02.11.22 / आत्मकथा : (3)......धुँधली-सी कुछ यादें

 ….यादों के इस झुटपुटे में आज मिलन प्रेस वाले सत्तार भाई का नाम सबसे पहले उभर कर आँखों के सामने आ रहा है मगर जाने क्यों उनका अक्स स्पष्ट नहीं दिख पा रहा…उनके बरअक्स जो तस्वीर बिल्कुल साफ-साफ देख पा रहा हूँ - करीब चालीस साल की अवधि बीत जाने के बाद भी - वह है राधेश्याम जी की.


तब लक्ष्मी ने (लक्ष्मी अग्रवाल, जिसके साथ मेरी यारी हाईस्कूल के जमाने से चली आ रही थी - जब हम उन श्री ब्रजकिशोर मंडल सर की ट्यूशन बैच के हमजोली थे जो हमें अंग्रेजी ग्रामर पढ़ाते थे) मेरे ना-नुकुर के बावजूद एक फाइल लाकर मेरे सामने पटक दिया था और तंज कसा था - "माना कि तू इन दिनों बहुत बड़ा नेता हो गया है, बहुत व्यस्त समाजसेवी भी हो गया है मगर तुझे यह करना ही होगा….मैं तेरी कोई भी अगर-मगर नहीं सुनूँगा…."


लड़कियों जैसी पतली आवाज वाला मेरा यह दोस्त वैसे तो कोई खास घनिष्ठ भी नहीं था पर एक बात उसमें जरूर ऐसी थी जो उसे मेरे दूसरे मित्रों से अलग करती थी. वह थी उसकी निष्कपट मितभाषिता.


…..सरसरी निगाह से फाइल का अवलोकन करने पर मुझे एक मोटा-मोटी अन्दाजा लग गया कि क्यों श्री देवकान्त झा 'दीपक' ने इस पत्रिका के सम्पादन से इन्कार किया होगा. वे स्थानीय के० बी० झा महाविद्यालय के हिन्दी के विभागाध्यक्ष थे. वैसे भी विद्वान तो वे थे ही. मेरा उनसे परिचय न था पर मैं उनकी विद्वता का कायल जरूर था. (बहुत बाद में मेरा उनसे परिचय भी हुआ, घनिष्ठता भी, जब अपने एकाउन्ट के सिलसिले में उनका मेरे बैंक में आना-जाना शुरू हुआ). "नया संसार" पत्रिका की उस फाइल में इसके प्रथम अंक की एक प्रति भी मौजूद थी जिसकी सामग्री के अध्ययन ने दो-तीन राज और भी खोले. श्री 'दीपक' इस अंक के सम्पादक थे और अघोषित कारणों से उन्होंने इसके द्वितीय अंक की जिम्मेदारी लेने से इन्कार कर दिया था. मैं अन्दर ही अन्दर हिल गया. मुझे इसी अंक के सम्पादन का भार लक्ष्मी ने मुझे सौंपा था.


'दीपक' जी ने रचनाओं का जो चयन किया था उनकी श्रेष्ठता ने एक तरफ तो मुझे बहुत प्रभावित किया मगर दूसरी तरफ उनकी 'प्रूफरीडिंग' का जो स्तर था उसने उन श्रेष्ठ रचनाओं के 'end effect' को मटियामेट कर डाला था. मैं निश्चयपूर्वक तो कुछ नहीं कह सकता कि 'प्रूफरीडिंग' के सम्बन्ध में कहाँ, किससे चूक (या लापरवाही) हुई मगर यह सोच पाना कठिन है कि 'दीपक जी' इस विषय में किसी भी तरह से जिम्मेदार रहे होंगे. सम्पादन की जिम्मेदारी लेते वक्त उनके मन में 'छपास' की कोई महत्त्वाकांक्षा रही होगी, उनकी विद्वता के आगे इसकी भी कोई गुंजायश तो नहीं लगती. तब …? बैंक के एक छोटे-से कर्मचारी के ऊपर (जिसके ऊपर यकीनन अपने यूनियन को नेतृत्त्व देने की जिम्मेदारी भी थी और व्यस्त समाजसेवी तो वह था ही) एक पत्रिका का सम्पादन सौंपने का मूल कारण क्या रहा होगा ? लक्ष्मी को तो खैर मेरी साहित्यिक अभिरुचियों की जानकारी थी मगर क्या बात सिर्फ इतनी ही थी ?


मैंने लक्ष्मी से बात की. एक बार स्वीकार कर लेने के बाद जिम्मेदारी से भागना मैंने नहीं सीखा था. फिर भी, सावधान रहने का प्रयास तो किया ही जा सकता था. मैंने उसे साफ कर दिया कि (1) मैं एक भी पैसे का पारिश्रमिक तो नहीं लूँगा मगर मैं अपनी जेब से एक पैसा लगाऊँगा भी नहीं (2) मुझे जो भी व्यय करने की आवश्यकता महसूस होगी उसको मुझे तुरन्त मुहैय्या कराया जायेगा (3) प्रूफरीडिंग मैं खुद करूँगा और (4) रचनाओं के चयन से लेकर डिजायनिंग तक में किसी की कोई दखलअंदाजी नहीं होगी … लक्ष्मी ने हामी भर ली. 


….राधेश्याम जी (श्री राधेश्याम तिवारी) की तरफ लौटता हूँ. उनसे भी दूरदराज तक मेरी कोई जान-पहचान न थी. सत्तार भाई के मिलन प्रेस में "नया संसार" का पहला अंक छपा था. और जहाँ तक मुझे याद है इन्हीं सत्तार भाई ने मेरा परिचय राधेश्याम जी से करवाया था. मैं सत्तार भाई के मुहल्ले फकीरतकिया में ही किराये के मकान में रहता था और उसी इलाके में मेरे बैंक का कार्यालय भी था, लिहाजा उनसे मेरा दुआ-सलाम का रिश्ता था. लक्ष्मी ने वह फाइल मेरे बैंक में वहीं से (मिलन प्रेस से ही) वापस लाकर मुझको सौंपी थी. सम्भवत: मिलन प्रेस में ही बैठकर 'दीपक' जी "नया संसार" के सम्पादन का काम किया करते थे.


….सत्तार भाई ने राधेश्याम जी का परिचय देते हुये बताया था कि अग्रवाल जी (यानी लक्ष्मी) ने जो फाइल आपको (यानी मुझको) दी है उसमें उनकी भी (यानी राधेश्याम जी की भी) एक कविता है. फाइल मिले अभी एकाध दिन ही बीते थे और उसे उस वक्त तक मैं ठीक से देख नहीं पाया था. जितना भी देख पाया था, लगा था कि रचनायें बिल्कुल सतही हैं. रचनाकार लोग अभी नौसिखुए थे. मैंने तो सोचना भी शुरू कर दिया था कि अपने ही बल-बूते अच्छी रचनाओं की व्यवस्था करनी पड़ेगी. तथापि, राधेश्याम जी से मैं गर्मजोशी से मिला और मुझे याद नहीं है कि हमारे बीच क्या-क्या बातें हुईं.


"नया संसार" के सम्पादन के दौरान जिन्दगी ने कुछ ऐसे मीठे- कड़ुवे तजुर्बों से रू-ब-रू करवाया जिन्होंने आने वाले समय में मेरी पत्रकारीय/ साहित्यिक प्रतिभा को धारदार बनाने में सार्थक भूमिका निभाई.


….मेरा अंदेशा सही निकला. कुछ दिनों के बाद पता चला कि "नया संसार" के प्रकाशन के पीछे असल में एक बड़े राजनेता के कुछ निहित स्वार्थ थे. पहले तो लक्ष्मी को, और उसकी मार्फत मुझे, बस एक मोहरे की तरह इस्तेमाल-भर किया गया था. 


"नया संसार" के निमित्त कुछ शुरुआती रकम को खर्च किये जाने के बाद हाथ रोक लिये गये थे और मुझे ही सारी रकम खर्च करनी पड़ी थी. दरअसल वह अब एक जुनून था जो मुझ पर सवार हो चुका था और मैं पीछे नहीं मुड़ सकता था. 'दीपक जी' के सामने किन-किन परिस्थितियों ने क्या-क्या व्यवधान खड़े किये होंगे, यह भी समझ में आया. (कई मायनों में खुद मुझे भी कई समझौते करने पड़े थे). चार-चार प्रेसों में छपाई करवाने के बावजूद (कटिहार जैसे छोटे शहरों में प्रिन्टिंग टेक्नोलोजी उतनी विकसित नहीं थी) पत्रिका काफी विलम्ब से आ पाई थी. परम आदरणीय भरत बाबू (श्री भरत शर्मा, डी० एस० कॉलेज, कटिहार) के अनुसार पत्रिका अच्छी बन पड़ी थी. अफसोस था तो सिर्फ इस बात का कि किये गये समझौतों की वजह से मैं अपना 'श्रेष्ठतम' नहीं दे पाया था. मगर मुझे दो-तीन बातों से बहुत सन्तोष भी हुआ था - एक तो मैं कुछ बहुत ही अच्छी स्थानीय प्रतिभाओं को साहित्य के मंच पर उतार पाने में सफल रहा (जिनमें से कुछ ने तो बाद में राष्ट्रीय-स्तर पर प्रसिद्धि भी पाई) और दूसरी फणीश्वरनाथ रेणु की पत्नी पद्मा रेणु का कालजयी इन्टरव्यू लेने में मेरी सफलता - जिसके लिये मैं श्री दिलीप कुमार विश्वास जी का हमेशा ऋणी रहूँगा जिन्होंने उन तक मेरी पहुँच आसान बनाने में बड़ी मदद की थी.


