आत्मकथा के पहले पन्ने पर अपनी बात कहाँ से शुरू करूँ यह ठीक से समझ में नहीं आ
रहा. फिर भी….
कहीं से तो शुरू करना
ही होगा.
मुझे लगता है मैं सूफी हो गया हूँ. 69 साल की उम्र तक पहुँचते पहुँचते कितना कुछ
नहीं देखा….कितना कुछ नहीं झेला.
किताबों ने, ठीक कहूँ तो साहित्य ने, इन्सानी जिन्दगी के
हर रंग को पहचानना सिखाया, उन्हें उम्र की दहलीज पर चढ़ते-उतराते भोगना सिखाया. हर शै की
नित नई, रंग-बदलती परिभाषाओं ने……… अच्छाइयों-बुराइयों, नैतिकताओं-अनैतिकताओं,
रिश्ते-नातों,
दोस्ती-दुश्मनी,
लाभ-हानि, इहलोक-परलोक वगैरह
वगैरह की सापेक्ष अनुभूतियों ने……… मुझे कितना और क्या बना दिया है ! …….दुनिया शायद इसी को
ज्ञानवान होना या तजुर्बेकार होना समझती है….. समझे !
जिन्दगी के हर पड़ाव पर बहुतेरे लोग मिले…दोस्तियाँ हुईं,
शत्रुताएँ हुईं…..बहुतेरे लोगों से,
परिवारों से घनिष्टता
मिली, अन्तरंगता मिली….कपटी लोगों से भी साबका
पड़ा… झगड़े हुये…..बगावतें हुईं…… विश्वासघातों से सामना हुआ…..जख्म मिले,
जख्म सिले,
फिर हरे हुये,
फिर सिले……सिलसिला चलता रहा.
पाप और पुण्य, सही और गलत, उचित और अनुचित अहसासों
की तरंगों पर डूबते-उफनाते तजुर्बे कब जवान होते चले गये पता ही नहीं चला. पीछे
पलट कर देखता हूँ तो तजुर्बों की वह पोटली अब काफी प्रौढ़ भी हो चली है. पता नहीं कितने
दिन और जीऊँगा …..जितना ही सही, उसकी प्रौढ़ता और ज्यादा परिपक्व होती चली
जायेगी…….…..वैसे लगता नहीं कि
अब उस पोटली में 'सिरे से कुछ और नया' जुड़ पायेगा.
बहरहाल, ये मेरे अपने खयाल-भर हैं और जरूरी नहीं कि इनसे हर कोई (या
कोई भी) इत्तेफाक रखे ही. सबके अपने-अपने खयाल होते होंगे… हर किसी को अपने खयालों
से मुहब्बत भी होती ही होगी….उन्हें शायद यह भी
लगता होगा कि 'मेरे जो खयाल हैं वे ही दुरुस्त हैं, सर्वोत्तम हैं उनसे
अलग कुछ भी सही नहीं है'.
मैं क्या कर सकता हूँ ? सिवाय मुँह बन्द करके तमाशबीन बने रहने के ? …….मैं तो दरअसल खुद अपने
खयालों को भी निरपेक्ष (absolute or perfect) नहीं मानता…..तो दूसरों के भिन्न
खयालों को गलत कैसे ठहरा सकता हूँ ?....... कौन जाने मेरे आज के
खयालात कल को बदल जायें, मेरी बढ़ती उम्र के नये तजुर्बों के आलोक में ?
तो फिर अपनी बात कहने का फायदा क्या है ? तो रहने दूँ ?
नहीं, यह समुचित नहीं है.
इतिहास के पास अपनी स्वयं की समझ होती है, नजर होती है. वह खुद मूल्यांकन कर लेगा कि
इस शख्स के पास जब जैसा तजुर्बा था उसने तब वैसा बयान दिया और उसके बयानों में ईमानदारी
थी. और यह भी तय है कि अगर उसके बयान (यानी पलट जा चुके बयान) खुद में ईमानदार भी होंगे
तब भी उस पर अवसरवादी होने का ठप्पा तो लगेगा ही लगेगा. मगर यही रीत है, यही नियति है……..यह ठप्पा तो उसे बर्दाश्त
करना ही पड़ेगा. दूसरा कोई विकल्प नहीं.
अगर मैंने आपको अपनी यह आत्मकथा पढ़ने को दी है तो आप अगली पंक्तियों में मेरे कुछ
खयालात से (आज तक के मुकम्मल खयालात से) रू-ब-रू होने वाले हैं. आप उनसे सहमत हों या
न हों, यह पूर्णत: आपकी मर्जी है, मगर अपने मन में मेरे खयालात की कद्र जरूर करें - यह आपकी सज्जनता
का, आपके शिक्षित होने का और आपके सभ्य होने का सूचक होगा.
* वाल्टेयर (प्रसिद्ध फ्रांसीसी लेखक, कवि, नाटककार, उपन्यासकार,
निबन्धकार और नागरिक
स्वतंत्रता के प्रबल समर्थक दार्शनिक) ने कहा था, "हो सकता है मैं तुम्हारे
विचारों से सहमत ना हो पाऊं लेकिन विचार प्रकट करने के तुम्हारे अधिकार की रक्षा जरूर
करूंगा".
* अपने विचारों को सर्वश्रेष्ठ समझना मूर्खता है.
* वह इन्सान आजतक पैदा ही नहीं हुआ जिससे कभी कोई गल्ती नहीं हुई. और न ऐसा इन्सान
कभी पैदा होगा.
* अपनी गल्ती को स्वीकार कर लेना कलेजे वालों का काम है. वैसा कलेजा कम ही लोग दिखला
पाते हैं.
