जब हम बच्चे
थे
एक
गाना
लाउडस्पीकर पर बहुत बजता
था.
फिल्मों की या फिल्मी
गानों
की
कोई
समझ
तो
थी
नहीं,
पर
अच्छा
लगता
था.
गाने
के
बोल
तो
अभी
भी
याद
हैं,
शायद
धुन
की
वजह
से...."तुमको
पिया
दिल
दिया
कितने
नाज
से..."
उम्र
का
पहिया
धीरे-धीरे
आगे
बढा
तो
रेडियो
पर
विविध
भारती
की
मेहरबानी से पता चला
कि
फ़िल्म
का
नाम
"शिकारी" था. इन
बातों
को
बताये
जाने
का
कोई
मकसद
नहीं
है
सिवाय
इसके
कि
इस
फिल्म
के
गीतकार
थे
फारुख
कैसर.
फिल्मों में
गाने लिखने के
अलावे कैसर साहब
और क्या-क्या
करते थे मुझे
नहीं मालूम. मगर
उनके लिखे एक
फिल्मी गाने के
अंदाज़ से पता
चलता है कि
वे अच्छे शायर
भी थे. पेश-ए-खिदमत है
उसकी चन्द लाइनें :
बाद
मुद्दत के हम
तुम मिले,
मुड़के
देखा तो है
फासले,
चलते-चलते ठोकर लगी,
यादें,
वादे, आवाज़ देते
ना काश...!!
(जी हाँ, इस
ब्लॉग का परिचयनामा)
हाँ,
हाँ भाई, मोदी
पर बोलूँगा ना
अभी.....बस जरा-सा रुक जाइये...पहले मोहब्बत की
बातें हो जाने
दीजिये.....कोई दिलजला
एक मुद्दत के
बाद अपनी महबूबा
से मिलता है....मिलता क्या है,
बस नजर पड़ी
तो आवाज़ दे
बैठता है, बिना
कुछ सोचे-समझे......मगर यह क्या.....यहाँ तो अपने
पूरे वजूद के
साथ लंबे-लंबे
फासले थे......जेहन
में कुछ यादें
उभरी, कुछ वादे
याद आये.....तभी
ठोकर लगी.....सब
कुछ बिखर गया......काश हम आवाज़
ही ना देते
!!
मोहब्बत में
ऐसा ही होता
है......कभी कोई
ख्वाब पनपता है.....फिर परवान चढता
है.....साथ जीने-मरने की कसमें
खाई जाती हैं......और तब एक
दिन सब खत्म
हो जाता है......ख्वाब चकनाचूर हो
जाता है.
मगर
गिने-चुने मामलों
में मोहब्बत कामयाब
भी होती है......वो बड़े नसीब
वाले होते हैं.
ऐसा
ही सियासत में
भी होता है.
बहुत से लोग
हथियार डाल देते
हैं......हुँह, हमसे
ये सब नहीं
होगा !! अपने बच्चन साहब भी तो थे
कभी राजनेता….....और
ठीक इसके उलट
भी........मोदी जैसे लोग
सत्ता के शीर्ष
तक पहुँच जाते
हैं....
"मोदी जैसे लोग...."
से मेरा अभिप्राय क्या
है ? उत्तर में
मेरे दिमागी कंप्यूटर पर
इतिहास का बटन
दब जाता है....
पन्नों
के अंदर पन्ना,
पन्नों के बाद
पन्ना .....
