मोबाइल की घंटी बजी। जीजा जी थे।
"क्या कोई जरूरी काम कर रहे हो, साला बाबू ?" उत्तर का इंतज़ार किये बगैर उन्होंने फ़रमाया, "डीडी भारती पर एक अच्छी फिल्म शुरू हुई है, मृणाल सेन की, समय हो तो देख लो।" और उन्होंने फोन काट दिया।
कहाँ तो मैं अपने ऑनलाइन विद्यार्थियों के लिये नोट्स की तैयारियों में उलझा हुआ था और कहाँ जीजा जी का हुक्म आ खड़ा हुआ। मेरे लिये उनकी हर इच्छा, हर प्रस्ताव एक स्नेहिल-सा हुक्म ही हुआ करता है जिसे मेरे न मानने की तो कल्पना भी नहीं की जा सकती।
तो वे अपने 'हुक्म' इसी स्टाइल में जारी किया करते हैं और जब उनमें बात फिल्म की हो तो मैं समझ जाता हूँ कि मामला गम्भीर किस्म की साहित्य-मीमांसा से जुड़ा है। ऊपर से उन्होंने मृणाल सेन का भी नाम ले लिया जो मेरे सर्वाधिक पसंदीदा फिल्मकारों में से हैं।
तो वे अपने 'हुक्म' इसी स्टाइल में जारी किया करते हैं और जब उनमें बात फिल्म की हो तो मैं समझ जाता हूँ कि मामला गम्भीर किस्म की साहित्य-मीमांसा से जुड़ा है। ऊपर से उन्होंने मृणाल सेन का भी नाम ले लिया जो मेरे सर्वाधिक पसंदीदा फिल्मकारों में से हैं।
लॉकडाउन की इस चिलचिलाती धूप में जया के लिये अभी वक्त है तेज स्पीड में चल रहे पंखे के नीचे लेट कर टीo वीo सीरियल्स में डूब जाने का। लिहाजा उसे डिस्टर्ब न करके अपनी कुर्सी पर ही बैठे-बैठे लैपटॉप में उलझा रहना मुझे मुफीद लगा।
यू-ट्यूब पर पूरी फ़िल्म (एक दिन अचानक) मैंने एक बार में ही बेरोकटोक खत्म कर डाली। अत्यन्त संक्षेप में कहानी यह है कि अपने पेशे से प्यार करने वाला एक प्रोफेसर - जो रिटायरमेन्ट के बाद भी कम-से-कम एक से अधिक बार सेवा-विस्तार लेकर अपने पढ़ाने के जुनून के साथ जिन्दा है - अचानक एक दिन कहीं गायब हो जाता है। यद्यपि यह स्पष्ट नहीं है कि उसके साथ कोई दुर्घटना हुई है या उसने ख़ुद को जान-बूझ कर गायब कर रखा है - मगर कहानी के मूल-स्वरूप को इस स्पष्टता की आवश्यकता भी नहीं है, बल्कि उसका इस तरह से गायब हो जाना कि अन्त तक भी उसका पता न चले कहानी की माँग भी है।
कहानी असल में शुरू अब होती है। फलैश-बैक के जरिये मृणाल दा एक तरफ़ प्रोफेसर की लेखकीय महत्त्वाकांक्षा को रेखांकित करते हैं, जो ख़ुद पर लगाये गये plagiarism (नकल करना) के आरोप पर बिफर पड़ता है तो दूसरी तरफ़ वे प्रोफेसर के बेटे-बेटियों और पत्नी के उस दृष्टिकोण पर भी रोशनी डालते हैं जिसमें उसके प्रति अलग-अलग किस्म की शिकायतें हैं और सिर्फ शिकायतें ही हैं। कहानी का एक तीसरा कोण उस सन्देह का भी है जो इन सभी की आँखों में प्रोफेसर के प्रति है - यह कि उसका अपनी एक भूतपूर्व छात्रा के साथ अफेयर है (छात्रा अब उसकी सहकर्मी बन गयी है और जिसे उसकी विद्वता को लेकर कोई सन्देह नहीं है - जबकि उसके सभी घर वाले उसकी विद्वता को मानने-समझने को ही तैयार नहीं हैं)। उस अफेयर का सन्देह सबके मन में फल-फूल रहा है मगर इसे कोई भी एक-दूसरे के समक्ष स्पष्टता के साथ प्रकट नहीं करता।