* अहंकार या घमण्ड बहुत बुरी चीज है यह तो हर व्यक्ति जानता है पर विडम्बना यह है
कि ज्यादातर लोग अपने अहंकार को पहचान ही नहीं पाते.
o किसी को अपनी सूरत का तो किसी को अपनी सीरत का, o किसी को अपने खानदान का तो किसी को अपने पैसे का, o किसी को अपने रुतबे का तो किसी को अपने समुदाय का, o किसी को अपनी शिक्षा का तो किसी को अपनी प्रसिद्धि का
अहंकार होता है पर वह उसे पहचान नहीं पाता. उसे इसकी अनुभूति ही नहीं होती. कोई
दूसरा अगर टोक भी दे तो वह अपने अहंकार को मानने को तैयार ही नहीं होता. अपनी नासमझी
में वह उसे अपना गौरव ठहराता है. उस पर वह फख्र महसूस करता है.
* बहुधा लोग आत्म-सम्मान और अहंकार में फर्क कर भी नहीं पाते.
* अहंकार कुछ तो कम बुरी चीज रही होती अगर नादान लोगों के द्वारा अपने अहंकार का
प्रकटीकरण न किया जाता. यह प्रकटीकरण अपने निकृष्टतम रूप में ज्यादातर दो तरह का दिखता
है :
o दूसरों को नीचा या
कमतर (यानी lower-graded) दिखाने में, और o दूसरों पर अपने विचार, अपनी इच्छायें थोपने में (यानी to
dictate others).
* "क्रोध" भी अहंकार का एक सूचक है.
* इन्सान क्या है ? क्या उसका अपने जन्म पर या मृत्यु पर कोई नियन्त्रण है ?
क्या उसे इतना भी पता
होता है कि उसकी मृत्यु कब होगी ? यानी एक अन्जान और अपरिचित जीवन-धारा है जिसमें वह बहता चला
जाता है. वह हमेशा एक भ्रम में जीता है कि
o मुझे फलाँ चीजों का
ज्ञान है / मुझे फलाँ चीजों का ज्ञान नहीं है. o मेरे पास फलाँ चीज
है / मेरे पास फलाँ चीज नहीं है. o मैंने ऐसा किया / मैं
ऐसा नहीं कर पाया.
जबकि हकीकत यह है कि ये सारी की सारी स्थितियाँ सिर्फ भ्रम की स्थितियाँ हैं. दरअसल
हम सिर्फ वही कर रहे होते हैं जो तात्कालिक परिस्थितियाँ हमसे कराती हैं.
* एक पुरानी बम्बईया फिल्म के एक अप्रचलित डायलॉग ने मेरे दिमाग को अनायास चिन्तन
की एक नई दिशा दे दी थी. पहले लगा कि एक घटिया बात के जवाब में एक दूसरी घटिया बात
ही तो कही गई है. मगर दूसरे ही पल महसूस हुआ कि बात कड़वी जरूर है मगर है तो सच. मन्दाकिनी
(उस फिल्म की हीरोइन) किसी आरोप के जवाब में कहती है, "वैसे तो दुनिया में
किसी को भी पता नहीं होता कि उसका बाप कौन है". यानी वह तो ताउम्र उसी शख्स को
अपना बाप मानता रहता है जो उसे दूसरों ने (जैसे कि उसकी माँ ने) बताया हुआ होता है.
मगर दूसरे एंगल से सोचें तो क्या उस इन्सान के लिये यह गारन्टीड सच हुआ ?
* जब हम यह सोचना शुरू कर देते हैं कि आखिर हम हैं कौन ? हमारा वजूद क्या है
? हम इस दुनिया में कैसे आ गये ? कहाँ से आ गये ? तब हमारा चिन्तन हमें उस एक सृष्टिकर्त्ता
के "होने" का एहसास करा देता है जिसके "होने" को लेकर हम अपने
जीवन-काल की कतिपय सीढ़ियों पर "निश्चय-अनिश्चय" से गुजर चुके होते हैं. तब
जाकर हम महसूस करने लगते हैं कि कोई-न-कोई एक शक्ति-पुंज है जरूर, भले ही वह अदृश्य है,
और वही इस दुनिया के
सारे कार्य-कलाप अपनी मर्जी से संचालित कर रहा है…..इन्सान खामख्वाह अपनी
पीठ ठोकता है कि ये सारे क्रिया-कलाप मैंने ही तो किये.
* अहंकार पर एक बार फिर से लौटते हैं.
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मैं न होता तो क्या होता
(रामचरित मानस के संकलन से)
अशोक वाटिका में जिस समय रावण क्रोध में भरकर तलवार लेकर सीता माँ को मारने के
लिए दौड़ पड़ा, तब हनुमान जी को लगा कि इसकी तलवार छीन कर इसका सिर काट लेना
चाहिये, किन्तु अगले ही क्षण उन्होंने देखा कि मंदोदरी ने रावण का हाथ पकड़ लिया,
यह देखकर वे गदगद हो
गये.
वे सोचने लगे यदि मैं आगे बढ़ता, सीता माता को बचाता, तो मुझे भ्रम हो जाता
कि यदि मैं न होता तो सीता माता को कौन बचाता ?
बहुधा हमको ऐसा ही भ्रम हो जाता है कि मैं न होता तो क्या होता ?
परन्तु ये क्या हुआ कि सीताजी को बचाने का कार्य प्रभु ने रावण की पत्नी को ही
सौंप दिया. तब हनुमान जी समझ गये कि प्रभु जिससे जो कार्य लेना चाहते हैं, वह उसी से लेते हैं.
आगे चलकर जब त्रिजटा ने कहा कि लंका में बंदर आया हुआ है और वह लंका जलायेगा तो
हनुमान जी बड़ी चिंता में पड़ गये कि प्रभु ने तो लंका जलाने के लिए कहा ही नहीं है.
