का विनम्र निवेदन है). मगर, निश्चित तौर पर वह एक अतिदयालु व्यक्ति है. अपनी ससुराल पर भी उसका अत्यधिक प्रेम है, अपनी कमाई का कुछ-न-कुछ हिस्सा वह अपने ससुराल पर भी खर्च करता रहा था जिसकी आर्थिक विपन्नता से वह बखूबी वाकिफ था.

कालान्तर में इस सोच के मद्देनजर कि "अनैतिक" क्षेत्रों पर लुटाई जा रही "कमाई" का कोई छोटा-बड़ा हिस्सा किसी स्थाई प्रकृति की जायदाद में इन्वेस्ट किया जाना उस बहन के "भविष्य" के लिये बेहतर होगा, एक जमीन खरीदी जाती है. इस खरीद में उस भाई-बहन के पिता की "चतुराई" का एक अहम रोल होता है. इस चतुराई का एक "इतिहास" भी है जिससे भाई वाकिफ है और अपनी परिपक्व उम्र में (यानी जब उसे परिपक्वता हासिल हो जाती है, तब) वह उसे अपने पिता की "बेइमानी" समझता है (अन्यथा, अपनी अपरिपक्व उम्र में तो वह उसे अपने पिता की "बुद्धिमानी" समझता रहा था….खटकों के साथ-साथ).

इस इतिहास से अनभिज्ञ बहन उस खरीद के लिये अपने पिता के प्रति (खासकर माता के प्रति, जिसने उसके पिता को मोटिवेट करने में अहम भूमिका निभाई थी) कृतज्ञता महसूस करती है.

दृश्य बदलता है.

इस दृश्य में उस बहन के किशोर-उम्र बेटे की इन्ट्री होती है. बेटा रिश्तों की कोमलता और भावनात्मकता के अहसास से कोसों दूर एक अति-भौतिकतावादी किस्म का शख्स है जिसके लिये पैसों के आगे दुनिया की किसी भी संवेदनशीलता का कोई मोल नहीं है. उसे सब कुछ "जीत" लेने की और "जीतते रहने" की जिद्दी बीमारी है. यहाँ "सब कुछ" के अर्थ में वे सारी "इच्छायें" और "विचार" हैं जो उसके मन में आती रहती हैं. दूसरों पर (चाहे वह करीबी से करीबी सगा-सम्बन्धी क्यों न हो) पैसा लुटाने (या सामान्य-सी रकम भी खर्च करने) के अर्थ में वह अपने पिता से ठीक विपरीत प्रकृति का इन्सान (किशोर) है जो शनै: शनै: युवावस्था को बस छूने ही वाला है.

एक और दृश्य प्रत्यक्ष होता है. इस दृश्य में उन भाई-बहनों की माता सामने है. अपने पति के साथ हर समय कदमताल मिलाकर चलने वाली, उसके सभी नैतिक-अनैतिक निर्णयों की सहभागी और एक हिसाब से उस पर 'राज' करने वाली उस महिला के सम्बन्ध - बदली हुई परिस्थितियों में - उससे (यानी अपने पति से) खराब होते जा रहे हैं. ये "बदली हुई परिस्थितियाँ" क्या हैं उस पर अभी फिलहाल प्रकाश डालना कठिन है. वैसे भी वे इतनी जटिल हैं कि उन पर अलग से ही लिखा जा सकेगा और यहाँ उनकी आवश्यकता भी नहीं है. खराब होते जा रहे इस सम्बन्ध के बारे में फिलहाल इतना लिखने से नहीं बचा जा सकता कि जब उस महिला की मृत्यु हुई (यह एक आत्महत्या थी) उस समय तक में वह महिला बहुत ही गम्भीरता से अपने पति पर मुकदमा करना चाहती थी. इसलिये नहीं कि वह इस उम्र में किसी इन्साफ की चाहत रखती थी बल्कि इसलिये कि (जैसा कि उसने अपने बेटे को बताया था) वह पूरी दुनिया के सामने अपने पति का "कच्चा चिट्ठा" खोलना चाहती थी. 

एक और भी दृश्य पर्दे पर उभर रहा है. उन भाई-बहनों के पिता ने अपनी 'चतुराई' (जब-जब मैं 'चतुराई' शब्द का इस्तेमाल कर रहा हूँ तब-तब आप सब सुधी पाठकजन यों समझें कि इसमें भारतीय कानूनों की वह क्लिष्टता भी शामिल है जब कोई जमीन-मालिक या मकान-मालिक अपने किरायेदारों को वह जमीन या वह मकान बेच देने को मजबूर होता है जिस पर उस किरायेदार ने लम्बे समय से 'कब्जा' कर रखा होता है) से अपनी बेटी को एक मकान भी खरीदवा देता है. 

