02.11.22 / आत्मकथा : (3)......धुँधली-सी कुछ यादें

 ….यादों के इस झुटपुटे में आज मिलन प्रेस वाले सत्तार भाई का नाम सबसे पहले उभर कर आँखों के सामने आ रहा है मगर जाने क्यों उनका अक्स स्पष्ट नहीं दिख पा रहा…उनके बरअक्स जो तस्वीर बिल्कुल साफ-साफ देख पा रहा हूँ - करीब चालीस साल की अवधि बीत जाने के बाद भी - वह है राधेश्याम जी की.


तब लक्ष्मी ने (लक्ष्मी अग्रवाल, जिसके साथ मेरी यारी हाईस्कूल के जमाने से चली आ रही थी - जब हम उन श्री ब्रजकिशोर मंडल सर की ट्यूशन बैच के हमजोली थे जो हमें अंग्रेजी ग्रामर पढ़ाते थे) मेरे ना-नुकुर के बावजूद एक फाइल लाकर मेरे सामने पटक दिया था और तंज कसा था - "माना कि तू इन दिनों बहुत बड़ा नेता हो गया है, बहुत व्यस्त समाजसेवी भी हो गया है मगर तुझे यह करना ही होगा….मैं तेरी कोई भी अगर-मगर नहीं सुनूँगा…."


लड़कियों जैसी पतली आवाज वाला मेरा यह दोस्त वैसे तो कोई खास घनिष्ठ भी नहीं था पर एक बात उसमें जरूर ऐसी थी जो उसे मेरे दूसरे मित्रों से अलग करती थी. वह थी उसकी निष्कपट मितभाषिता.


…..सरसरी निगाह से फाइल का अवलोकन करने पर मुझे एक मोटा-मोटी अन्दाजा लग गया कि क्यों श्री देवकान्त झा 'दीपक' ने इस पत्रिका के सम्पादन से इन्कार किया होगा. वे स्थानीय के० बी० झा महाविद्यालय के हिन्दी के विभागाध्यक्ष थे. वैसे भी विद्वान तो वे थे ही. मेरा उनसे परिचय न था पर मैं उनकी विद्वता का कायल जरूर था. (बहुत बाद में मेरा उनसे परिचय भी हुआ, घनिष्ठता भी, जब अपने एकाउन्ट के सिलसिले में उनका मेरे बैंक में आना-जाना शुरू हुआ). "नया संसार" पत्रिका की उस फाइल में इसके प्रथम अंक की एक प्रति भी मौजूद थी जिसकी सामग्री के अध्ययन ने दो-तीन राज और भी खोले. श्री 'दीपक' इस अंक के सम्पादक थे और अघोषित कारणों से उन्होंने इसके द्वितीय अंक की जिम्मेदारी लेने से इन्कार कर दिया था. मैं अन्दर ही अन्दर हिल गया. मुझे इसी अंक के सम्पादन का भार लक्ष्मी ने मुझे सौंपा था.


'दीपक' जी ने रचनाओं का जो चयन किया था उनकी श्रेष्ठता ने एक तरफ तो मुझे बहुत प्रभावित किया मगर दूसरी तरफ उनकी 'प्रूफरीडिंग' का जो स्तर था उसने उन श्रेष्ठ रचनाओं के 'end effect' को मटियामेट कर डाला था. मैं निश्चयपूर्वक तो कुछ नहीं कह सकता कि 'प्रूफरीडिंग' के सम्बन्ध में कहाँ, किससे चूक (या लापरवाही) हुई मगर यह सोच पाना कठिन है कि 'दीपक जी' इस विषय में किसी भी तरह से जिम्मेदार रहे होंगे. सम्पादन की जिम्मेदारी लेते वक्त उनके मन में 'छपास' की कोई महत्त्वाकांक्षा रही होगी, उनकी विद्वता के आगे इसकी भी कोई गुंजायश तो नहीं लगती. तब …? बैंक के एक छोटे-से कर्मचारी के ऊपर (जिसके ऊपर यकीनन अपने यूनियन को नेतृत्त्व देने की जिम्मेदारी भी थी और व्यस्त समाजसेवी तो वह था ही) एक पत्रिका का सम्पादन सौंपने का मूल कारण क्या रहा होगा ? लक्ष्मी को तो खैर मेरी साहित्यिक अभिरुचियों की जानकारी थी मगर क्या बात सिर्फ इतनी ही थी ?