प्रोफेसर की गैर-मौजूदगी में वक्त के साथ धीरे-धीरे पहले तो सभी अपनी-अपनी सामान्य दिनचर्या में लग जाते हैं - उसके प्रति अपने-अपने दृष्टिकोण के साथ। लेकिन उसकी गैर-मौजूदगी साल भर के दरम्यान उन सभी को यह अहसास कराती रहती है कि उन सब की जिन्दगी में उसके मौजूद रहने का क्या महत्त्व था। धीरे-धीरे उन सबके दृष्टिकोण में बदलाव आने लगता है और उन्हें अपनी-अपनी त्रुटियाँ याद आने लगती हैं। मगर इस बदलाव को कोई भी किसी के समक्ष प्रकट नहीं करता - तबतक, जब तक कि उस अफेयर का पर्दाफ़ाश नहीं हो जाता कि दरअसल दोनों के बीच कोई अफेयर था ही नहीं।
लेकिन इसी स्टेज पर मृणाल दा मानव-मन की उस कोमल स्नेहासिक्त दुर्बलता का परिचय भी कराते हैं जो नैसर्गिक है (और जो यहाँ एकपक्षीय तो है ही) लेकिन जो कहीं से भी सामाजिक-पारिवारिक ताने-बाने की सीमा नहीं लांघता और न ही अपनी जिम्मेदारियों से दूर भागता है। हाँ उसे दुःख जरूर है इस बात का कि मनुष्य को सिर्फ़ एक ही जीवन - सामाजिक मान्यताओं-वर्जनाओं के साथ - क्यों मिला है जिन्दगी जीने के लिये !! गायब हो जाने से पहले एक दिन प्रोफ़ेसर अपने इस दुःख को अपनी पत्नी के समक्ष अभिव्यक्त भी कर देता है - लगभग विद्रोहात्मक परिणति में - कि जब यह स्नेहासिक्त कोमलता भी नैसर्गिक है तब मनुष्य को जीने के लिये सिर्फ़ एक ही जीवन क्यों मिला है !! (उसके इस वाक्य में दरअसल एक और भावार्थ है जो अमूर्त्त है - वह यह कि सामाजिक मान्यताओं-वर्जनाओं से रहित एक और जीवन मनुष्य को क्यों नहीं मिलना चाहिये जिसमें अपनी स्नेहासिक्त कोमलता के साथ वह निर्विवाद जी सके।)
इस अभिव्यक्ति के लिये उसने पत्नी को ही क्यों चुना ? क्योंकि अपने 'सन्देह' की पृष्ठ्भूमि में उसे यह देर या सबेर समझ में आ जाय कि उसका पति अपनी कोमल दुर्बलता के बावजूद कहीं से भी उसके प्रति 'बेईमान' नहीं था। और उसे सच में बात तब जाकर ठीक से समझ में आ पाती है जब उसके पति की वह भूतपूर्व छात्रा एक लम्बे अन्तराल के बाद उनके घर आती है और यह राज खुल जाता है कि उन दोनों के बीच तो कोई अफेयर कभी था ही नहीं।
रामपद चौधुरी का नाम मैंने पहली बार परदे पर पढ़ा, बांग्ला भाषा का बहुत ही अच्छा उपन्यास रहा होगा यह - तभी तो इस पर मृणाल दा इतनी सुन्दर फिल्म बनाने की बात सोच सके। यह उनकी निर्देशकीय उत्कृष्टता का नमूना ही तो है कि कहानी का संदेश अमूर्त्त रहने के बावजूद उसका प्रभाव अपनी पूरी जीवंतता के साथ फिल्म में मौजूद है।
इस अभिव्यक्ति के लिये उसने पत्नी को ही क्यों चुना ? क्योंकि अपने 'सन्देह' की पृष्ठ्भूमि में उसे यह देर या सबेर समझ में आ जाय कि उसका पति अपनी कोमल दुर्बलता के बावजूद कहीं से भी उसके प्रति 'बेईमान' नहीं था। और उसे सच में बात तब जाकर ठीक से समझ में आ पाती है जब उसके पति की वह भूतपूर्व छात्रा एक लम्बे अन्तराल के बाद उनके घर आती है और यह राज खुल जाता है कि उन दोनों के बीच तो कोई अफेयर कभी था ही नहीं।
रामपद चौधुरी का नाम मैंने पहली बार परदे पर पढ़ा, बांग्ला भाषा का बहुत ही अच्छा उपन्यास रहा होगा यह - तभी तो इस पर मृणाल दा इतनी सुन्दर फिल्म बनाने की बात सोच सके। यह उनकी निर्देशकीय उत्कृष्टता का नमूना ही तो है कि कहानी का संदेश अमूर्त्त रहने के बावजूद उसका प्रभाव अपनी पूरी जीवंतता के साथ फिल्म में मौजूद है।
Nice yar
जवाब देंहटाएंVery nice 👌
जवाब देंहटाएंGreat bro keep it up
जवाब देंहटाएंNice yar 👌
जवाब देंहटाएं