…एक बार फिर से राधेश्याम जी की तरफ लौटता हूँ. कटिहार में ही एक बार अपने सहकर्मी (और छोटे भाई) श्री ओमप्रकाश श्रीवास्तव के घर एक पुस्तक हाथ लगी. शीर्षक ने मुझे आकर्षित किया - 'सागर प्रश्न'. अरे…!! यह तो अपने राधेश्याम जी ने लिखी है !! मैं भाव-विह्वल हो उठा. सूर्यकान्त त्रिपाठी पर लिखी उनकी कविता मैंने "नया संसार" के मुखपृष्ठ की दूसरी तरफ (पूरे पृष्ठ पर) छापी थी…..उसकी एक अधूरी पंक्ति तो आज भी मुझे याद है, "....जब तनुजा रूठ गई थी…"


'सागर-प्रश्न' के पिछले कवर-पृष्ठ पर जब कवि का परिचय, फोटो और पता पाया तो कुछ और रोमांचित हुआ…अरे!! ये तो अब दिल्ली में ही बस गये हैं : अंकुर इन्कलेव, करावल नगर में…चलो कभी दिल्ली जाना हुआ तो मिलने का प्रयास करूँगा…


बात खत्म हुई. मगर कहाँ खत्म हो पाई. वक्त के हिलोरों के साथ, रिटायर होने के बाद, अब मैं भी दिल्ली में ही बस गया हूँ. कई साल हो गये. राधेश्याम जी से दो-तीन मुलाकातें भी हुईं - वैसी ही गर्मजोशी और आत्मीयता के साथ.


….मैंने सत्तार भाई को या राधेश्याम जी को कोई वादा नहीं किया था, कोई आश्वासन तक नहीं दिया था कि उनकी कविता को छापने का प्रयास करूँगा. लेकिन उनकी कविता छापी थी.. इसलिये कि उसमें खुद का इतना दमखम था कि वह "नया संसार" के सबसे प्रतिष्ठित पृष्ठ पर - अपने पूरे पन्ने के फैलाव के साथ - अपनी जगह मुकर्रर कर सके !!


आज राधेश्याम जी की दर्जन-भर से ज्यादा पुस्तकें हिन्दुस्तान के शीर्ष प्रकाशकों ने छापी हैं और उनका नाम साहित्यिक आकाश पर हमारे शहर के नाम को सुशोभित कर रहा है…मेरे लिये इससे बढ़कर आनन्द और संतोष की बात भला और क्या हो सकती है कि आज से चालीस साल पहले इस प्रतिभा को मैंने साहित्य की कसौटी पर परखा था और उसे "खरा सोना" होने की भविष्यवाणी कर दी थी…!!!

आत्मकथा : (2) विचारों का निर्माण

 किसी ने किसी सन्दर्भ में कहा :  

रहिमन धागा प्रेम का, मत तोरो चटकाय !

टूटे पे फिर ना जुरे, जुरे गाँठ परी जाय !!

.... जरा गहराई तक जाते हैं. इन पंक्तियों के रचयिता कौन हैं ? रहीम. पूरा नाम अब्दुर्रहीम खानखाना. अकबर के नौरत्नों में से एक. हुमायूँ के मित्र और अकबर के संरक्षक बैरम खाँ के पुत्र. तुलसीदास के समकालीन.

क्या वे हाड़माँस के बने नहीं थे ? थे. उनके दोहों में, किसी भी रचनाकार की तरह ही, उनके विचार ही तो निहित हैं ! विचारों के निर्माण की अपनी एक प्राकृतिक प्रक्रिया होती है. किसी-न-किसी सन्दर्भ-विशेष में घटित घटना मनुष्य के लिये एक खास किस्म के अनुभव को जन्म देती है. यही अनुभव उसके "विचार" बन जाते हैं. तत्पश्चात, रचनाकार (यहाँ कवि) अपने मस्तिष्क में संचित सैकड़ों-हजारों प्रतीकों के संकलन में से सर्वाधिक सटीक प्रतीक का चुनाव करता है. अब उस प्रतीक को एक उदाहरण की भाँति अपने उस "विचार" के समर्थन में कलात्मक तरीके से हमारे सामने प्रस्तुत कर देता है - कभी कविता के रूप में तो कभी किसी और रूप में. 

विचारों का निर्माण किसी तत्कालीन परिस्थितियों की उपज होती है. अत: सम्भव है कि कोई भिन्न परिस्थिति किसी भिन्न विचार को जन्म दे दे.

कविवर रहीम ने इन पंक्तियों में एक विचार प्रकट किया :

जो रहीम उत्तम प्रकृति, का करि सकत कुसंग !

चन्दन विष व्यापत नहीं, लिपटत रहत भुजंग !!

(अर्थात जो लोग अच्छी प्रकृति के होते हैं उन पर बुरी प्रकृति वाले लोगों की संगति का भी कोई बुरा प्रभाव नहीं पड़ता - ठीक उसी तरह जैसे चन्दन के वृक्ष पर विषैले साँप लिपटे रहते हैं मगर इससे चन्दन की शीतलता पर कोई भी दुष्प्रभाव नहीं पड़ता). 

मगर उन्हीं कविवर ने अपने ही उक्त विचार से भिन्न एक अलग विचार भी दिया है :

कदली, सीप, भुजंग मुख , स्वाति एक गुण तीन !

जैसी संगति बैठिए, तैसोई फल दीन !!

(अर्थात स्वाति नक्षत्र में हुई वर्षा की सभी बूँदें होती तो बिल्कुल एक समान हैं, किंतु धरातल पर भिन्न-भिन्न गुणों-दुर्गुणों वाली जगहों पर गिरने से उन्हीं वर्षा की बूंदों में (जो समान थीं) भिन्न-भिन्न गुणों-दुर्गुणों का प्रतिपादन हो जाता है - मसलन, कदली में पड़ने पर वर्षा की बूंद कपूर में परिवर्तित हो जाती हैं, सीप में गिर जाए तो बहुमूल्य मोती का रूप धारण कर लेती है, और वही बूँद यदि विषैले सर्प के मुंह में गिर जाए तो विष में बदल जाती है). 

विचारों की यह भिन्नता यही दर्शाती है कि व्यक्ति जब जिस परिस्थिति से गुजरता है, जैसे अनुभव उसने प्राप्त किये होते हैं, तद्नुरूप उसके विचार बन जाते हैं.

विवेचना हेतु अगला तथ्य यह है कि दुनिया का कोई भी विचार "निरपेक्ष" (absolute) नहीं है, हर विचार सापेक्ष (relative) है. मैं कहना क्या चाहता हूँ ? 

वैसे तो सैकड़ों उदाहरण हैं मगर एक की चर्चा करता हूँ. पुरानी फिल्म (बाँगला) "सिस्टर" की नायिका "अपने बच्चों" की और दूसरे सभी "अपनों" की जान बचाने की खातिर खुद को उस क्रूर मिलिट्री ऑफीसर के हवाले कर देती है जिसने उसके अनाथालय को बन्धक बना रखा है और उस नायिका को जरूर यह आशंका है कि उसकी इज्जत भी लूट ली जा सकती है. चूँकि वह अपने अनाथालय की सर्वेसर्वा है इसलिये सभी बच्चे उसके "अपने" ही बच्चे हैं, शेष लोग भी सभी उसके "अपने" ही हैं. उन सभी की जिम्मेदारी उसके ही कन्धों पर है. "शरीर" तो मिट्टी का है और उसे एक दिन उसी में मिल जाना है. ऐसे में तब "शारीरिक" शुचिता या "चारित्रिक" नैतिकता का क्या अर्थ रह जाता है जब सामने पचासों जिन्दगियों को बचाने की चुनौती सामने खड़ी हो ? (मौजूदा हालत यह भी है कि नीचे की पहाड़ी पर मौजूद भारतीय फौज की टुकड़ी को, जो इस वाकये से अन्जान है, अगर उसकी सूझबूझ से खबर मिल भी चुकी हो तो भी उसे यहाँ तक पहुँचने में अभी वक्त लगेगा) !! जैसी आशंका थी, उस क्रूर फौजी अफसर के द्वारा नायिका की इज्जत लूट ली जाती है.

मेरा प्रश्न है : क्या हम उस नायिका को "चरित्रहीन" कह या समझ पायेंगे ? उल्टे, क्या वह किसी "देवी" से कम है ?

हमारे विचार तत्कालीन परिस्थितियों पर निर्भर करते हैं. वे निरपेक्ष नहीं हैं. सामान्य परिस्थितियों में जो महिला  "चरित्रहीन" ठहराई जा सकती थी, वही महिला  (नायिका) तब "देवी" कही जायेगी जब परिस्थितियाँ बिल्कुल अलग हों, वैसी हों, जैसा कि उस फिल्म में दिखाया गया है.