और यहाँ त्रिजटा कह रही है कि उन्होंने स्वप्न में देखा है कि एक वानर ने लंका जलाई
है. अब उन्हें क्या करना चाहिए ? उन्होंने मन में सोचा : जो प्रभु इच्छा.
जब रावण के सैनिक तलवार लेकर हनुमान जी को मारने के लिये दौड़े तो हनुमानजी ने
अपने को बचाने के लिए तनिक भी चेष्टा नहीं की और जब विभीषण ने आकर कहा कि दूत को मारना
अनीति है तो हनुमान जी समझ गये कि मुझे बचाने के लिये प्रभु ने यह उपाय कर दिया है.
आश्चर्य की पराकाष्ठा तो तब हुई, जब रावण ने कहा कि बंदर को मारा तो नहीं जायेगा
पर इसकी पूँछ में कपड़ा लपेट कर घी डालकर आग लगाई जाये तब हनुमान जी की समझ में आ गया
कि लंका वाली त्रिजटा की बात सच थी - वरना लंका को जलाने के लिए मैं कहाँ से घी,
तेल, कपड़ा लाता और कहाँ
आग ढूँढता पर वह प्रबन्ध भी आपने (प्रभु ने) रावण से करा दिया. जब आप रावण से भी अपना
काम करा लेते हैं तो मुझसे करा लेने में आश्चर्य की क्या बात है !
इसलिये हमेशा याद रखें कि संसार में जो कुछ भी हो रहा है वह सब ईश्वरीय विधान है,
हम और आप तो केवल निमित्त
(माध्यम) मात्र हैं, इसीलिये कभी भी ये भ्रम न पालें कि...
मैं न होता तो क्या होता ?
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तो, ये सारे सांसारिक कार्यकलाप जिनमें इन्सान दिन-रात डूबा रहता है दरअसल सिर्फ एक
मायाजाल है और हम सब क्या हैं ? हम सब सिर्फ ऐसी कठपुतलियाँ हैं जिसकी डोर प्रभु की ऊँगलियों
से बँधी है. प्रभु जब, जिससे, जैसा भी कोई काम करवाना चाहते हैं वे उसी हिसाब से परिस्थितियों
का निर्माण कर देते हैं और इन्सान उस allotted work को कर गुजरता है.
प्रभु की इच्छा अगर उस कार्य में सफलता दिलवाने की होती है तो इन्सान सफल हो जाता
है और उन्होंने इसका उल्टा चाहा तो इन्सान असफल हो जाता है. मगर, प्रभु ने जो यह धरती
नाम का रंगमंच बना रखा है उसके पात्र अपनी अज्ञानता में उस सफलता को सच में अपनी खुद
की सफलता समझ कर खुश हो रहे होते हैं या उस असफलता को सच में अपनी असफलता समझ कर दुखी
हो रहे होते हैं. प्रभु इस रंगमंच के पात्रों को यह अनुभूति होने ही नहीं देते
कि वह तो सिर्फ एक पात्र-भर था और उसने सिर्फ वही किया है जो प्रभु ने करवाया है. तो
किस बात का खुश होना और किस बात का दुखी होना ?
महाभारत के युद्ध में, कुरुक्षेत्र में, ठीक युद्ध आरम्भ होने से पहले, अर्जुन रिश्तों के
मायावी मोह में पड़ गये थे और उन्होंने युद्ध करने से इन्कार कर दिया था, यह कह कर कि जिनसे
मैं लड़ने जा रहा हूँ, जिनको युद्ध में मार डालने के लिये तैयार होकर आया हूँ उन पर
अस्त्र प्रहार कैसे कर पाऊँगा; वे सब तो मेरे अपने ही भाई-बन्धु, रिश्तेदार हैं...काका,
मामा, पितामह, बाबा, नाना, गुरुजन आदि. उनको मार
कर अगर हमें राज्य मिल भी गया तो वह हमारे किस काम का ?
भगवान श्रीकृष्ण ने तब उन्हें अपना विराट रूप दिखाया. अर्जुन ने भगवान के खुले
हुये मुख को देखा तो देखते ही रह गये. उसमें अर्जुन को पूरा ब्रह्माण्ड दिखने लगा.
युद्ध के मैदान समेत दोनों तरफ की सेनायें भी दिख रही थीं, दोनों तरफ के सारे
योद्धा भी दिख रहे थे - यहाँ तक कि खुद अर्जुन भी उसमें भगवान के साथ दिख रहे थे. भगवान
ने समझाया - मैं संसार के हर जड़-चेतन प्राणी में विद्यमान हूँ, पेड़-पौधों में विद्यमान
हूँ. नदी, नाले, समुद्र, रेत, पहाड़ सब में मैं ही हूँ. मैं तुझमें भी हूँ और दुर्योधन में
भी मैं ही हूँ. यह पूरा संसार मेरी ही लीला है. दोस्त भी मैं ही हूँ और दुश्मन भी मैं
ही हूँ. पांडव भी मैं हूँ और कौरव भी मैं ही हूँ. ये सारे सूर्य-चन्द्र, ग्रह-नक्षत्र भी मैं
ही हूँ. मैं धरती और आकाश के एक-एक कण में हूँ.……तू जो यह तेरा-मेरा
सोचने में मग्न है वह सब तेरा भ्रम है, सब कुछ तो मेरा है, तू तो बस निमित्त है,
माध्यम है.…..
मैंने तुझे धरती पर
जिस भूमिका में भेजा है तू निर्विकार भाव से वह करता जा और जो कुछ भी तू करे वह सब
मुझको सौंपता जा. न्याय के पक्ष में तेरा युद्ध करना आवश्यक है, यह तेरा क्षत्रिय-धर्म
है. न्याय-पथ पर अपने कर्त्तव्य का पालन कर, युद्ध कर. मानव-मात्र
के द्वारा अपने कर्त्तव्य का निर्धारण करना और उस हेतु युद्ध करना सब मेरी ही लीला
है.