- गोधरा.........साबरमती एक्सप्रेस........27 फरवरी 2002.......आग.......कारसेवकों का जलना.......आरोप............मुस्लिम समुदाय......28 फरवरी 2002.......गुजरात.......दंगा.......मुख्यमंत्री.........नरेंद्र मोदी…......पुलिस......ढील.....इशारा…....होने दो......"क्रिया की प्रतिक्रिया होती ही है" (कभी इंदिरा गांधी की हत्या के बाद उभरे सिखों के भयानक नरसंहार के समय राजीव गांधी ने भी उसका ऐसा ही औचित्य प्रस्तुत किया था.........”जब भी कोई बड़ा पेड़ गिरता है तो धरती थोड़ी हिलती ही है”)............इस बार मुसलमान........भयानक नरसंहार..........गुलबर्ग सोसायटी…........एहसान जाफरी......बेस्ट बेकरी.......इसरत जहां.........एलईटी इन्वॉल्वमेंट (?)......गीता जौहरी का हटाया जाना.........सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर जौहरी की वापसी वगैरह वगैरह............केंद्रीय कमीशन........राज्य कमीशन.........सीबीआई रिपोर्ट...........एसआईटी रिपोर्ट........अदालतों के फैसले.........अदालतों की सीमायें..............उनके अंतर्विरोध...........उनके पूर्वाग्रह.........कानूनी पेचीदगियाँ बनाम नेताओं की महारत.........सबूत मिटाने की कला...........सबूत बनाने की कला.......... मातहत अफसरों से उल्लू सीधा करवाने की कला.........बाद में मुंह फेर लेने की कला......आईपीइस बंजारा.........जेल.........जेल से इस्तीफे का भेजा जाना......इस्तीफे की वजह......छोडो भी यार…....मोदी का हिन्दू ह्रदय-सम्राट बन जाना ....... हिन्दुओं के वोट-बैंक की नई तिजोरी का खुल जाना (कभी गुरू आडवाणी ने सोमनाथ रथ-यात्रा की नौटंकी करके इसी तरह भाजपा के लिये वोट-बैंक की तिजोरी का फीता काटा था.......जीरो से हीरो बनाने का आरम्भ किया था)........मोदी-शाह के चोली-दामन सम्बन्ध का दीर्घकालीन पुख्तापन............... राजनैतिक इतिहास का एक और बदनुमा दाग...........देश की साम्प्रदायिक एकता लहू-लुहान.....
- बतौर तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी बाजपेयी का कहना, "राज-धर्म निभाइये मोदी जी, राज-धर्म..."
- सपने का बड़ा होना.....प्रधानमंत्री बनने की महत्वाकांक्षा.....इस्तेमाल किया जाना…...लाल किले वाले मॉडल के मंच का
- अब सपने का पूरा होना.......आडवाणी को किनारे धकेल दिया जाना.......राजनीति जाने कब किसके दिन फेर दे....
- दूसरी बार भी कुर्सी हासिल.... प्रचंड बहुमत......ईवीएम पर फिर से से मीन-मेख का निकाला जाना......कहा गया मशीन में छेड़छाड़ संभव नहीं.......करने वालों ने कर दिखाया.....मगर यह हिन्दुस्तान है जनाब...... तूती उसी की बोलेगी जो कुर्सी पर है......विपक्ष के भी अपने चरित्र हैं......एकाध सीट कहीं जीत ली तो ईवीएम मसला खटाई में........हार हुई तो कलंक ईवीएम पर.......फिर यहां चुनाव आयोग भी है.....कांग्रेस के जमाने से ही परम्परा रही है........सभी “ऑटोनोमस बॉडीज” की..........तूती उसी की बोलेगी जो कुर्सी पर है.....और मजे की बात है, यहां न्यायपालिका भी है.....हँसी आती है कि स्वतंत्र भी है......उसका डंडा चलता तो है मगर कब और किस पर यह देखने वाली बात है.....चुप, चुप !! न्यायपालिका पर मुंह मत खोल......नहीं खोलना चाहिए......कईयों को देखा है कुर्सी को खुश करते हुए......बाद में कुर्सी द्वारा पुरस्कृत होते हुए.....ताजा उदाहरण भी है ना.....अभी हाल में "भूतपूर्व" हुए एक जज साहब का.....एक से बढ़कर एक फैसले ताबड़तोड़ कर डाले.......राफेल.....राम जन्म-भूमि .... और भी ढेर सारे......मुगाम्बो खुश हुआ !!
- तृप्त हैं पूरी तरह अब........राज्य-सभा की सदस्यता पाकर.....बदनाम भी होंगे तो क्या नाम न होगा ? ....इंटरव्यू पढ़ा अभी-अभी....लचर बातें.....कुछ तो सफाई देनी होगी ना, सिर्फ इसलिए.......कोई दमदार कारण होता तब तो बताते.......मगर जनता इंटरव्यू भी कहाँ पढ़ती है......आखिर परम्परा तो कांग्रेस ने ही डाली थी ना........
- 56 इंच के सीने वाला फिर से कुर्सी पर सवार हुआ .....किसी ने नाप कर तो नहीं देखा ......मगर सबने देखा........पहले कहा था "एक तरफ पाकिस्तानियों के द्वारा हमारे जवानों के सिर काटे जा रहे हैं, और दूसरी तरफ मनमोहन सरकार उनको बिरयानी खिला रही है" ......