एक भाई-बहन का जिक्र करना चाहूँगा. वे सहोदर हैं और तद्नूसार उनमें कुदरती प्रेम है. मगर इसके अतिरिक्त भी, उनमें जबर्दस्त वैचारिक समानता है. अगर कुछ भिन्नतायें हैं भी तो उनमें जो एक खास किस्म की मनो- वैज्ञानिक 'ट्यूनिंग' है उसकी बदौलत वह (अर्थात भिन्नतायें) उनके रिश्तों पर कभी हावी नहीं होती.

उनके पिता हैं, वैसे ही, जैसे सबों के होते हैं. गुणों से भरपूर और दुर्गुणों से भी उतना ही लैस जितना हाड़-माँस के इन्सान में होना अस्वाभाविक नहीं है.

भाई विद्रोही है. पिता से उसकी पटरी नहीं बैठती. घर छोड़ देना और फिर वापस आ जाना - एक से अधिक बार - कहीं-न-कहीं जहाँ उसकी परिस्थितियों की वजह से है वहीं मूल वजह यह है कि वह चाह कर भी अपनी जड़ों से दूर नहीं जा पाता.

बहन उसकी तरह विद्रोहिनी नहीं है. उसकी 'ट्यूनिंग' अपने पिता से है मगर कई गुणा ज्यादा अपनी माता से है.

बहन का पति अपनी जवानी में रंगीले मिजाज का होने की वजह से अपनी जायज-नाजायज कमाई उन क्षेत्रों पर भी लुटाता रहा था जिन पर लुटाया जाना अनुचित समझा जाता है. (उसके चरित्र पर इस लेखक की कोई गैरवाजिब टिप्पणी नहीं समझी जाय - यह लेखक का विनम्र निवेदन है). मगर, निश्चित तौर पर वह एक अतिदयालु व्यक्ति है. अपनी ससुराल पर भी उसका अत्यधिक प्रेम है, अपनी कमाई का कुछ-न-कुछ हिस्सा वह अपने ससुराल पर भी खर्च करता रहा था जिसकी आर्थिक विपन्नता से वह बखूबी वाकिफ था.

कालान्तर में इस सोच के मद्देनजर कि "अनैतिक" क्षेत्रों पर लुटाई जा रही "कमाई" का कोई छोटा-बड़ा हिस्सा किसी स्थाई प्रकृति की जायदाद में इन्वेस्ट किया जाना उस बहन के "भविष्य" के लिये बेहतर होगा, एक जमीन खरीदी जाती है. इस खरीद में उस भाई-बहन के पिता की "चतुराई" का एक अहम रोल होता है. इस चतुराई का एक "इतिहास" भी है जिससे भाई वाकिफ है और अपनी परिपक्व उम्र में (यानी जब उसे परिपक्वता हासिल हो जाती है, तब) वह उसे अपने पिता की "बेइमानी" समझता है (अन्यथा, अपनी अपरिपक्व उम्र में तो वह उसे अपने पिता की "बुद्धिमानी" समझता रहा था….खटकों के साथ-साथ).

इस इतिहास से अनभिज्ञ बहन उस खरीद के लिये अपने पिता के प्रति (खासकर माता के प्रति, जिसने उसके पिता को मोटिवेट करने में अहम भूमिका निभाई थी) कृतज्ञता महसूस करती है.

दृश्य बदलता है.

इस दृश्य में उस बहन के किशोर-उम्र बेटे की इन्ट्री होती है. बेटा रिश्तों की कोमलता और भावनात्मकता के अहसास से कोसों दूर एक अति-भौतिकतावादी किस्म का शख्स है जिसके लिये पैसों के आगे दुनिया की किसी भी संवेदनशीलता का कोई मोल नहीं है. उसे सब कुछ "जीत" लेने की और "जीतते रहने" की जिद्दी बीमारी है. यहाँ "सब कुछ" के अर्थ में वे सारी "इच्छायें" और "विचार" हैं जो उसके मन में आती रहती हैं. दूसरों पर (चाहे वह करीबी से करीबी सगा-सम्बन्धी क्यों न हो) पैसा लुटाने (या सामान्य-सी रकम भी खर्च करने) के अर्थ में वह अपने पिता से ठीक विपरीत प्रकृति का इन्सान (किशोर) है जो शनै: शनै: युवावस्था को बस छूने ही वाला है.

एक और दृश्य प्रत्यक्ष होता है. इस दृश्य में उन भाई-बहनों की माता सामने है. अपने पति के साथ हर समय कदमताल मिलाकर चलने वाली, उसके सभी नैतिक-अनैतिक निर्णयों की सहभागी और एक हिसाब से उस पर 'राज' करने वाली उस महिला के सम्बन्ध - बदली हुई परिस्थितियों में - उससे (यानी अपने पति से) खराब होते जा रहे हैं. ये "बदली हुई परिस्थितियाँ" क्या हैं उस पर अभी फिलहाल प्रकाश डालना कठिन है. वैसे भी वे इतनी जटिल हैं कि उन पर अलग से ही लिखा जा सकेगा और यहाँ उनकी आवश्यकता भी नहीं है. खराब होते जा रहे इस सम्बन्ध के बारे में फिलहाल इतना लिखने से नहीं बचा जा सकता कि जब उस महिला की मृत्यु हुई (यह एक आत्महत्या थी) उस समय तक में वह महिला बहुत ही गम्भीरता से अपने पति पर मुकदमा करना चाहती थी. इसलिये नहीं कि वह इस उम्र में किसी इन्साफ की चाहत रखती थी बल्कि इसलिये कि (जैसा कि उसने अपने बेटे को बताया था) वह पूरी दुनिया के सामने अपने पति का "कच्चा चिट्ठा" खोलना चाहती थी. 

एक और भी दृश्य पर्दे पर उभर रहा है. उन भाई-बहनों के पिता ने अपनी 'चतुराई' (जब-जब मैं 'चतुराई' शब्द का इस्तेमाल कर रहा हूँ तब-तब आप सब सुधी पाठकजन यों समझें कि इसमें भारतीय कानूनों की वह क्लिष्टता भी शामिल है जब कोई जमीन-मालिक या मकान-मालिक अपने किरायेदारों को वह जमीन या वह मकान बेच देने को मजबूर होता है जिस पर उस किरायेदार ने लम्बे समय से 'कब्जा' कर रखा होता है) से अपनी बेटी को एक मकान भी खरीदवा देता है. 

जाहिर है जब जमीन-मालिक या मकान-मालिक ऊपर उल्लिखित जमीन और मकान बेच रहे थे तो वे किसी-न-किसी सीमा तक 'मजबूर' भी थे और इस मजबूरी में उन्हें जमीन और मकान की वह कीमत नहीं मिली होगी जो कायदे से होनी चाहिये थी - खासकर तब जब सामने वाले खरीददार ने कानूनी पेंच में एक बार उसे जमकर पटखनी दी थी, अच्छा-खासा नुकसान पहुँचाया था और जो उसकी निगाह में एक 'धूर्त्त' व्यक्ति था.

अब कहानी उस उस कालखंड की जिसमें उस बहन के उस युवा (हाँ, अब वह युवा है, सिर्फ वह ही युवा नहीं, उसकी सारी भौतिकवादी और जिद्दी महत्त्वाकांक्षायें भी पूर्ण युवा हो चुकी हैं) बेटे का एक झगड़ा हुआ. यह झगड़ा उस भाई के साथ ही हुआ यानी मामा-भानजे के बीच. 

झगड़े में वह सब हुआ जो फोन पर हो सकता था. मामा और भानजे दोनों ने अपनी-अपनी मर्यादायें लाँघी.

उस भाई को तब जाकर बहुत क्लेश हुआ जब, तीन-चार या पाँच दिनों के बाद, उसने बहन को फोन मिलाया. उसे अन्दाजा तो था कि भानजे के साथ हुये विवाद के समय बहन वहाँ सम्भवत: मौजूद रही होगी पर उसे संशय भी था.

उसे विश्वास था कि अगर वह वहाँ मौजूद रही होगी तो उसने अपने बेटे को जरूर डाँट पिलाई होगी कि जब तुम्हारे मामा तुम्हारी माँग को पहली बार में ही जायज ठहराते हुये उसे निश्चित ही पूरा करने का वादा कर रहे थे - बार-बार और लगातार - तब तुम क्यों पागलों की तरह उनसे जबरन उलझ रहे थे ?

मगर यह क्या ? यहाँ तो बहन पर पुत्र-प्रेम हावी था. हालाँकि यह वही बहन थी जिसने पिछले कई मौकों पर वह कहा था, सिर्फ वही कहा था जो उचित था - खुद पर 'पुत्र-प्रेम' को कतई हावी नहीं होने दिया था. मगर अब क्या हो गया ? मानना ही पड़ेगा कि महाकवि वेदव्यास ने फिजूल में तो 'पुत्र-प्रेम' में अन्धे हो जाने वाले पात्र को नहीं रचा था. उन्होंने तो इस प्रवृत्ति को प्रकृति प्रदत्त ही माना होगा तभी ऐसे पात्र रचे होंगे - यद्यपि रचे गये पात्रों पर 'सु' अथवा 'कु' उपसर्ग लगाने हेतु मनुष्य-मात्र को उन्होंने स्वतंत्र छोड़ दिया कि अब तुम जैसा चाहो वैसा उपसर्ग लगा लो. जिसका, जैसा अनुकरण करना चाहो, कर लो. जैसी शिक्षा ग्रहण करना चाहो, कर लो.तभी तो अनवरत गति से महाभारत की भिन्न-भिन्न व्याख्यायें आजतक आती रही हैं और आती रहेंगी. 