भगवान श्रीकृष्ण ने इसी तरह बहुत सारे उपदेश अर्जुन को दिये जो "श्रीमद् भगवद्
गीता" में संकलित हैं. इसे ही संक्षेप में "गीता" कहा जाता है. महात्मा
गांधी को इसी से शक्ति और प्रेरणा मिलती थी और यह चौबीसों घंटे की उनकी संगिनी थी.
"हे राम" कहते हुये जब बापू इस दुनिया से विदा ले रहे थे तब भी उनके हाथों
में "गीता" मौजूद थी.
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लेकिन जो एक बात और महत्त्वपूर्ण है वह यह है कि भगवान ने हजारों मामलों में इन्सान
को "अपने कृत्यों (यानी अच्छा या बुरा काम)" को करने की आजादी भी दी है,
खुला मैदान छोड़ रखा
है. वह इस बात की परीक्षा लेते हैं कि देखें इस आजादी को पाकर तुम किस राह को चुनते
हो - अच्छे राह को या बुरे राह को.
हजारों, लाखों लोग दिन-रात कड़ी मेहनत करके बमुश्किल दो वक्त की रोटी
जुगाड़ पाते हैं. फिर भी वे चोर, उचक्कों, डकैतों का रास्ता नहीं अपनाते. वे अच्छी राह चुनते हैं,
ईमानदारी का रास्ता
चुनते हैं. अच्छी राह चुनने वालों के लिये भगवान ने उचित समय में उचित पुरस्कार देने
की व्यवस्था कर रखी होती है. चोर, उचक्कों, अपराधियों, दुश्कर्मियों के लिये ठीक उसी तरह उन्होंने दण्ड की व्यवस्था
भी कर रखी होती है जो उचित अवसर पर उसे दे दी जाती है.
दो कहावतों पर अपने चिन्तन को फोकस करता हूँ.
पहली है, "जब ऊपर वाला देता है तो छप्पर फाड़ कर देता है". यह पुरस्कार
है - हजारों लाखों किस्म में से एक किस्म का. दूसरी कहावत है, "ऊपर वाले की लाठी में
आवाज नहीं होती". यह दण्ड है - उस किस्म का जब कोई समझे या ना समझे जिसे मिलता
है वह खूब समझता है. उसी तरह दण्ड की अन्य किस्में भी हैं.
विश्लेषण की विषय-वस्तु यहाँ यह है कि इन्सान के सामने रास्तों को चुनने की आजादी
है - सुकर्म वाले और कुकर्म वाले. ऐसा क्यों है ? ऐसा इसलिये कि भगवान
ने सुसंस्कार और कुसंस्कार की पृष्ठभूमि बना दी है और हम इन्सानों को आजादी देकर हमसे
उम्मीदें लगा रखी है कि हम अपने मस्तिष्क नाम की मशीन का सदुपयोग करके सुकर्म वाले
मार्ग पर चलें - जब इस मशीन का हम सदुपयोग करते हैं तो अपने कुसंस्कारों को भी ठेंगा
दिखाकर सुकर्म वाले मार्ग को चुनते हैं और पुण्य के दावेदार बन जाते हैं. इसके विपरीत
जब हम अपने सुसंस्कार को नजरंदाज करके कुमार्ग को चुनते हैं तो पाप के भागी बनते हैं.
हमारे धर्मशास्त्रों में लिखा है कि पुरस्कार हो या दण्ड - अगर हमें इस जन्म में नहीं
मिला तो निश्चित तौर पर वह हमें अगले जन्म में मिल जाता है. इसे ही प्रारब्ध कहते हैं.
निष्कर्ष यह निकलता है कि पुण्य हो या पाप - इन दोनों का फल वह स्वयं के लिये ही
निर्धारित करता है, किसी और के लिये नहीं. और इसमें किसी का स्वार्थ है तो खुद उसका
अपना. किसी की भलाई है तो खुद उसकी अपनी. अगर वह सोचता है कि मैंने किसी की भलाई कर
दी है तो वह गलत सोचता है. दरअसल उसने वैसा करके खुद अपनी भलाई रिजर्व करा ली है जो
उसे इस जीवन में भी मिल सकती है और न मिली तो अगले जन्म में तो सुनिश्चित ही मिलेगी
- जैसा कि ऊपर कहा गया है इसे ही प्रारब्ध कहते हैं.
ठीक इसी तरह अगर वह सोचता है कि मैंने किसी की बुराई कर दी है तो वह गलत सोचता
है. दरअसल उसने वैसा करके खुद अपनी बुराई रिजर्व करा ली है जो उसे इस जीवन में भी मिल
सकती है और न मिली तो अगले जन्म में तो सुनिश्चित ही मिलेगी - जैसा कि ऊपर कहा गया
है. प्रारब्ध यह भी है.
अब इसी स्टेज पर मैं अपनी बात थोड़ी देर के लिये रोकता हूँ.
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मेरी जिन्दगी की दो घटनाओं का उल्लेख बारी-बारी से करना चाहूँगा. मगर पहले एक आम
व्यवहार…
हट्ठे-कट्ठे जवान लोगों को भीख माँगते देख कर गुस्सा किसे नहीं आता. मुझे भी आता
था. पर, अब नहीं आता.