मैंने लक्ष्मी से बात की. एक बार स्वीकार कर लेने के बाद जिम्मेदारी से भागना मैंने नहीं सीखा था. फिर भी, सावधान रहने का प्रयास तो किया ही जा सकता था. मैंने उसे साफ कर दिया कि (1) मैं एक भी पैसे का पारिश्रमिक तो नहीं लूँगा मगर मैं अपनी जेब से एक पैसा लगाऊँगा भी नहीं (2) मुझे जो भी व्यय करने की आवश्यकता महसूस होगी उसको मुझे तुरन्त मुहैय्या कराया जायेगा (3) प्रूफरीडिंग मैं खुद करूँगा और (4) रचनाओं के चयन से लेकर डिजायनिंग तक में किसी की कोई दखलअंदाजी नहीं होगी … लक्ष्मी ने हामी भर ली. 


….राधेश्याम जी (श्री राधेश्याम तिवारी) की तरफ लौटता हूँ. उनसे भी दूरदराज तक मेरी कोई जान-पहचान न थी. सत्तार भाई के मिलन प्रेस में "नया संसार" का पहला अंक छपा था. और जहाँ तक मुझे याद है इन्हीं सत्तार भाई ने मेरा परिचय राधेश्याम जी से करवाया था. मैं सत्तार भाई के मुहल्ले फकीरतकिया में ही किराये के मकान में रहता था और उसी इलाके में मेरे बैंक का कार्यालय भी था, लिहाजा उनसे मेरा दुआ-सलाम का रिश्ता था. लक्ष्मी ने वह फाइल मेरे बैंक में वहीं से (मिलन प्रेस से ही) वापस लाकर मुझको सौंपी थी. सम्भवत: मिलन प्रेस में ही बैठकर 'दीपक' जी "नया संसार" के सम्पादन का काम किया करते थे.


….सत्तार भाई ने राधेश्याम जी का परिचय देते हुये बताया था कि अग्रवाल जी (यानी लक्ष्मी) ने जो फाइल आपको (यानी मुझको) दी है उसमें उनकी भी (यानी राधेश्याम जी की भी) एक कविता है. फाइल मिले अभी एकाध दिन ही बीते थे और उसे उस वक्त तक मैं ठीक से देख नहीं पाया था. जितना भी देख पाया था, लगा था कि रचनायें बिल्कुल सतही हैं. रचनाकार लोग अभी नौसिखुए थे. मैंने तो सोचना भी शुरू कर दिया था कि अपने ही बल-बूते अच्छी रचनाओं की व्यवस्था करनी पड़ेगी. तथापि, राधेश्याम जी से मैं गर्मजोशी से मिला और मुझे याद नहीं है कि हमारे बीच क्या-क्या बातें हुईं.


"नया संसार" के सम्पादन के दौरान जिन्दगी ने कुछ ऐसे मीठे- कड़ुवे तजुर्बों से रू-ब-रू करवाया जिन्होंने आने वाले समय में मेरी पत्रकारीय/ साहित्यिक प्रतिभा को धारदार बनाने में सार्थक भूमिका निभाई.


….मेरा अंदेशा सही निकला. कुछ दिनों के बाद पता चला कि "नया संसार" के प्रकाशन के पीछे असल में एक बड़े राजनेता के कुछ निहित स्वार्थ थे. पहले तो लक्ष्मी को, और उसकी मार्फत मुझे, बस एक मोहरे की तरह इस्तेमाल-भर किया गया था. 