- फिर टीम ने इसमें जोड़ा था...."हमारी सरकार बनेगी तो हम एक के बदले दस सिर काट कर लायेंगे" .....सबने देखा आज तक तो एक भी सिर नहीं आया..... उल्टे मोदी पहुँच गए…....ताल ठोंक कर….... बिना किसी प्रोग्राम के…....बिल्कुल अचानक…...नवाज शरीफ की चौखट पर जन्मदिन की बधाई देने …. क्या पता बिरयानी भी खाया हो..…
- हाँ ढोल बहुत पीटा गया......सर्जिकल स्ट्राइक का भी.......ताकि फ़ौज के गुणगान के बहाने प्रचार अपना हो…... वोट-बैंक अपना बढ़े....आतंकी अनवर के मारे जाने के बाद शहीद हेमराज की पत्नी धर्मवती ने तो कहा भी था "मुझे भी अब उस आतंकी का सिर चाहिए, जो मेरे पति का सिर काटने वाले आतंकियों में शामिल था"…..मिल गया ?......ढोल बजाने की कला में कांग्रेस पिछड़ गयी.....वरना क्या कांग्रेस के ज़माने में सर्जिकल स्ट्राइक नहीं हुए थे ?.....
- जनता तो आज तक यह भी नहीं जान सकी कि पुलवामा में सीआरपीएफ के काफिले में आरडीएक्स से लदी हुई कार घुसी तो कैसे घुसी ?.....इतनी जबरदस्त सुरक्षा व्यवस्था में ढील अगर हुई थी तो कौन लोग थे उसके लिए जिम्मेदार ?........सिर तो किसी का नहीं ला पाए, उल्टे अपने चालीस जवानों को खो दिया....और आखिर इसमें राज क्या है ?...किसकी साजिश थी यह ? ....साजिश नहीं थी तो लापरवाही तो होगी किसी की ? ....क्यों आज तक जनता नहीं जान पाई ? ......कुछ तो राज है परदे के पीछे.......जनता को सवाल पूछना नहीं आता....वोट देना आता है....ढोल की आवाज़ ठीक सुन लेती है....जिसका ढोल जोर से पीटा जा रहा हो.....
- कहा था अच्छे दिन लायेंगे....ले आये ?...कहा था सबों के खाते में 15-15 लाख डालेंगे....डल गये ? .....अच्छे दिन तो नहीं आये नोटबंदी की लम्बी-लम्बी कतारें जरूर आ गईं....... देशभर में कितने मरे आज तक सही संख्या कोई नहीं जान पाया.........मीडिया तो बस गिने-चुने मामले ही दिखा पाता है....ऊपर से मीडिया का बिक जाना या चमचा हो जाना............ बकौल रवीश कुमार गोदी मीडिया हो जाना...आतंकवाद मिट गया ?...कहा तो था....काला धन वापस आ गया ? कहा तो था ..........सारा काला धन विदेशों से लायेंगे जो स्विस बैंकों समेत तमाम अन्य देशों (टैक्सहैवन्स) में जमा है...ले आये ?......कहा तो था......तबाही तो जीएसटी भी कम नहीं लाई....जानना है तो छोटे-छोटे दुकानदारों से पूछ कर देखिये……छोटे-छोटे व्यवसायों से जुड़े लोग कम पढ़े-लिखे ही होते हैं...........उनसे जीएसटी की पेचीदगियाँ संभाले नहीं संभलतीं...... वकील-मुंशी को मोटी फीस देनी पड़ती है......ग्राहक से टैक्स मांगो तो ग्राहक ही छूट जाते हैं......कोई एक मुसीबत हो तो बताएं.....
नया
पन्ना .....पन्ने के
अंदर पन्ना, पन्ने
के बाद पन्ना
.....