…… मैं पूरी विनम्रता के साथ, पूर्ण सम्मान सहित कविवर रहीम के उक्त दोहे (रहिमन धागा प्रेम का…) की मार्फत व्यक्त विचार से असहमति प्रकट करता हूँ. मेरा मानना है कि बिगड़े हुये, टूटे हुये सम्बन्धों की डोर को ज्यादा मजबूत बन्धन के साथ इस तरह जोड़ा जा सकता है कि उसमें कोई गाँठ न रह जाये.

इसके लिये अगर जरूरत है तो सिर्फ वैसी किसी सापेक्ष परिस्थिति के निर्माण की जो कभी इन्सान अपनी कोशिशों से बना लेता है तो कभी ईश्वर खुद ही उसे ऐसा मौका दे देता है.

ooo

आत्मकथा : बिखरे पन्ने

आत्मकथा के पहले पन्ने पर अपनी बात कहाँ से शुरू करूँ यह ठीक से समझ में नहीं आ रहा. फिर भी. कहीं से तो शुरू करना ही होगा.

मुझे लगता है मैं सूफी हो गया हूँ. 69 साल की उम्र तक पहुँचते पहुँचते कितना कुछ नहीं देखा.कितना कुछ नहीं झेला.

किताबों ने, ठीक कहूँ तो साहित्य ने, इन्सानी जिन्दगी के हर रंग को पहचानना सिखाया, उन्हें उम्र की दहलीज पर चढ़ते-उतराते भोगना सिखाया. हर शै की नित नई, रंग-बदलती परिभाषाओं ने……… अच्छाइयों-बुराइयों, नैतिकताओं-अनैतिकताओं, रिश्ते-नातों, दोस्ती-दुश्मनी, लाभ-हानि, इहलोक-परलोक वगैरह वगैरह की सापेक्ष अनुभूतियों ने……… मुझे कितना और क्या बना दिया है ! …….दुनिया शायद इसी को ज्ञानवान होना या तजुर्बेकार होना समझती है.. समझे !

जिन्दगी के हर पड़ाव पर बहुतेरे लोग मिलेदोस्तियाँ हुईं, शत्रुताएँ हुईं..बहुतेरे लोगों से, परिवारों से घनिष्टता मिली, अन्तरंगता मिली.कपटी लोगों से भी साबका पड़ा झगड़े हुये..बगावतें हुईं…… विश्वासघातों से सामना हुआ..जख्म मिले, जख्म सिले, फिर हरे हुये, फिर सिले……सिलसिला चलता रहा.

पाप और पुण्य, सही और गलत, उचित और अनुचित अहसासों  की तरंगों पर डूबते-उफनाते तजुर्बे कब जवान होते चले गये पता ही नहीं चला. पीछे पलट कर देखता हूँ तो तजुर्बों की वह पोटली अब काफी प्रौढ़ भी हो चली है. पता नहीं कितने दिन और जीऊँगा …..जितना ही सही, उसकी प्रौढ़ता और ज्यादा परिपक्व होती चली जायेगी…….…..वैसे लगता नहीं कि अब उस पोटली में 'सिरे से कुछ और नया' जुड़ पायेगा.

बहरहाल, ये मेरे अपने खयाल-भर हैं और जरूरी नहीं कि इनसे हर कोई (या कोई भी) इत्तेफाक रखे ही. सबके अपने-अपने खयाल होते होंगे हर किसी को अपने खयालों से मुहब्बत भी होती ही होगी.उन्हें शायद यह भी लगता होगा कि 'मेरे जो खयाल हैं वे ही दुरुस्त हैं, सर्वोत्तम हैं उनसे अलग कुछ भी सही नहीं है'.

मैं क्या कर सकता हूँ ? सिवाय मुँह बन्द करके तमाशबीन बने रहने के ? …….मैं तो दरअसल खुद अपने खयालों को भी निरपेक्ष (absolute or perfect) नहीं मानता..तो दूसरों के भिन्न खयालों को गलत कैसे ठहरा सकता हूँ ?....... कौन जाने मेरे आज के खयालात कल को बदल जायें, मेरी बढ़ती उम्र के नये तजुर्बों के आलोक में ?

तो फिर अपनी बात कहने का फायदा क्या है ? तो रहने दूँ ? नहीं, यह समुचित नहीं है. इतिहास के पास अपनी स्वयं की समझ होती है, नजर होती है. वह खुद मूल्यांकन कर लेगा कि इस शख्स के पास जब जैसा तजुर्बा था उसने तब वैसा बयान दिया और उसके बयानों में ईमानदारी थी. और यह भी तय है कि अगर उसके बयान (यानी पलट जा चुके बयान) खुद में ईमानदार भी होंगे तब भी उस पर अवसरवादी होने का ठप्पा तो लगेगा ही लगेगा. मगर यही रीत है, यही नियति है……..यह ठप्पा तो उसे बर्दाश्त करना ही पड़ेगा. दूसरा कोई विकल्प नहीं.

अगर मैंने आपको अपनी यह आत्मकथा पढ़ने को दी है तो आप अगली पंक्तियों में मेरे कुछ खयालात से (आज तक के मुकम्मल खयालात से) रू-ब-रू होने वाले हैं. आप उनसे सहमत हों या न हों, यह पूर्णत: आपकी मर्जी है, मगर अपने मन में मेरे खयालात की कद्र जरूर करें - यह आपकी सज्जनता का, आपके शिक्षित होने का और आपके सभ्य होने का सूचक होगा.

*         वाल्टेयर (प्रसिद्ध फ्रांसीसी लेखक, कवि, नाटककार, उपन्यासकार, निबन्धकार और नागरिक स्वतंत्रता के प्रबल समर्थक दार्शनिक) ने कहा था, "हो सकता है मैं तुम्हारे विचारों से सहमत ना हो पाऊं लेकिन विचार प्रकट करने के तुम्हारे अधिकार की रक्षा जरूर करूंगा".

*       अपने विचारों को सर्वश्रेष्ठ समझना मूर्खता है.

*       वह इन्सान आजतक पैदा ही नहीं हुआ जिससे कभी कोई गल्ती नहीं हुई. और न ऐसा इन्सान कभी पैदा होगा.

*       अपनी गल्ती को स्वीकार कर लेना कलेजे वालों का काम है. वैसा कलेजा कम ही लोग दिखला पाते हैं.

*       अहंकार या घमण्ड बहुत बुरी चीज है यह तो हर व्यक्ति जानता है पर विडम्बना यह है कि ज्यादातर लोग अपने अहंकार को पहचान ही नहीं पाते.

o  किसी को अपनी सूरत का तो किसी को अपनी सीरत का,        o  किसी को अपने खानदान का तो किसी को अपने पैसे का,        o  किसी को अपने रुतबे का तो किसी को अपने समुदाय का,      o  किसी को अपनी शिक्षा का तो किसी को अपनी प्रसिद्धि का 

    अहंकार होता है पर वह उसे पहचान नहीं पाता. उसे इसकी अनुभूति ही नहीं होती. कोई दूसरा अगर टोक भी दे तो वह अपने अहंकार को मानने को तैयार ही नहीं होता. अपनी नासमझी में वह उसे अपना गौरव ठहराता है. उस पर वह फख्र महसूस करता है.

*       बहुधा लोग आत्म-सम्मान और अहंकार में फर्क कर भी नहीं पाते.

*   अहंकार कुछ तो कम बुरी चीज रही होती अगर नादान लोगों के द्वारा अपने अहंकार का प्रकटीकरण न किया जाता. यह प्रकटीकरण अपने निकृष्टतम रूप में ज्यादातर दो तरह का दिखता है : 

o दूसरों को नीचा या कमतर (यानी lower-graded) दिखाने में, और                                                                             o दूसरों पर अपने विचार, अपनी इच्छायें थोपने में        (यानी to dictate others).

 *      "क्रोध" भी अहंकार का एक सूचक है.

 *      इन्सान क्या है ? क्या उसका अपने जन्म पर या मृत्यु पर कोई नियन्त्रण है ? क्या उसे इतना भी पता होता है कि उसकी मृत्यु कब होगी ? यानी एक अन्जान और अपरिचित जीवन-धारा है जिसमें वह बहता चला जाता है. वह हमेशा एक भ्रम में जीता है कि

o मुझे फलाँ चीजों का ज्ञान है / मुझे फलाँ चीजों का ज्ञान          नहीं है.                                                                           o मेरे पास फलाँ चीज है / मेरे पास फलाँ चीज नहीं है.           o मैंने ऐसा किया / मैं ऐसा नहीं कर पाया.

         जबकि हकीकत यह है कि ये सारी की सारी स्थितियाँ सिर्फ भ्रम की स्थितियाँ हैं. दरअसल हम सिर्फ वही कर रहे होते हैं जो तात्कालिक परिस्थितियाँ हमसे कराती हैं.