जाहिर है जब जमीन-मालिक या मकान-मालिक ऊपर उल्लिखित जमीन और मकान बेच रहे थे तो वे किसी-न-किसी सीमा तक 'मजबूर' भी थे और इस मजबूरी में उन्हें जमीन और मकान की वह कीमत नहीं मिली होगी जो कायदे से होनी चाहिये थी - खासकर तब जब सामने वाले खरीददार ने कानूनी पेंच में एक बार उसे जमकर पटखनी दी थी, अच्छा-खासा नुकसान पहुँचाया था और जो उसकी निगाह में एक 'धूर्त्त' व्यक्ति था.

अब कहानी उस उस कालखंड की जिसमें उस बहन के उस युवा (हाँ, अब वह युवा है, सिर्फ वह ही युवा नहीं, उसकी सारी भौतिकवादी और जिद्दी महत्त्वाकांक्षायें भी पूर्ण युवा हो चुकी हैं) बेटे का एक झगड़ा हुआ. यह झगड़ा उस भाई के साथ ही हुआ यानी मामा-भानजे के बीच. 

झगड़े में वह सब हुआ जो फोन पर हो सकता था. मामा और भानजे दोनों ने अपनी-अपनी मर्यादायें लाँघी.

उस भाई को तब जाकर बहुत क्लेश हुआ जब, तीन-चार या पाँच दिनों के बाद, उसने बहन को फोन मिलाया. उसे अन्दाजा तो था कि भानजे के साथ हुये विवाद के समय बहन वहाँ सम्भवत: मौजूद रही होगी पर उसे संशय भी था.

उसे विश्वास था कि अगर वह वहाँ मौजूद रही होगी तो उसने अपने बेटे को जरूर डाँट पिलाई होगी कि जब तुम्हारे मामा तुम्हारी माँग को पहली बार में ही जायज ठहराते हुये उसे निश्चित ही पूरा करने का वादा कर रहे थे - बार-बार और लगातार - तब तुम क्यों पागलों की तरह उनसे जबरन उलझ रहे थे ?

मगर यह क्या ? यहाँ तो बहन पर पुत्र-प्रेम हावी था. हालाँकि यह वही बहन थी जिसने पिछले कई मौकों पर वह कहा था, सिर्फ वही कहा था जो उचित था - खुद पर 'पुत्र-प्रेम' को कतई हावी नहीं होने दिया था. मगर अब क्या हो गया ? मानना ही पड़ेगा कि महाकवि वेदव्यास ने फिजूल में तो 'पुत्र-प्रेम' में अन्धे हो जाने वाले पात्र को नहीं रचा था. उन्होंने तो इस प्रवृत्ति को प्रकृति प्रदत्त ही माना होगा तभी ऐसे पात्र रचे होंगे - यद्यपि रचे गये पात्रों पर 'सु' अथवा 'कु' उपसर्ग लगाने हेतु मनुष्य-मात्र को उन्होंने स्वतंत्र छोड़ दिया कि अब तुम जैसा चाहो वैसा उपसर्ग लगा लो. जिसका, जैसा अनुकरण करना चाहो, कर लो. जैसी शिक्षा ग्रहण करना चाहो, कर लो.तभी तो अनवरत गति से महाभारत की भिन्न-भिन्न व्याख्यायें आजतक आती रही हैं और आती रहेंगी. 

…… मैं पूरी विनम्रता के साथ, पूर्ण सम्मान सहित कविवर रहीम के उक्त दोहे (रहिमन धागा प्रेम का…) की मार्फत व्यक्त विचार से असहमति प्रकट करता हूँ. मेरा मानना है कि बिगड़े हुये, टूटे हुये सम्बन्धों की डोर को ज्यादा मजबूत बन्धन के साथ इस तरह जोड़ा जा सकता है कि उसमें कोई गाँठ न रह जाये.

इसके लिये अगर जरूरत है तो सिर्फ वैसी किसी सापेक्ष परिस्थिति के निर्माण की जो कभी इन्सान अपनी कोशिशों से बना लेता है तो कभी ईश्वर खुद ही उसे ऐसा मौका दे देता है.

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