"नया संसार" के निमित्त कुछ शुरुआती रकम को खर्च किये जाने के बाद हाथ रोक लिये गये थे और मुझे ही सारी रकम खर्च करनी पड़ी थी. दरअसल वह अब एक जुनून था जो मुझ पर सवार हो चुका था और मैं पीछे नहीं मुड़ सकता था. 'दीपक जी' के सामने किन-किन परिस्थितियों ने क्या-क्या व्यवधान खड़े किये होंगे, यह भी समझ में आया. (कई मायनों में खुद मुझे भी कई समझौते करने पड़े थे). चार-चार प्रेसों में छपाई करवाने के बावजूद (कटिहार जैसे छोटे शहरों में प्रिन्टिंग टेक्नोलोजी उतनी विकसित नहीं थी) पत्रिका काफी विलम्ब से आ पाई थी. परम आदरणीय भरत बाबू (श्री भरत शर्मा, डी० एस० कॉलेज, कटिहार) के अनुसार पत्रिका अच्छी बन पड़ी थी. अफसोस था तो सिर्फ इस बात का कि किये गये समझौतों की वजह से मैं अपना 'श्रेष्ठतम' नहीं दे पाया था. मगर मुझे दो-तीन बातों से बहुत सन्तोष भी हुआ था - एक तो मैं कुछ बहुत ही अच्छी स्थानीय प्रतिभाओं को साहित्य के मंच पर उतार पाने में सफल रहा (जिनमें से कुछ ने तो बाद में राष्ट्रीय-स्तर पर प्रसिद्धि भी पाई) और दूसरी फणीश्वरनाथ रेणु की पत्नी पद्मा रेणु का कालजयी इन्टरव्यू लेने में मेरी सफलता - जिसके लिये मैं श्री दिलीप कुमार विश्वास जी का हमेशा ऋणी रहूँगा जिन्होंने उन तक मेरी पहुँच आसान बनाने में बड़ी मदद की थी.


…एक बार फिर से राधेश्याम जी की तरफ लौटता हूँ. कटिहार में ही एक बार अपने सहकर्मी (और छोटे भाई) श्री ओमप्रकाश श्रीवास्तव के घर एक पुस्तक हाथ लगी. शीर्षक ने मुझे आकर्षित किया - 'सागर प्रश्न'. अरे…!! यह तो अपने राधेश्याम जी ने लिखी है !! मैं भाव-विह्वल हो उठा. सूर्यकान्त त्रिपाठी पर लिखी उनकी कविता मैंने "नया संसार" के मुखपृष्ठ की दूसरी तरफ (पूरे पृष्ठ पर) छापी थी…..उसकी एक अधूरी पंक्ति तो आज भी मुझे याद है, "....जब तनुजा रूठ गई थी…"


'सागर-प्रश्न' के पिछले कवर-पृष्ठ पर जब कवि का परिचय, फोटो और पता पाया तो कुछ और रोमांचित हुआ…अरे!! ये तो अब दिल्ली में ही बस गये हैं : अंकुर इन्कलेव, करावल नगर में…चलो कभी दिल्ली जाना हुआ तो मिलने का प्रयास करूँगा…


बात खत्म हुई. मगर कहाँ खत्म हो पाई. वक्त के हिलोरों के साथ, रिटायर होने के बाद, अब मैं भी दिल्ली में ही बस गया हूँ. कई साल हो गये. राधेश्याम जी से दो-तीन मुलाकातें भी हुईं - वैसी ही गर्मजोशी और आत्मीयता के साथ.


….मैंने सत्तार भाई को या राधेश्याम जी को कोई वादा नहीं किया था, कोई आश्वासन तक नहीं दिया था कि उनकी कविता को छापने का प्रयास करूँगा. लेकिन उनकी कविता छापी थी.. इसलिये कि उसमें खुद का इतना दमखम था कि वह "नया संसार" के सबसे प्रतिष्ठित पृष्ठ पर - अपने पूरे पन्ने के फैलाव के साथ - अपनी जगह मुकर्रर कर सके !!


आज राधेश्याम जी की दर्जन-भर से ज्यादा पुस्तकें हिन्दुस्तान के शीर्ष प्रकाशकों ने छापी हैं और उनका नाम साहित्यिक आकाश पर हमारे शहर के नाम को सुशोभित कर रहा है…मेरे लिये इससे बढ़कर आनन्द और संतोष की बात भला और क्या हो सकती है कि आज से चालीस साल पहले इस प्रतिभा को मैंने साहित्य की कसौटी पर परखा था और उसे "खरा सोना" होने की भविष्यवाणी कर दी थी…!!!

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