 *      एक पुरानी बम्बईया फिल्म के एक अप्रचलित डायलॉग ने मेरे दिमाग को अनायास चिन्तन की एक नई दिशा दे दी थी. पहले लगा कि एक घटिया बात के जवाब में एक दूसरी घटिया बात ही तो कही गई है. मगर दूसरे ही पल महसूस हुआ कि बात कड़वी जरूर है मगर है तो सच. मन्दाकिनी (उस फिल्म की हीरोइन) किसी आरोप के जवाब में कहती है, "वैसे तो दुनिया में किसी को भी पता नहीं होता कि उसका बाप कौन है". यानी वह तो ताउम्र उसी शख्स को अपना बाप मानता रहता है जो उसे दूसरों ने (जैसे कि उसकी माँ ने) बताया हुआ होता है. मगर दूसरे एंगल से सोचें तो क्या उस इन्सान के लिये यह गारन्टीड सच हुआ ?

*       जब हम यह सोचना शुरू कर देते हैं कि आखिर हम हैं कौन ? हमारा वजूद क्या है ? हम इस दुनिया में कैसे आ गये ? कहाँ से आ गये ? तब हमारा चिन्तन हमें उस एक सृष्टिकर्त्ता के "होने" का एहसास करा देता है जिसके "होने" को लेकर हम अपने जीवन-काल की कतिपय सीढ़ियों पर "निश्चय-अनिश्चय" से गुजर चुके होते हैं. तब जाकर हम महसूस करने लगते हैं कि कोई-न-कोई एक शक्ति-पुंज है जरूर, भले ही वह अदृश्य है, और वही इस दुनिया के सारे कार्य-कलाप अपनी मर्जी से संचालित कर रहा है..इन्सान खामख्वाह अपनी पीठ ठोकता है कि ये सारे क्रिया-कलाप मैंने ही तो किये.

*     अहंकार पर एक बार फिर से लौटते हैं.

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मैं न होता तो क्या होता

(रामचरित मानस के संकलन से) 

अशोक वाटिका में जिस समय रावण क्रोध में भरकर तलवार लेकर सीता माँ को मारने के लिए दौड़ पड़ा, तब हनुमान जी को लगा कि इसकी तलवार छीन कर इसका सिर काट लेना चाहिये, किन्तु अगले ही क्षण उन्होंने देखा कि मंदोदरी ने रावण का हाथ पकड़ लिया, यह देखकर वे गदगद हो गये.

वे सोचने लगे यदि मैं आगे बढ़ता, सीता माता को बचाता, तो मुझे भ्रम हो जाता कि यदि मैं न होता तो सीता माता को कौन बचाता ?

बहुधा हमको ऐसा ही भ्रम हो जाता है कि मैं न होता तो क्या होता ?

परन्तु ये क्या हुआ कि सीताजी को बचाने का कार्य प्रभु ने रावण की पत्नी को ही सौंप दिया. तब हनुमान जी समझ गये कि प्रभु जिससे जो कार्य लेना चाहते हैं, वह उसी से लेते हैं.

आगे चलकर जब त्रिजटा ने कहा कि लंका में बंदर आया हुआ है और वह लंका जलायेगा तो हनुमान जी बड़ी चिंता में पड़ गये कि प्रभु ने तो लंका जलाने के लिए कहा ही नहीं है. और यहाँ त्रिजटा कह रही है कि उन्होंने स्वप्न में देखा है कि एक वानर ने लंका जलाई है. अब उन्हें क्या करना चाहिए ? उन्होंने मन में सोचा : जो प्रभु इच्छा.

जब रावण के सैनिक तलवार लेकर हनुमान जी को मारने के लिये दौड़े तो हनुमानजी ने अपने को बचाने के लिए तनिक भी चेष्टा नहीं की और जब विभीषण ने आकर कहा कि दूत को मारना अनीति है तो हनुमान जी समझ गये कि मुझे बचाने के लिये प्रभु ने यह उपाय कर दिया है.

आश्चर्य की पराकाष्ठा तो तब हुई, जब रावण ने कहा कि बंदर को मारा तो नहीं जायेगा पर इसकी पूँछ में कपड़ा लपेट कर घी डालकर आग लगाई जाये तब हनुमान जी की समझ में आ गया कि लंका वाली त्रिजटा की बात सच थी - वरना लंका को जलाने के लिए मैं कहाँ से घी, तेल, कपड़ा लाता और कहाँ आग ढूँढता पर वह प्रबन्ध भी आपने (प्रभु ने) रावण से करा दिया. जब आप रावण से भी अपना काम करा लेते हैं तो मुझसे करा लेने में आश्चर्य की क्या बात है !

इसलिये हमेशा याद रखें कि संसार में जो कुछ भी हो रहा है वह सब ईश्वरीय विधान है, हम और आप तो केवल निमित्त (माध्यम) मात्र हैं, इसीलिये कभी भी ये भ्रम न पालें कि...

                   मैं न होता तो क्या होता ?

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 तो, ये सारे सांसारिक कार्यकलाप जिनमें इन्सान दिन-रात डूबा रहता है दरअसल सिर्फ एक मायाजाल है और हम सब क्या हैं ? हम सब सिर्फ ऐसी कठपुतलियाँ हैं जिसकी डोर प्रभु की ऊँगलियों से बँधी है. प्रभु जब, जिससे, जैसा भी कोई काम करवाना चाहते हैं वे उसी हिसाब से परिस्थितियों का निर्माण कर देते हैं और इन्सान उस allotted work को कर गुजरता है.

प्रभु की इच्छा अगर उस कार्य में सफलता दिलवाने की होती है तो इन्सान सफल हो जाता है और उन्होंने इसका उल्टा चाहा तो इन्सान असफल हो जाता है. मगर, प्रभु ने जो यह धरती नाम का रंगमंच बना रखा है उसके पात्र अपनी अज्ञानता में उस सफलता को सच में अपनी खुद की सफलता समझ कर खुश हो रहे होते हैं या उस असफलता को सच में अपनी असफलता समझ कर दुखी हो रहे होते हैं. प्रभु इस रंगमंच के पात्रों को यह अनुभूति होने ही नहीं देते कि वह तो सिर्फ एक पात्र-भर था और उसने सिर्फ वही किया है जो प्रभु ने करवाया है. तो किस बात का खुश होना और किस बात का दुखी होना ?

महाभारत के युद्ध में, कुरुक्षेत्र में, ठीक युद्ध आरम्भ होने से पहले, अर्जुन रिश्तों के मायावी मोह में पड़ गये थे और उन्होंने युद्ध करने से इन्कार कर दिया था, यह कह कर कि जिनसे मैं लड़ने जा रहा हूँ, जिनको युद्ध में मार डालने के लिये तैयार होकर आया हूँ उन पर अस्त्र प्रहार कैसे कर पाऊँगा; वे सब तो मेरे अपने ही भाई-बन्धु, रिश्तेदार हैं...काका, मामा, पितामह, बाबा, नाना, गुरुजन आदि. उनको मार कर अगर हमें राज्य मिल भी गया तो वह हमारे किस काम का ?

भगवान श्रीकृष्ण ने तब उन्हें अपना विराट रूप दिखाया. अर्जुन ने भगवान के खुले हुये मुख को देखा तो देखते ही रह गये. उसमें अर्जुन को पूरा ब्रह्माण्ड दिखने लगा. युद्ध के मैदान समेत दोनों तरफ की सेनायें भी दिख रही थीं, दोनों तरफ के सारे योद्धा भी दिख रहे थे - यहाँ तक कि खुद अर्जुन भी उसमें भगवान के साथ दिख रहे थे. भगवान ने समझाया - मैं संसार के हर जड़-चेतन प्राणी में विद्यमान हूँ, पेड़-पौधों में विद्यमान हूँ. नदी, नाले, समुद्र, रेत, पहाड़ सब में मैं ही हूँ. मैं तुझमें भी हूँ और दुर्योधन में भी मैं ही हूँ. यह पूरा संसार मेरी ही लीला है. दोस्त भी मैं ही हूँ और दुश्मन भी मैं ही हूँ. पांडव भी मैं हूँ और कौरव भी मैं ही हूँ. ये सारे सूर्य-चन्द्र, ग्रह-नक्षत्र भी मैं ही हूँ. मैं धरती और आकाश के एक-एक कण में हूँ.……तू जो यह तेरा-मेरा सोचने में मग्न है वह सब तेरा भ्रम है, सब कुछ तो मेरा है, तू तो बस निमित्त है, माध्यम है.….. मैंने तुझे धरती पर जिस भूमिका में भेजा है तू निर्विकार भाव से वह करता जा और जो कुछ भी तू करे वह सब मुझको सौंपता जा. न्याय के पक्ष में तेरा युद्ध करना आवश्यक है, यह तेरा क्षत्रिय-धर्म है. न्याय-पथ पर अपने कर्त्तव्य का पालन कर, युद्ध कर. मानव-मात्र के द्वारा अपने कर्त्तव्य का निर्धारण करना और उस हेतु युद्ध करना सब मेरी ही लीला है.