- आज़ादी के पहले से ही हिन्दुओं का एक तबका मुसलमान विरोधी रहा है......इनकी मानसिकता रही है कि या तो मुसलमान इस देश से चले जाँय या वे यहां दोयम दर्जे के नागरिक बन कर रहें.....लेकिन इस तबके की चली नहीं ........देश की बड़ी आबादी के पास हमेशा से गांधी जैसे नेता रहे और उनके समर्थकों का ही वर्चस्व रहा जो सर्वधर्म समभाव में आस्था रखता था.....और उस ज़माने से आज़ादी के बाद भी लम्बे समय तक बल्कि वास्तविक अर्थों में अभी भी सर्वधर्म-समभाव की मानसिकता वाले लोग ही हिन्दुस्तान की विशाल आबादी का हिस्सा हैं.......मगर मुसलमान विरोधी तबके ने कभी हार नहीं मानी और समाज में जहर घोलते रहे ताकि उनके खिलाफ बड़े पैमाने पर नफ़रत फैले.....इस तबके की कुंठा रही कि इन्हीं के पूर्वजों ने जो बाहर के मुल्कों से हमारी धरती पर आये थे, हम पर हमला करके हमें परास्त किया था और हम पर हमारी ही धरती पर बड़े-बड़े जुल्म किये थे....इसी कुंठा ने आज़ादी के पहले और बाद सांप्रदायिक दंगे करवाये........इसी सोच ने भारत के टुकड़े करवाने में अपनी भूमिका तय की......इस तबके को हमेशा शिकायत रही कि जब पाकिस्तान बन गया था तब सारे मुसलमानों को वहाँ क्यों नहीं भेज दिया गया..... ....बहरहाल भारतीय बहुसंख्यक आबादी ने जब इन्हें तवज्जो नहीं दिया तब इनके सेनानायकों में धीरे-धीरे यह बात घर करती गई कि सीधे रास्ते तो अपनी मंज़िल नहीं मिलने वाली है.....सोचते-सोचते इन्हें एक रास्ता मिला.......धर्मभीरू जनता को धर्म के नाम पर गुमराह करने का.....आडवाणी की रथ-यात्रा इसी सोच का एक महत्त्वपूर्ण पड़ाव थी......यह प्रयोग काम कर गया ....संसद में इन ताकतों की संख्या बढ़ने लगी.....इस सोच को अभी और कारगर होना बाकी था और वह हुआ मोदी-काल में ......मोदी चिंतन ने कमाल का एक काम किया.......अपनी असल मंशा को छुपाते हुए, उन महापुरुषों के नाम को छाती से चिपका कर रखने की नौटंकी का, जिनका चिंतन, जिनकी विचार-धारा इन लोगों से ठीक उल्टी थी और ……जो दूर-दूर तक इनसे मेल ही नहीं खाती थी...महात्मा गांधी, वल्लभ भाई पटेल, बाबासाहब अंबेदकर, सुभाष चंद्र बोस, भगत सिंह, चंद्रशेखर आज़ाद, शिवाजी, स्वामी विवेकानंद इत्यादि.........यह चाल काम कर गयी......उन महानायकों के नाम का बहुत ढोल पीटा गया जो आम जनता के ह्रदय में बसते थे ........ यह एक अनोखी चाल थी......इसने तो मोदी को इतना चमका दिया कि भाजपा दो तिहाई बहुमत हासिल कर गयी.......
- बहुत बारीक तरीके से मोदी की कार्य-प्रणाली को परखा जाए तो मोदी की असल मंशा को समझा जा सकता है...… मॉब-लिन्चिंग की देशव्यापी घटनाओं पर मोदी चुप ....दबाव ज्यादा पड़ा तो एक लाइन कह दिया कि हिंसा बर्दाश्त नहीं की जाएगी......ये लिंचिंग के मामले मुसलमानों पर हो रहे थे....मोदी के भक्तगण ही कर रहे थे.......मगर भक्तों के लिए दिशा-निर्देश कुछ भी नहीं दिया.....अर्थ साफ़ था......देश भर के बड़बोले नेता मुसलमानों को या न्याय-संगत बातें बोलने वाले हिन्दुओं को पाकिस्तान चले जाने को बोलते रहते हैं.........मोदी चुप रहते हैं......चमचे उनकी देशभक्ति पर उंगली उठाते रहते हैं......मोदी चुप रहते हैं......नाथूराम गोडसे को देशभक्त बताने वाली प्रज्ञा ठाकुर को टिकट दे देते हैं........माफीनामे का नाटक करवा कर ऊंची समिति में डलवा देते हैं....
- मोदी की चुप्पी
बड़े-बड़े विस्फोटक फैसलों का संकेत
होती हैं.......एनआरसी, सीएए,
एनपीआर क्या हैं
.......चुप्पी
में जो राज
छिपे हैं उन्हीं
की अभिव्यक्तियाँ तो
हैं......इस मुगालते में
मत रहिये कि
तीन तलाक के
फैसले के पीछे
उनकी पीड़ा है,
मुस्लिम माताओं, बहनों की......असल मकसद तो
मुस्लिम आबादी का आधा
वोट-बैंक है.....मोदी को पता
है मुसलमान कभी
उन्हें वोट देना
पसंद नहीं करेंगे
तो चलो उनमें
से आधे को
तो "फोड़" लो....