एक दूसरे मुहल्ले की किराने की दुकान पर एक ऐसी ही हट्ठी-कट्ठी महिला को एक बार
मैंने भीख देने से इन्कार कर दिया था. मेरे बैंक के एक सहकर्मी के बड़े भाई की दुकान
थी वह. मजे की बात यह कि दुकानदार मेरा मित्र था, हमने साथ में पढ़ाई
की थी. और उसका छोटा भाई यू० पी० की किसी ब्रान्च से ट्रान्सफर होकर आया था और इस शहर
में अब मेरा सहकर्मी था. तो बात तब की है जब किसी काम से अपने सहकर्मी से मिलने के
लिये मैं गया था. वह घर की पहली मंजिल पर रहता था सो मेरे मित्र ने उसे आवाज लगाई और
मेरे आने की सूचना दे दी. दुकान एक साथ दो उद्देश्य पूरे करती थी - दुकान होने की और
और उस ज्वाइन्ट फैमिली के ड्राइंग रूम होने की. ऐसी बातें आम होती हैं हमारे जैसे मिड्ल
क्लास लोगों के यहाँ.
वह हट्ठी-कट्ठी भिखारिन बड़ी ढीठ निकली. मेरे मना करने के पहले मेरा वह मित्र भी
उसे 'आगे बढ़ो' का संकेत देकर इन्कार कर चुका था. मगर वह अभी तक डटी हुई थी.
इस बीच 18-20 साल की एक लड़की जाने कब आकर काउन्टर पर खड़ी हो गई थी. उसे कुछ
सौदा लेना था. मेरे मित्र ने अब उस भिखारिन को डाँटा, "आगे क्यों नहीं बढ़ती,
जब देखो तब आकर मेरी
दुकानदारी खराब कर देती है". अब वह थोड़ा ठिठकी और मुड़ी.
तब तक मेरे बगल में खड़ी उस लड़की ने भिखारिन को रुकने का संकेत दिया और एक सिक्का
उसके कटोरे में उछाल दिया. भिखारिन चली गई. कुछ ही देर में अपना सौदा लेकर वह लड़की
भी चली गई. हम फिर से गपशप करने लगे. सहकर्मी को नीचे आने में समय लग रहा था.
तभी बातचीत का रुख मोड़ते हुये मेरे मित्र ने कहा, "रमेश, जानते हो वो जो लड़की
अभी सौदा लेने आई थी वह कौन है ?"
"नहीं, मैं तो उसे नहीं जानता. कौन है वो ?"
"वह एक कॉल गर्ल है".
"तो ?" मैंने पूछा.
"मैंने बस यूँ ही बता दिया. बेचारी बड़ी गरीब है. एक छोटा भाई है, पढ़ा रही है. माँ को
कैन्सर है. खुद कोई ज्यादा पढ़ी-लिखी भी नहीं है कि कहीं ऑफिस में काम कर सके. बाप पियक्कर
था. ऑटो चलाता था. बीवी-बच्चों की रोज पिटाई करता था. जो कमा कर लाता वह शराब में उड़ा
देता. बीवी झाड़ूपोछा करके किसी तरह घर चलाती. एक दिन अचानक मर गया. कुछ ही दिन के बाद
बीवी को कैन्सर हो गया. अब यह किसी तरह दोनों को सँभाल रही है".
उसकी कहानी सुन कर हृदय थोड़ा द्रवित हुआ. मगर कुछ पलों के बाद ही यह बात आई-गई
हो गई.
बहुत बाद में जाकर मुझे महसूस होने लगा कि मैं अब भिखमंगों के प्रति कठोर बना नहीं
रह पाता हूँ. मैं खुद को टटोलता हूँ कि ऐसा क्यों है. खुद को कोई जवाब तो नहीं मिलता
पर हर बार उस लड़की की सूरत सामने आ जाया करती.
इस घटना के कई साल बाद दक्षिण भारत के एक शहर Vellore में एक ठेले वाले ने,
जो अपने ठेले पर इस्लामी
साहित्य बेचता था और बड़ी अच्छी हिन्दी (उर्दू मिश्रित) बोलता था, एक बड़ी अच्छी बात बताई.
उसने कहा कि जिस ऊपर वाले ने इस कायनात (ब्रह्माण्ड) को बनाया, पूरी दुनिया बनाई
- क्या उसके पास अनाज की, पैसों की, दूध-मेवों की कोई कमी है ? क्या वह अपने इन बन्दों
का (उसका इशारा भिखारियों और मजलूमों की तरफ था) पेट नहीं भर सकता ? जरूर भर सकता है. लेकिन
उसे तो इस बात का इम्तेहान भी लेना है कि उसके सामर्थ्यवान बन्दों में इन्सानियत बची
है या नहीं. बची है तो कितनी बची है. उसके बन्दे सिर्फ अपने ही बाल-बच्चों का पेट भरने
में बिजी हैं या अपनी कमाई गरीबों और मजबूरों पर भी खर्च करते हैं. हमारी किताबों में
खुदा का हुक्म लिखा है कि अपनी कमाई का इतना हिस्सा गरीबों और मजलूमों पर खर्च करो.
मुझे फिर से वह लड़की याद आ गई. एक विचार मन में उठा कि अपना शरीर बेचने को मजबूर
उस लड़की ने यह नहीं देखा कि भिखारिन तो हट्ठी-कट्ठी है, खुद मेहनत कर सकती
है, कमाई कर सकती है तो इसे पैसे क्यों दिये जाँय. उसने प्रोग्रेसिव विचारकों,
विद्वानों की तरह यह
नहीं विचारा कि वैसे लोगों को भीख देने का मतलब है उन्हें निकम्मा बने रहने को प्रोत्साहन
देना. उसने सिर्फ यह देखा कि भिखारिन जरूरतमन्द होगी तभी तो सार्वजनिक रूप से,
तिरस्कार झेलकर भी,
भीख माँग रही है. तो
उस अनपढ़ लड़की ने भगवान के द्वारा निर्देशित सुकर्म वाले मार्ग का अनुसरण किया. यह करके
उसने उस भिखारिन का कितना भला किया यह महत्त्वपूर्ण नहीं है. महत्त्वपूर्ण यह है कि
अनपढ़-गँवार होकर भी उसने अन्जाने में अपने लिये एक अच्छा "प्रारब्ध" बना
लिया, अपने लिये भगवान के यहाँ पुरस्कार रिजर्व कर लिया.