भगवान श्रीकृष्ण ने इसी तरह बहुत सारे उपदेश अर्जुन को दिये जो "श्रीमद् भगवद् गीता" में संकलित हैं. इसे ही संक्षेप में "गीता" कहा जाता है. महात्मा गांधी को इसी से शक्ति और प्रेरणा मिलती थी और यह चौबीसों घंटे की उनकी संगिनी थी. "हे राम" कहते हुये जब बापू इस दुनिया से विदा ले रहे थे तब भी उनके हाथों में "गीता" मौजूद थी.

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लेकिन जो एक बात और महत्त्वपूर्ण है वह यह है कि भगवान ने हजारों मामलों में इन्सान को "अपने कृत्यों (यानी अच्छा या बुरा काम)" को करने की आजादी भी दी है, खुला मैदान छोड़ रखा है. वह इस बात की परीक्षा लेते हैं कि देखें इस आजादी को पाकर तुम किस राह को चुनते हो - अच्छे राह को या बुरे राह को.

हजारों, लाखों लोग दिन-रात कड़ी मेहनत करके बमुश्किल दो वक्त की रोटी जुगाड़ पाते हैं. फिर भी वे चोर, उचक्कों, डकैतों का रास्ता नहीं अपनाते. वे अच्छी राह चुनते हैं, ईमानदारी का रास्ता चुनते हैं. अच्छी राह चुनने वालों के लिये भगवान ने उचित समय में उचित पुरस्कार देने की व्यवस्था कर रखी होती है. चोर, उचक्कों, अपराधियों, दुश्कर्मियों के लिये ठीक उसी तरह उन्होंने दण्ड की व्यवस्था भी कर रखी होती है जो उचित अवसर पर उसे दे दी जाती है.

दो कहावतों पर अपने चिन्तन को फोकस करता हूँ.

पहली है, "जब ऊपर वाला देता है तो छप्पर फाड़ कर देता है". यह पुरस्कार है - हजारों लाखों किस्म में से एक किस्म का. दूसरी कहावत है, "ऊपर वाले की लाठी में आवाज नहीं होती". यह दण्ड है - उस किस्म का जब कोई समझे या ना समझे जिसे मिलता है वह खूब समझता है. उसी तरह दण्ड की अन्य किस्में भी हैं.

विश्लेषण की विषय-वस्तु यहाँ यह है कि इन्सान के सामने रास्तों को चुनने की आजादी है - सुकर्म वाले और कुकर्म वाले. ऐसा क्यों है ? ऐसा इसलिये कि भगवान ने सुसंस्कार और कुसंस्कार की पृष्ठभूमि बना दी है और हम इन्सानों को आजादी देकर हमसे उम्मीदें लगा रखी है कि हम अपने मस्तिष्क नाम की मशीन का सदुपयोग करके सुकर्म वाले मार्ग पर चलें - जब इस मशीन का हम सदुपयोग करते हैं तो अपने कुसंस्कारों को भी ठेंगा दिखाकर सुकर्म वाले मार्ग को चुनते हैं और पुण्य के दावेदार बन जाते हैं. इसके विपरीत जब हम अपने सुसंस्कार को नजरंदाज करके कुमार्ग को चुनते हैं तो पाप के भागी बनते हैं. हमारे धर्मशास्त्रों में लिखा है कि पुरस्कार हो या दण्ड - अगर हमें इस जन्म में नहीं मिला तो निश्चित तौर पर वह हमें अगले जन्म में मिल जाता है. इसे ही प्रारब्ध कहते हैं.

निष्कर्ष यह निकलता है कि पुण्य हो या पाप - इन दोनों का फल वह स्वयं के लिये ही निर्धारित करता है, किसी और के लिये नहीं. और इसमें किसी का स्वार्थ है तो खुद उसका अपना. किसी की भलाई है तो खुद उसकी अपनी. अगर वह सोचता है कि मैंने किसी की भलाई कर दी है तो वह गलत सोचता है. दरअसल उसने वैसा करके खुद अपनी भलाई रिजर्व करा ली है जो उसे इस जीवन में भी मिल सकती है और न मिली तो अगले जन्म में तो सुनिश्चित ही मिलेगी - जैसा कि ऊपर कहा गया है इसे ही प्रारब्ध कहते हैं.

ठीक इसी तरह अगर वह सोचता है कि मैंने किसी की बुराई कर दी है तो वह गलत सोचता है. दरअसल उसने वैसा करके खुद अपनी बुराई रिजर्व करा ली है जो उसे इस जीवन में भी मिल सकती है और न मिली तो अगले जन्म में तो सुनिश्चित ही मिलेगी - जैसा कि ऊपर कहा गया है. प्रारब्ध यह भी है.

अब इसी स्टेज पर मैं अपनी बात थोड़ी देर के लिये रोकता हूँ.

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मेरी जिन्दगी की दो घटनाओं का उल्लेख बारी-बारी से करना चाहूँगा. मगर पहले एक आम व्यवहार

हट्ठे-कट्ठे जवान लोगों को भीख माँगते देख कर गुस्सा किसे नहीं आता. मुझे भी आता था. पर, अब नहीं आता.

एक दूसरे मुहल्ले की किराने की दुकान पर एक ऐसी ही हट्ठी-कट्ठी महिला को एक बार मैंने भीख देने से इन्कार कर दिया था. मेरे बैंक के एक सहकर्मी के बड़े भाई की दुकान थी वह. मजे की बात यह कि दुकानदार मेरा मित्र था, हमने साथ में पढ़ाई की थी. और उसका छोटा भाई यू० पी० की किसी ब्रान्च से ट्रान्सफर होकर आया था और इस शहर में अब मेरा सहकर्मी था. तो बात तब की है जब किसी काम से अपने सहकर्मी से मिलने के लिये मैं गया था. वह घर की पहली मंजिल पर रहता था सो मेरे मित्र ने उसे आवाज लगाई और मेरे आने की सूचना दे दी. दुकान एक साथ दो उद्देश्य पूरे करती थी - दुकान होने की और और उस ज्वाइन्ट फैमिली के ड्राइंग रूम होने की. ऐसी बातें आम होती हैं हमारे जैसे मिड्ल क्लास लोगों के यहाँ.

वह हट्ठी-कट्ठी भिखारिन बड़ी ढीठ निकली. मेरे मना करने के पहले मेरा वह मित्र भी उसे 'आगे बढ़ो' का संकेत देकर इन्कार कर चुका था. मगर वह अभी तक डटी हुई थी. इस बीच 18-20 साल की एक लड़की जाने कब आकर काउन्टर पर खड़ी हो गई थी. उसे कुछ सौदा लेना था. मेरे मित्र ने अब उस भिखारिन को डाँटा, "आगे क्यों नहीं बढ़ती, जब देखो तब आकर मेरी दुकानदारी खराब कर देती है". अब वह थोड़ा ठिठकी और मुड़ी.

तब तक मेरे बगल में खड़ी उस लड़की ने भिखारिन को रुकने का संकेत दिया और एक सिक्का उसके कटोरे में उछाल दिया. भिखारिन चली गई. कुछ ही देर में अपना सौदा लेकर वह लड़की भी चली गई. हम फिर से गपशप करने लगे. सहकर्मी को नीचे आने में समय लग रहा था.

तभी बातचीत का रुख मोड़ते हुये मेरे मित्र ने कहा, "रमेश, जानते हो वो जो लड़की अभी सौदा लेने आई थी वह कौन है ?"

"नहीं, मैं तो उसे नहीं जानता. कौन है वो ?"

"वह एक कॉल गर्ल है".

"तो ?" मैंने पूछा.

"मैंने बस यूँ ही बता दिया. बेचारी बड़ी गरीब है. एक छोटा भाई है, पढ़ा रही है. माँ को कैन्सर है. खुद कोई ज्यादा पढ़ी-लिखी भी नहीं है कि कहीं ऑफिस में काम कर सके. बाप पियक्कर था. ऑटो चलाता था. बीवी-बच्चों की रोज पिटाई करता था. जो कमा कर लाता वह शराब में उड़ा देता. बीवी झाड़ूपोछा करके किसी तरह घर चलाती. एक दिन अचानक मर गया. कुछ ही दिन के बाद बीवी को कैन्सर हो गया. अब यह किसी तरह दोनों को सँभाल रही है".

उसकी कहानी सुन कर हृदय थोड़ा द्रवित हुआ. मगर कुछ पलों के बाद ही यह बात आई-गई हो गई.

बहुत बाद में जाकर मुझे महसूस होने लगा कि मैं अब भिखमंगों के प्रति कठोर बना नहीं रह पाता हूँ. मैं खुद को टटोलता हूँ कि ऐसा क्यों है. खुद को कोई जवाब तो नहीं मिलता पर हर बार उस लड़की की सूरत सामने आ जाया करती.