- पन्ने का सिर्फ शीर्षक बता देता हूँ....आपको याद आ जाएगा .....राफेल .......क्या कहूँ...... सब तो आप जानते ही हैं........सुप्रीम कोर्ट के जिस फैसले ने मोदी को क्लीन-चिट दे दिया उसमें तो झोल ही झोल था, अब कन्फर्म हो गया ......पहले सिर्फ शंका थी.......मगर अब ?.... राज्य-सभा की सीट ? ...... क्या जानना बाकी रहा ?........सब तो साफ़ हो गया.....और वह महिला कर्मचारी ? ......सुना है उसे सिर्फ बहाल ही नहीं कर दिया गया, पदोन्नति भी दे दी गयी ?........उसके सभी सस्पेंडेड भाई- भतीजों को भी फिर से बहाल कर दिया गया ?......यह क्या साबित करता है ? ......महिला सच बोल रही थी या झूठ, इससे परे भी एक सवाल उठता है......साहेब जी पाक-साफ़ थे क्या ? ....चलो यार अब बंद भी करो.....ठीक है, ठीक है.....यादों की यह किताब बंद कर देता हूँ.....
वैसे
भूला तो कुछ
भी नहीं हूँ....भूल
सकता भी नहीं.....वह दिन याद
है मुझे....घनघोर
रूप से रूढ़िवादी एवं
कट्टर ब्राह्मण महिला
ने अपने नवजात
शिशु की जान
बचाने के लिए
किस तरह एक
मुसलमान रिक्शा वाले की
पत्नी की मदद
कृतज्ञता से स्वीकार की
थी......मुसलमान गरीब
महिला ने खुशी-खुशी अपने खुद
के नवजात शिशु
के हिस्से में
कटौती करके ब्राह्मणी के
अबोध बालक की
प्राणरक्षा की थी, अपना
दूध पिलाकर.....ब्राह्मणी का
दूध किसी अज्ञात
वजह से सूख
गया था........मोदी जैसे
लोग बाबर और
खिलजी जैसे खूंखार
अत्याचारियों के कारनामें लाख
पढ़ते-पढ़ाते रहें,
आम आदमी को
इतिहास पढ़-पढ़कर
अपना खून जलाने
की जरूरत नहीं
पड़ती.....उन्हें इतिहास
में नहीं वर्त्तमान में
जीना ज्यादा पसंद
होता है.....
.....बस "मोदी जैसे लोग"
से मेरा जो
अभिप्राय था वह बीज-रूप में इतना
ही था. मगर फिर भी .....
oooooooooooo
oooooooooooo
मगर
फिर भी अपनी
आत्मा को और
सृष्टि के रचयिता
परमात्मा को हाजिर नाजिर
मान कर अब
जो मैं कहना
चाहता हूँ उसे
सीधे-सादे शब्दों
में बयान करता
हूँ.......पानी पी-पीकर
दिन-रात इंदिरा
गांधी को कोसते
रहने वाले अटल
बिहारी बाजपेयी ने - जो विपक्ष के, भाजपा के, सबसे बड़े नेता थे -
कभी किसी ख़ास
परिस्थिति में, देश के
हित में, अपने
देशवासियों के हित में,
उस समय की
प्रधानमंत्री इंदिरा को "दुर्गा" कहा था, अपना
बेबाक समर्थन दिया
था .....बिना शर्त,
बिना मांगे…..
कहा
जाता है जंगल
में जब आग
लगती है तब
बाघ और बकरी
एक साथ मिल
कर एक ही
घाट पर पानी
पीते हैं.......दोस्तों, आज
फिर से हम
सभी देशवासी एक
ख़ास परिस्थिति - एक
बहुत ही ख़ास,
अन्जानी और सर्वनाशी किस्म
के आग से
जूझ रहे हैं.......अभी तो सारे
सवालों से ऊपर
सिर्फ एक सवाल
है.......क्या हम सब
बचेंगे ? दुनिया बचेगी
इस प्रलय-रूपी
कोरोना नामक अदृश्य
दुश्मन से ?....ऐसे
में हमारे देश
का प्रधानमंत्री मोदी
- हर मतभेद से
ऊपर - हमारा सर्वमान्य नेता
है......उसके सारे
दिशा-निर्देशों का
अक्षरशः पालन करना ही
अभी हमारी सच्ची
राष्ट्रभक्ति है.....
आइये,
मानवता बचाने की
इस लड़ाई में
हम सब मिलकर
मोदी जी के
नेतृत्व में एक साथ
कंधे से कंधा
मिला दें…..जी-जान लगा दें….आमीन !!!
Nice things and very knowledgeable thoughts in this post and I really happy for this post and I wish you that you always writing in this blog and thank you so much.
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