मुझे अपने साथ काम करने वाली एक बहुत जूनियर बंगाली लड़की अपर्णा चक्रवर्त्ती की
भी याद हो आई है जिसके पति की अभी हाल में ही कोरोना से मृत्यु हुई है. उसके पिता रेलवे
में क्लर्क थे. बेटा कोई था नहीं, बेटियाँ एक-एक कर छह हो गई थीं. अपर्णा सबसे छोटी थी. जब वह
सिर्फ छह महीने की थी उसके पिता एक्सीडेन्ट में मारे गये थे. सबसे बड़ी बहन उस समय आठवीं
में पढ़ रही थी. रेलवे से कुछ पैसे मिले थे, काम किसी तरह चल रहा
था. मगर उसकी माँ की मानसिक हालत धीरे-धीरे बिगड़ती जा रही थी. रिश्तेदार लोग अपनी अच्छी-बुरी
और कृत्रिम रिश्तेदारी निभा रहे थे. किसी तरह उसकी बड़ी बहन की शादी (जब वह दसवीं में
थी) निपटा दी गई.
लड़का रेलवे में ही अभी-अभी बहाल हुआ था. परिवार समृद्ध था, पैसों की कोई कमी न
थी. घरवालों की इच्छा के विरुद्ध जाकर उसने नौकरी पकड़ी थी. मिजाज से विद्रोही,
क्रान्तिकारी,
लीक से हट कर चलने
वाला और अपने उसूलों में पक्का.
अपर्णा के जीजा….तब और अब !! वे तो
कब के रिटायर भी हो गये. उनकी पत्नी, अपर्णा की बड़ी बहन भी करीब पन्द्रह साल पहले
गुजर गई. वही थी जिसने अपने पति को अपने नैहर के परिवार का, अपनी छोटी-छोटी बहनों
का गार्जन माना, गार्जन बनाया. उन्होंने हालात की दुश्वारियाँ देखी, जिम्मेदारियों को स्वीकार
किया और वहीं के होकर रह गये. अपर्णा और उसकी सभी बहनों को (सिर्फ बड़ी वाली को छोड़कर)
उन्होंने अच्छी शिक्षा, अच्छे संस्कार दिये. सभी को एक-एक करके अच्छी नौकरियाँ मिली.
उन्होंने अपर्णा सहित सभी बहनों की शादियाँ करवाईं, सबके घर बसा दिये.
आज भी अपर्णा और उसकी बहनों में अपने जीजा के लिये जो सम्मान की भावना है वह शायद किसी
को अपने सगे पिता के लिये भी न हो.
जमशेदपुर शहर को छोड़ना न पड़ जाय इस हेतु उन्होंने अपना प्रोमोशन भी ठुकरा दिया.
सोचा, कि मैं चला जाऊँगा (प्रोमोशन स्वीकारने पर ट्रान्सफर भी लेना पड़ता) तो इन बच्चों
की परवरिश कैसे होगी.
इसका उन्हें पुरस्कार भी मिला. उनका बेटा आइ० ए० एस० की परीक्षा में निकल गया.
उनकी दिवंगत पत्नी का यह सपना था - जो उनकी गैरहाजिरी में भी पल्लवित होकर रहा. बिहार
महिला समाज (यह झारखण्ड राज्य बनने के पहले की घटना है), जो भारतीय कम्यूनिस्ट
पार्टी की एक संबद्ध राज्य इकाई है, का राष्ट्रीय अधिवेशन हुआ तो उसके आधिकारिक
मुख्यद्वार और कार्यस्थल का नाम उनकी पत्नी, रूपा चक्रवर्त्ती के
नाम पर रखा गया. कितनी ही सभा-सोसायटियों में उन्हें मुख्य अतिथि के तौर पर सम्मानित
किया जाता रहा है और यह सिलसिला जारी है. उन्हें भारतीय कम्यूनिस्ट पार्टी की राष्ट्रीय
कार्यकारिणी में भी स्थान दिया गया है. उनके सम्मान की ढेर सारी ऐसी बातें हैं जो मुझे
मालूम भी नहीं है. तो यह है उनका प्रारब्ध जो इसी जीवन में उन्हें मिल गया और जाने
कब तक मिलता रहेगा !!!
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इन दोनों घटनाओं से यह सोच उभरती है कि किसी भी परिस्थिति में अगर हम इस धरती पर
किसी की भलाई करने की सोचें तो ये दो बातें जरूर ध्यान में रखें :
हम उस पर कोई एहसान नहीं कर रहे हैं. जो भी कर रहे हैं वह अप्रत्यक्ष रूप से ईश्वर
की प्रेरणा से कर रहे हैं. हमें यह भलाई इस तरह करनी है कि "अगर दाँयें हाथ से
किसी को कुछ दे रहे हैं तो बायें हाथ तक को पता न चले कि हमने उसे कुछ दिया है".
जिसे कुछ दे रहे हैं उनसे ऐसी कुछ भी उम्मीद न रखें कि बदले में वह हमारी इच्छाओं
का पालन करेगा. बस "नेकी कर, दरिया में डाल" का पालन करते चलिये.
"कभी-कभी मेरे दिल में खयाल आता है" जैसे बेहतरीन गीत का बेहतरीन संगीत रचने
बॉलीवुड के मशहूर संगीतकार खय्याम साहब की याद तो आपको होगी. मगर, शायद आपको यह बात न
मालूम हो कि अपने जीवन-भर की सारी कमाई उन्होंने बॉलीवुड में काम करने वाले छोटे-मोटे
कामगारों के नाम वसीयत कर दी थी.