इस घटना के कई साल बाद दक्षिण भारत के एक शहर Vellore में एक ठेले वाले ने, जो अपने ठेले पर इस्लामी साहित्य बेचता था और बड़ी अच्छी हिन्दी (उर्दू मिश्रित) बोलता था, एक बड़ी अच्छी बात बताई. उसने कहा कि जिस ऊपर वाले ने इस कायनात (ब्रह्माण्ड) को बनाया, पूरी दुनिया बनाई - क्या उसके पास अनाज की, पैसों की, दूध-मेवों की कोई कमी है ? क्या वह अपने इन बन्दों का (उसका इशारा भिखारियों और मजलूमों की तरफ था) पेट नहीं भर सकता ? जरूर भर सकता है. लेकिन उसे तो इस बात का इम्तेहान भी लेना है कि उसके सामर्थ्यवान बन्दों में इन्सानियत बची है या नहीं. बची है तो कितनी बची है. उसके बन्दे सिर्फ अपने ही बाल-बच्चों का पेट भरने में बिजी हैं या अपनी कमाई गरीबों और मजबूरों पर भी खर्च करते हैं. हमारी किताबों में खुदा का हुक्म लिखा है कि अपनी कमाई का इतना हिस्सा गरीबों और मजलूमों पर खर्च करो.

मुझे फिर से वह लड़की याद आ गई. एक विचार मन में उठा कि अपना शरीर बेचने को मजबूर उस लड़की ने यह नहीं देखा कि भिखारिन तो हट्ठी-कट्ठी है, खुद मेहनत कर सकती है, कमाई कर सकती है तो इसे पैसे क्यों दिये जाँय. उसने प्रोग्रेसिव विचारकों, विद्वानों की तरह यह नहीं विचारा कि वैसे लोगों को भीख देने का मतलब है उन्हें निकम्मा बने रहने को प्रोत्साहन देना. उसने सिर्फ यह देखा कि भिखारिन जरूरतमन्द होगी तभी तो सार्वजनिक रूप से, तिरस्कार झेलकर भी, भीख माँग रही है. तो उस अनपढ़ लड़की ने भगवान के द्वारा निर्देशित सुकर्म वाले मार्ग का अनुसरण किया. यह करके उसने उस भिखारिन का कितना भला किया यह महत्त्वपूर्ण नहीं है. महत्त्वपूर्ण यह है कि अनपढ़-गँवार होकर भी उसने अन्जाने में अपने लिये एक अच्छा "प्रारब्ध" बना लिया, अपने लिये भगवान के यहाँ पुरस्कार रिजर्व कर लिया.

मुझे अपने साथ काम करने वाली एक बहुत जूनियर बंगाली लड़की अपर्णा चक्रवर्त्ती की भी याद हो आई है जिसके पति की अभी हाल में ही कोरोना से मृत्यु हुई है. उसके पिता रेलवे में क्लर्क थे. बेटा कोई था नहीं, बेटियाँ एक-एक कर छह हो गई थीं. अपर्णा सबसे छोटी थी. जब वह सिर्फ छह महीने की थी उसके पिता एक्सीडेन्ट में मारे गये थे. सबसे बड़ी बहन उस समय आठवीं में पढ़ रही थी. रेलवे से कुछ पैसे मिले थे, काम किसी तरह चल रहा था. मगर उसकी माँ की मानसिक हालत धीरे-धीरे बिगड़ती जा रही थी. रिश्तेदार लोग अपनी अच्छी-बुरी और कृत्रिम रिश्तेदारी निभा रहे थे. किसी तरह उसकी बड़ी बहन की शादी (जब वह दसवीं में थी) निपटा दी गई.

लड़का रेलवे में ही अभी-अभी बहाल हुआ था. परिवार समृद्ध था, पैसों की कोई कमी न थी. घरवालों की इच्छा के विरुद्ध जाकर उसने नौकरी पकड़ी थी. मिजाज से विद्रोही, क्रान्तिकारी, लीक से हट कर चलने वाला और अपने उसूलों में पक्का.

अपर्णा के जीजा.तब और अब !! वे तो कब के रिटायर भी हो गये. उनकी पत्नी, अपर्णा की बड़ी बहन भी करीब पन्द्रह साल पहले गुजर गई. वही थी जिसने अपने पति को अपने नैहर के परिवार का, अपनी छोटी-छोटी बहनों का गार्जन माना, गार्जन बनाया. उन्होंने हालात की दुश्वारियाँ देखी, जिम्मेदारियों को स्वीकार किया और वहीं के होकर रह गये. अपर्णा और उसकी सभी बहनों को (सिर्फ बड़ी वाली को छोड़कर) उन्होंने अच्छी शिक्षा, अच्छे संस्कार दिये. सभी को एक-एक करके अच्छी नौकरियाँ मिली. उन्होंने अपर्णा सहित सभी बहनों की शादियाँ करवाईं, सबके घर बसा दिये. आज भी अपर्णा और उसकी बहनों में अपने जीजा के लिये जो सम्मान की भावना है वह शायद किसी को अपने सगे पिता के लिये भी न हो.

जमशेदपुर शहर को छोड़ना न पड़ जाय इस हेतु उन्होंने अपना प्रोमोशन भी ठुकरा दिया. सोचा, कि मैं चला जाऊँगा (प्रोमोशन स्वीकारने पर ट्रान्सफर भी लेना पड़ता) तो इन बच्चों की परवरिश कैसे होगी.

इसका उन्हें पुरस्कार भी मिला. उनका बेटा आइ० ए० एस० की परीक्षा में निकल गया. उनकी दिवंगत पत्नी का यह सपना था - जो उनकी गैरहाजिरी में भी पल्लवित होकर रहा. बिहार महिला समाज (यह झारखण्ड राज्य बनने के पहले की घटना है), जो भारतीय कम्यूनिस्ट पार्टी की एक संबद्ध राज्य इकाई है, का राष्ट्रीय अधिवेशन हुआ तो उसके आधिकारिक मुख्यद्वार और कार्यस्थल का नाम उनकी पत्नी, रूपा चक्रवर्त्ती के नाम पर रखा गया. कितनी ही सभा-सोसायटियों में उन्हें मुख्य अतिथि के तौर पर सम्मानित किया जाता रहा है और यह सिलसिला जारी है. उन्हें भारतीय कम्यूनिस्ट पार्टी की राष्ट्रीय कार्यकारिणी में भी स्थान दिया गया है. उनके सम्मान की ढेर सारी ऐसी बातें हैं जो मुझे मालूम भी नहीं है. तो यह है उनका प्रारब्ध जो इसी जीवन में उन्हें मिल गया और जाने कब तक मिलता रहेगा !!!

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इन दोनों घटनाओं से यह सोच उभरती है कि किसी भी परिस्थिति में अगर हम इस धरती पर किसी की भलाई करने की सोचें तो ये दो बातें जरूर ध्यान में रखें :

हम उस पर कोई एहसान नहीं कर रहे हैं. जो भी कर रहे हैं वह अप्रत्यक्ष रूप से ईश्वर की प्रेरणा से कर रहे हैं. हमें यह भलाई इस तरह करनी है कि "अगर दाँयें हाथ से किसी को कुछ दे रहे हैं तो बायें हाथ तक को पता न चले कि हमने उसे कुछ दिया है".

जिसे कुछ दे रहे हैं उनसे ऐसी कुछ भी उम्मीद न रखें कि बदले में वह हमारी इच्छाओं का पालन करेगा. बस "नेकी कर, दरिया में डाल" का पालन करते चलिये.

"कभी-कभी मेरे दिल में खयाल आता है" जैसे बेहतरीन गीत का बेहतरीन संगीत रचने बॉलीवुड के मशहूर संगीतकार खय्याम साहब की याद तो आपको होगी. मगर, शायद आपको यह बात न मालूम हो कि अपने जीवन-भर की सारी कमाई उन्होंने बॉलीवुड में काम करने वाले छोटे-मोटे कामगारों के नाम वसीयत कर दी थी.

उसी तरह एक और बहुत बड़ा नाम नानी पालकीवाला का है (जो इतने बड़े न्यायविद् थे कि उनके बारे में क्या बताऊँ, क्या न बताऊँ. सैकड़ों महत्त्वपूर्ण बातों में से सिर्फ एक बात बताना शायद मुफीद हो कि सुप्रीम कोर्ट के Justice H. R. Khanna ने (वही Justice H. R. Khanna जिनकी वरीयता को नजरअंदाज करके श्रीमती इन्दिरा गांधी ने उनसे कनीय जस्टिस बेग को सुप्रीम कोर्ट का चीफ जस्टिस बना दिया था और उन्होंने इसके विरोध में इस्तीफा दे दिया था) कहा था :

 It was not Nani who spoke. It was divinity

           speaking through him. 

(भावार्थ यह कि जो कुछ नानी ने कहा है वह दरअसल उन्होंने नहीं कहा. उनकी मार्फत खुद ईश्वर ने यह सब कहा है).

तो बात इन्हीं नानी पालकीवाला की कर रहा हूँ. कम ही लोगों को पता होगा कि अपनी वसीयत में उन्होंने अपनी समस्त जायदाद का एक बहुत बड़ा हिस्सा चेन्नई (तत्कालीन मद्रास) के प्रसिद्ध "शंकर नेत्रालय" के नाम लिख दिया था ताकि गरीब और लाचार लोगों का इलाज किया जा सके. बाद में अपनी श्रद्धा के रूप में इस अस्पताल ने बाकायदा अपनी एक विशालकाय बिल्डिंग को उनके नाम समर्पित कर दिया.

इस तरह की हजारों घटनाओं से हमें क्या सीख लेनी चाहिये मैं उस पर आता हूँ.

किसी की मदद करने से पहले हमें सौ बार सोच लेना चाहिये कि कहीं इस मदद के बदले में हमारे मन में किसी तरह की वापसी लेने का तो कोई खयाल नहीं है न ? अथवा कहीं यह चाहत तो नहीं छुपी हुई है न कि यह शख्स हमारी भावनाओं का, इच्छाओं का आदर करेगा ? या हम कहीं ऐसा तो नहीं मान कर चल रहे हैं कि यह शख्स तो अब हमारे निर्देश पर ही अपने फैसले लेगा ? अगर ऐसा कुछ भी हमारे मन में है तो बेहतर है कि हम उसकी मदद ही न करें. और अगर मदद करने की तीव्र इच्छा उठ रही हो तो अपने मन को उक्त सवालों की कसौटी पर पहले कस कर देख लें और तभी मदद करने का निर्णय लें. और तब, अगर अपने मन को हम संशय में पा रहे हों तो सख्ती से मदद देने के अपने संकल्प को जड़ से ही खत्म कर दें. हम अपनी सामर्थ्य का कोई एक छोटा-बड़ा हिस्सा किसी जरूरतमन्द को देकर अहंकार में पड़ जाते हैं कि देखो मैंने इतना बड़ा काम कर दिया है. किसी का इतना भला भला कौन करता है ! वह तो समझिये कि मैंने इतनी बड़ी मदद कर दी वरना इसका यह काम कहाँ हो पाता ! बस, यही हमारे चिन्तन की रुग्नता है, हमारा अहंकार है. याद रखें यह दुनिया हमारी मदद की मोहताज नहीं है. उसका काम तो तब भी किसी-न-किसी तरह प्रभु चला ही देंगे, ठीक वैसा जैसा उन्होंने उसके लिये तय कर रखा है. याद कीजिये ऊपर लिखा गया हनुमान जी की घटनाओं का सन्दर्भ जिसका विषय था :

              मैं न होता तो क्या होता

*       पृथ्वीराज कपूर ने अपने जीवन में काफी संघर्ष किया था. तब जाकर फिल्मी दुनिया की इतनी बड़ी हस्ती बन पाये थे. संघर्ष की महत्ता वह समझते थे. वे चाहते तो अपने बड़े बेटे राज कपूर को शान-ओ-शौकत की जिन्दगी जीना मुहैय्या करा सकते थे. मगर उनका सपना था कि मेरा बेटा भी एक महान फिल्मकार बने, दुनिया-भर में नाम कमाये. एक बार बचपन में जब राज कपूर स्कूल से लौटे तो स्कूल-बस से उतरने के साथ ही बारिश शुरू हो गई. उनकी माता जी छाता लेकर दौड़ीं पर बीच में ही पृथ्वीराज जी ने उन्हें रोक दिया. कहा, "उसे जिन्दगी के हर रंग का तजुर्बा हासिल करने दो. उसे जानना चाहिये कि बारिश में भींगना क्या होता है. आखिर एक दिन उसे महान फिल्मकार बनना है. लोगों के सुख-दुख पर फिल्में बनानी है."

"उसकी तबियत खराब हो गई तो ?" उनकी माता जी ने चिन्ता प्रकट की.

"इलाज हो जायेगा".

और आखिर सच में राजकपूर जी बीमार पड़ गये. इलाज हुआ और वे ठीक हुये. मगर उस दिन की बारिश ने कुदरत के एक चटख रंग से उनका परिचय जरूर करा दिया.

लाइटमैन की ड्यूटी से फिल्मी दुनिया में कदम रखने वाले राज कपूर ने 22 वर्ष की उम्र में "आग" फिल्म का निर्माण कर डाला था जो उस दौर के लिये एक बहुत बड़ी बात थी. मगर इसके भी पहले उन्होंने केदार शर्मा जैसे बड़े निर्देशक की थप्पड़ भी खाई जिन्होंने उन्हें बतौर हीरो पहली बार सिनेमा के पर्दे पर उतारा था; नीलकमल फिल्म का एक सीन फिल्माया जा रहा था और बेचारे राजकपूर उस सीन में बार-बार फेल हो रहे थे (यानी री-टेक पर री-टेक लिया जा रहा था). आखिर केदार शर्मा झल्ला गये थे और गुस्से में उनको थप्पड़ लगा दिया था.

राज कपूर को जितनी प्रसिद्धि मिली यह तो पूरी दुनिया को पता है मगर एक सच कम लोगों को ही मालूम है कि एक समय ऐसा भी आया कि राज कपूर के नाम पर दिये जाने वाले एक प्रतिष्ठित पुरस्कार पाने वाले फिल्मकारों में एक ऐसा नाम भी शामिल हुआ जिसने सबको चौंका दिया. यह वही नाम था जिसकी ऊपर में चर्चा हो चुकी है - केदार शर्मा.

*       मैं क्या कहना चाहता हूँ ? मैं इस उदाहरण से "संघर्ष" की महत्ता पर प्रकाश डालना चाहता हूँ. जिनको अपने जीवन में संघर्ष करना ही नहीं पड़ा और बैठे-बिठाये आराम और ठाठ-बाट की जिन्दगी जीने को, भोगने को मिल गई वे जिन्दगी की हजारों किस्म की तकलीफों को पहचानने से चूक गये और जिसका फल यह हुआ कि वे अपने रास्ते में आने वाली छोटी-मोटी विघ्न-बाधाओं से ही घबरा जाते हैं. उनकी मानसिक स्थिति की एक दूसरी तस्वीर यह होती है कि उन लाचार और गरीब लोगों के प्रति (जिनके वर्त्तमान आर्थिक हालात अच्छे नहीं हैं) उनका रवैया कभी-भी दिल की गहराइयों से संवेदनशील नहीं रहता, हमदर्दी का नहीं रहता - जितना दिखता है वह नकली होता है. अगर हालात के मारे लोगों से कोई चूक हो जाये तो उनकी नकली हमदर्दी अपने विस्फोटक रूप में सामने आ जाती है जो कह जाती है कि "तुम अपनी मर्जी से अपनी जिन्दगी नहीं जी सकते, तुम्हें हमारे इशारों पर चलना होगा". यह क्या है ? यह अहंकार है. हम क्यों भूल जाते हैं कि जिस तरह अपने तरीके से (चाहे वह तरीका जैसा भी हो) हम अपनी जिन्दगी जी रहे हैं ठीक उसी तरह उन गरीबों को भी अपनी जिन्दगी अपने तरीके से जीने का हक ईश्वर ने उन्हें भी दिया है. हम क्यों यह चाहत पालें या उनको मजबूर करें कि वे हमारे तरीके से जिन्दगी जीयें ? इसलिये कि हमने उनकी मदद की है ?

*       मेरे जीवन को जिन मूल्यों ने सजाया-संवारा है मुझे लगता है उनमें "गीता-सार" की बहुत बड़ी देन है. आज एक बार उन्हें दोहरा लेने को जी कर रहा है.

o गीता सार o

क्यों व्यर्थ चिन्ता करते हो?

किससे व्यर्थ डरते हो?

कौन तुम्हें मार सकता है?

आत्मा न पैदा होती है, न मरती है.

जो हुआ, वह अच्छा हुआ.

जो हो रहा है, वह अच्छा हो रहा है.

जो होगा, वह भी अच्छा ही होगा.

तुम भूत का पश्चाताप न करो.

भविष्य की चिन्ता न करो.

वर्तमान चल रहा है.

तुम्हारा क्या गया, जो तुम रोते हो?

तुम क्या लाये थे, जो तुमने खो दिया?

तुमने क्या पैदा किया था, जो नाश हो गया?

न तुम कुछ लेकर आए, जो लिया यहीं से लिया.

जो दिया, यहीं पर दिया.

जो लिया, इसी (भगवान) से लिया.

जो दिया, इसी को दिया.

खाली हाथ आये, खाली हाथ चले.

जो आज तुम्हारा है, कल किसी और का था, परसों किसी और का होगा.

तुम इसे अपना समझकर मग्न हो रहे हो.

बस, यही प्रसन्नता तुम्हारे दुखों का कारण है.

परिवर्तन संसार का नियम है.

जिसे तुम मृत्यु समझते हो, वही तो जीवन है.

एक क्षण में तुम करोड़ों के स्वामी बन जाते हो, दूसरे ही क्षण तुम दरिद्र हो जाते हो.

मेरा-तेरा, छोटा-बड़ा, अपना-पराया मन से मिटा दो, विचार से हटा दो.

फिर सब तुम्हारा है, तुम सबके हो.

न यह शरीर तुम्हारा है, न तुम इस शरीर के हो.

यह अग्नि, जल, वायु, पृथ्वी, आकाश से बना है और इसी में मिल जाएगा.

परन्तु आत्मा स्थिर है, फिर तुम क्या हो?

तुम अपने आप को भगवान को अर्पित करो.

यही सबसे उत्तम सहारा है.

जो इसके सहारे को जानता है, वह भय, चिन्ता, शोक से सर्वदा मुक्त है.

जो कुछ भी तुम करते हो, उसे भगवान को अर्पण करते चलो.

ऐसा करने से तुम सदा जीवन-मुक्ति का आनन्द अनुभव करोगे.

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 ………….(अब अगले पन्नों पर, अगली किश्त में, फिर कभी…… इसी मूड के साथ, जो शायद जल्द ही बन जाय).