उसी तरह एक और बहुत बड़ा नाम नानी पालकीवाला का है (जो इतने बड़े न्यायविद् थे कि
उनके बारे में क्या बताऊँ, क्या न बताऊँ. सैकड़ों महत्त्वपूर्ण बातों में से सिर्फ एक बात
बताना शायद मुफीद हो कि सुप्रीम कोर्ट के Justice H. R. Khanna ने (वही Justice
H. R. Khanna जिनकी वरीयता को नजरअंदाज करके श्रीमती इन्दिरा गांधी ने उनसे कनीय जस्टिस बेग
को सुप्रीम कोर्ट का चीफ जस्टिस बना दिया था और उन्होंने इसके विरोध में इस्तीफा दे
दिया था) कहा था :
It was not Nani who spoke. It was divinity
speaking through him.
(भावार्थ यह कि जो कुछ नानी ने कहा है वह दरअसल उन्होंने
नहीं कहा. उनकी मार्फत खुद ईश्वर ने यह सब कहा
है).
तो बात इन्हीं नानी पालकीवाला की कर रहा हूँ. कम ही लोगों को पता होगा कि अपनी
वसीयत में उन्होंने अपनी समस्त जायदाद का एक बहुत बड़ा हिस्सा चेन्नई (तत्कालीन मद्रास)
के प्रसिद्ध "शंकर नेत्रालय" के नाम लिख दिया था ताकि गरीब और लाचार लोगों
का इलाज किया जा सके. बाद में अपनी श्रद्धा के रूप में इस अस्पताल ने बाकायदा अपनी एक
विशालकाय बिल्डिंग को उनके नाम समर्पित कर दिया.
इस तरह की हजारों घटनाओं से हमें क्या सीख लेनी चाहिये मैं उस पर आता हूँ.
किसी की मदद करने से पहले हमें सौ बार सोच लेना चाहिये कि कहीं इस मदद के बदले
में हमारे मन में किसी तरह की वापसी लेने का तो कोई खयाल नहीं है न ? अथवा कहीं यह चाहत
तो नहीं छुपी हुई है न कि यह शख्स हमारी भावनाओं का, इच्छाओं का आदर करेगा
? या हम कहीं ऐसा तो नहीं मान कर चल रहे हैं कि यह शख्स तो अब हमारे निर्देश पर ही
अपने फैसले लेगा ? अगर ऐसा कुछ भी हमारे मन में है तो बेहतर है कि हम उसकी मदद
ही न करें. और अगर मदद करने की तीव्र इच्छा उठ रही हो तो अपने मन को उक्त सवालों की
कसौटी पर पहले कस कर देख लें और तभी मदद करने का निर्णय लें. और तब, अगर अपने मन को हम
संशय में पा रहे हों तो सख्ती से मदद देने के अपने संकल्प को जड़ से ही खत्म कर दें.
हम अपनी सामर्थ्य का कोई एक छोटा-बड़ा हिस्सा किसी जरूरतमन्द को देकर अहंकार में पड़ जाते हैं
कि देखो मैंने इतना बड़ा काम कर दिया है. किसी का इतना भला भला कौन करता है ! वह तो
समझिये कि मैंने इतनी बड़ी मदद कर दी वरना इसका यह काम कहाँ हो पाता ! बस, यही हमारे चिन्तन की
रुग्नता है, हमारा अहंकार है. याद रखें यह दुनिया हमारी मदद की मोहताज नहीं
है. उसका काम तो तब भी किसी-न-किसी तरह प्रभु चला ही देंगे, ठीक वैसा जैसा उन्होंने
उसके लिये तय कर रखा है. याद कीजिये ऊपर लिखा
गया हनुमान जी की घटनाओं का सन्दर्भ जिसका विषय था :
मैं न होता तो क्या होता
* पृथ्वीराज कपूर ने अपने जीवन में काफी संघर्ष किया था. तब जाकर फिल्मी दुनिया की
इतनी बड़ी हस्ती बन पाये थे. संघर्ष की महत्ता वह समझते थे. वे चाहते तो अपने बड़े बेटे
राज कपूर को शान-ओ-शौकत की जिन्दगी जीना मुहैय्या करा सकते थे. मगर उनका सपना था कि
मेरा बेटा भी एक महान फिल्मकार बने, दुनिया-भर में नाम कमाये. एक बार बचपन में
जब राज कपूर स्कूल से लौटे तो स्कूल-बस से उतरने के साथ ही बारिश शुरू हो गई. उनकी
माता जी छाता लेकर दौड़ीं पर बीच में ही पृथ्वीराज जी ने उन्हें रोक दिया. कहा,
"उसे जिन्दगी के हर रंग का तजुर्बा हासिल करने दो. उसे जानना चाहिये कि बारिश में
भींगना क्या होता है. आखिर एक दिन उसे महान फिल्मकार बनना है. लोगों के सुख-दुख पर
फिल्में बनानी है."
"उसकी तबियत खराब हो गई तो ?" उनकी माता जी ने चिन्ता प्रकट की.
"इलाज हो जायेगा".
और आखिर सच में राजकपूर जी बीमार पड़ गये. इलाज हुआ और वे ठीक हुये. मगर उस दिन
की बारिश ने कुदरत के एक चटख रंग से उनका परिचय जरूर करा दिया.
लाइटमैन की ड्यूटी से फिल्मी दुनिया में कदम रखने वाले राज कपूर ने 22 वर्ष की उम्र में
"आग" फिल्म का निर्माण कर डाला था जो उस दौर के लिये एक बहुत बड़ी बात थी.
मगर इसके भी पहले उन्होंने केदार शर्मा जैसे बड़े निर्देशक की थप्पड़ भी खाई जिन्होंने
उन्हें बतौर हीरो पहली बार सिनेमा के पर्दे पर उतारा था; नीलकमल फिल्म का एक
सीन फिल्माया जा रहा था और बेचारे राजकपूर उस सीन में बार-बार फेल हो रहे थे (यानी
री-टेक पर री-टेक लिया जा रहा था). आखिर केदार शर्मा झल्ला गये थे और गुस्से में उनको
थप्पड़ लगा दिया था.
राज कपूर को जितनी प्रसिद्धि मिली यह तो पूरी दुनिया को पता है मगर एक सच कम लोगों
को ही मालूम है कि एक समय ऐसा भी आया कि राज कपूर के नाम पर दिये जाने वाले एक प्रतिष्ठित
पुरस्कार पाने वाले फिल्मकारों में एक ऐसा नाम भी शामिल हुआ जिसने सबको चौंका दिया.
यह वही नाम था जिसकी ऊपर में चर्चा हो चुकी है - केदार शर्मा.
* मैं क्या कहना चाहता हूँ ? मैं इस उदाहरण से "संघर्ष" की महत्ता पर प्रकाश डालना
चाहता हूँ. जिनको अपने जीवन में संघर्ष करना ही नहीं पड़ा और बैठे-बिठाये आराम और ठाठ-बाट
की जिन्दगी जीने को, भोगने को मिल गई वे जिन्दगी की हजारों किस्म की तकलीफों को पहचानने
से चूक गये और जिसका फल यह हुआ कि वे अपने रास्ते में आने वाली छोटी-मोटी विघ्न-बाधाओं
से ही घबरा जाते हैं. उनकी मानसिक स्थिति की एक दूसरी तस्वीर यह होती है कि उन लाचार
और गरीब लोगों के प्रति (जिनके वर्त्तमान आर्थिक हालात अच्छे नहीं हैं) उनका रवैया
कभी-भी दिल की गहराइयों से संवेदनशील नहीं रहता, हमदर्दी का नहीं रहता
- जितना दिखता है वह नकली होता है. अगर हालात के मारे लोगों से कोई चूक हो जाये तो
उनकी नकली हमदर्दी अपने विस्फोटक रूप में सामने आ जाती है जो कह जाती है कि "तुम
अपनी मर्जी से अपनी जिन्दगी नहीं जी सकते, तुम्हें हमारे इशारों पर चलना होगा".
यह क्या है ? यह अहंकार है. हम क्यों भूल जाते हैं कि जिस तरह अपने तरीके
से (चाहे वह तरीका जैसा भी हो) हम अपनी जिन्दगी जी रहे हैं ठीक उसी तरह उन गरीबों को
भी अपनी जिन्दगी अपने तरीके से जीने का हक ईश्वर ने उन्हें भी दिया है. हम क्यों यह
चाहत पालें या उनको मजबूर करें कि वे हमारे तरीके से जिन्दगी जीयें ? इसलिये कि हमने उनकी
मदद की है ?
* मेरे जीवन को जिन मूल्यों ने सजाया-संवारा है मुझे लगता है उनमें "गीता-सार" की बहुत बड़ी देन है. आज एक
बार उन्हें दोहरा लेने को जी कर रहा है.
o गीता सार o
क्यों व्यर्थ चिन्ता करते हो?
किससे व्यर्थ डरते हो?
कौन तुम्हें मार सकता है?
आत्मा न पैदा होती है, न मरती है.
जो हुआ, वह अच्छा हुआ.
जो हो रहा है, वह अच्छा हो रहा है.
जो होगा, वह भी अच्छा ही होगा.
तुम भूत का पश्चाताप न करो.
भविष्य की चिन्ता न करो.
वर्तमान चल रहा है.
तुम्हारा क्या गया, जो तुम रोते हो?
तुम क्या लाये थे, जो तुमने खो दिया?
तुमने क्या पैदा किया था, जो नाश हो गया?
न तुम कुछ लेकर आए, जो लिया यहीं से लिया.
जो दिया, यहीं पर दिया.
जो लिया, इसी (भगवान) से लिया.
जो दिया, इसी को दिया.
खाली हाथ आये, खाली हाथ चले.
जो आज तुम्हारा है, कल किसी और का था,
परसों किसी और का होगा.
तुम इसे अपना समझकर मग्न हो रहे हो.
बस, यही प्रसन्नता तुम्हारे दुखों का कारण है.
परिवर्तन संसार का नियम है.
जिसे तुम मृत्यु समझते हो, वही तो जीवन है.
एक क्षण में तुम करोड़ों के स्वामी बन जाते हो, दूसरे ही क्षण तुम
दरिद्र हो जाते हो.
मेरा-तेरा, छोटा-बड़ा, अपना-पराया मन से मिटा
दो, विचार से हटा दो.
फिर सब तुम्हारा है, तुम सबके हो.
न यह शरीर तुम्हारा है, न तुम इस शरीर के हो.
यह अग्नि, जल, वायु, पृथ्वी, आकाश से बना है और
इसी में मिल जाएगा.
परन्तु आत्मा स्थिर है, फिर तुम क्या हो?
तुम अपने आप को भगवान को अर्पित करो.
यही सबसे उत्तम सहारा है.
जो इसके सहारे को जानता है, वह भय, चिन्ता, शोक से सर्वदा मुक्त
है.
जो कुछ भी तुम करते हो, उसे भगवान को अर्पण
करते चलो.
ऐसा करने से तुम सदा जीवन-मुक्ति का आनन्द अनुभव करोगे.
००००००००००००००
………….(अब अगले पन्नों पर,
अगली किश्त में,
फिर कभी…… इसी मूड के साथ, जो शायद जल्द ही बन जाय).